ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
छिन्नमूल : भारतवंशी मन का द्वंद्व
CATEGORY : किताब 01-Nov-2016 12:00 AM 2531
छिन्नमूल : भारतवंशी मन का द्वंद्व

औपनिवेशिक साम्राज्य की लालसा के चरम पर समूचे विश्व में कई भू-भाग पर साम्राज्यवादी सत्ता ने, समूहों में भारत के श्रमजीवियों को अपने निहित कारोबारी स्वार्थ की पूर्ति के लिये बसा दिया था। ये श्रमजीवी जो भारतवंशी कहलाये, ऐसे पौधों के मानिन्द थे जो अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों के साथ रोपे गए थे। इन्हीं भारतवंशियों की तथा-कथा, जो वस्तुत: व्यथा कथा ज्यादा थी, उसको कई लेखकों ने अपने लेखन की विषयवस्तु के रूप में चुना। वस्तुत: इन भारतवंशियों के बारे में लिखा जाना, उनके जीवन-बसर के बारे में लिखे जाने से कहीं अधिक उनके अपने मूल से जुड़े होने की हूक की वापसी पर लिखा जाना रहा है। इन्हीं भारतवंशियों के साथ उस भू-भाग के इतिहास का दर्शन भी लेखक करवाते रहे थे पर कुल मिलाकर यह एक "कालखण्ड" पर लेखन होता था और उस बहाने लेखक उस कालखंड को परत-दर-परत पाठकों के सामने खोलता था।
किसी कालखण्ड में किसी खास भू-भाग पर लिखना एक दुष्कर काम होता है मगर सिद्धहस्त लेखक जिस आसानी से इस काम को अंजाम देते हैं उससे लगता है इस किस्म का लेखन मुश्किल तो है मगर नामुमकिन नहीं है। पुष्पिता अवस्थी के उपन्यास "छिन्नमूल" में भी सूरीनाम केंद्रित भारतवंशियों के जीवनयापन पर प्रभारी लेखन देखने को मिलता है। यहां मैं "पढ़ने" के स्थान पर "देखने" शब्द का प्रयोग जान-बूझकर कर रहा हूं क्योंकि पुष्पिता ने लेखक में जो चाक्षुषता का तत्व है वो बेहद पुरअसर है और मनभावन भी है, मनोहारी भी।
पुष्पिता ने सूरीनाम में लम्बा समय बिताया है और वहां के जनजीवन, खासतौर पर भारतवंशियों के बारे में उनके अनुभूत क्षणों ने इस उपन्यास के उद्भव का आधार तैयार किया जिस कारण भारतवंशियों पर लिखे गये श्रेष्ठतम उपन्यासों में "छिन्नमूल" को भी शामिल किया जाना लाजमी होगा।
पुष्पिता के इस उपन्यास में सूरीनाम इस कदर जीवंत है कि इसे पढ़कर हमें उनकी लेखनी के ताकत का अहसास तो होता ही है साथ ही एकाधिक प्रसंगों में ऐसा लगता है मानों पुष्पिता हमें कलम से आँखें सटाकर सूरीनाम देखने का अवसर दे रही हैं। पुष्पिता के लेखन की यही चाक्षुषता उनके लेखन की ताकत है और यदि इस खूबी के आधार पर यदि कोई फिल्मकार उनकी रचना का फिल्मांकन करना चाहे तो बेहद सुविधाजनक महसूस करेगा। असल में लेखन में चाक्षुषता का यह बोध उनकी पैनी नजर का नतीजा तो है ही साथ ही किसी घटना, किसी कालखण्ड को समझने के लिये जो एक लब्ध जिज्ञासा होती है, उसका होना भी पुष्पिता के लेखक में नजर आता है। इसी चाक्षुष बोध और लब्ध जिज्ञासा के कारण पुष्पिता अवस्थी का यह उपन्यास अपनी एक अलग पहचान बनाता है।
पुष्पिता अवस्थी के इस उपन्यास का यदि भाषागत विवेचन करें तो हम पायेंगे कि उनकी भाषा सुगम और पुरअसर है। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से हिन्दी में पी.एच-डी. पुष्पिता अवस्थी की भाषा को लेकर यह आशंका तो थी ही कि उनकी हिन्दी संस्कृतनिष्ठ होगी मगर इस आशंका को झुठलाते हुये पुष्पिता ने इस उपन्यास में बोलचाल की भाषा का उपयोग ही किया है और जहां अलंकृत भाषा की जरूरत उन्होंने महसूस की वहां उन्होंने ऐसा किया भी है मगर भाषाई क्लिष्टता की बोझिलता यहां भी नहीं आने दी है। एक टुकड़ा देखिये- ""रात का सन्नाटा। जंगल के बीच पूर्णिमा का उजाला और यादों का जलजला। पूर्णिमा की रात में नदी की गोद में पाँव धरकर ठंडे अहसास के साथ नदी को निहारते समय एक स्टीमर के बगल से गुजरने से पानी की लहर से चांद उसके जाँघों के बीच आ गया।"" और फिर जब उसके आगे का विवरण देखिये- ""आज इस समय चाँद उसके बीयर के ग्लास में है। निर्मल आकाश, स्वच्छ चाँदनी ग्लास में बीयर और बीयर में चाँद... चाँद बीयर में उतरकर उसके ओंठ चूमेगा और वो बीयर में चाँदनी घोलकर पिएगी।"" चाँद और बीयर का जंगल के सन्नाटे में यह संगम लेखक की कल्पनाशीलता को उकेरता है। यह भाषाई तिलिस्म पूरे उपन्यास में यत्र-तत्र सर्वत्र छाया हुआ है।
"छिन्नमूल" में लेखक ने एक साथ सूरीनाम और हालैंड यानी नीदरलैंड की सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक स्थिति और व्यवस्थागत खूबियों की बात भी की है। उपन्यास में नीदरलैंड के बारे में उल्लिखित है कि - ""नीदरलैंड सिर्फ फूलों की ही धरती नहीं है बल्कि विविधवर्णी खेलों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाला विलक्षण राष्ट्र है। नीदरलैंड खेलों के लिये जीने वाला और खेलों को जिलाने वाला देश है फिर चाहे वो विंटर स्पोर्ट्स हों या समर स्पोर्ट्स। हाईकिंग हो या बाइकिंग। स्वीमिंग हो या मैराथन। जल के हों या धरती के, आकाशी हो या पर्वतीय। नीदरलैंड देश की धरती खेलों की जनक है। यहां के लोगों में क्रीड़ा-संस्कृति ऐसी धुली-मिली है जैसे यहां की माटी में सरसो के बीज।"" किसी स्थान विशेष, किसी संप्रभु राष्ट्र के बारे में लिखते समय पुष्पिता ने जो अधिकारिक लेखन किया है उससे सूरीनाम और नीदरलैंड ही नहीं इस ओर के दीगर राष्ट्रों का परिचय भी उनके इस उपन्यास में मिलता है। असल में छिन्नमूल की खूबी ही यह है कि वह उपन्यास एक नये कालखण्ड का ही नहीं उस कालखण्ड के इतिहास और वहां की संस्कृति का भी परिचय करवाती है और यह दस्तावेजी लेखन उन्हें अपने समकालीनों की तुलना में श्रेष्ठ साबित करता है।
उपन्यास जैसी विधा चूंकि इतिहास लेखन से भिन्न होती है अत: उसमें उल्लेखित तथ्यों की पुष्टि जरूरी नहीं होती है मगर छिन्नमूल में पुष्पिता ने हरसंभव कोशिश की है कि ऐतिहासिक सच से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाये। उपन्यास के एकदम आरंभ में ही मॉरियमब्रुख प्लांटेशन में गन्ने की कटाई-ढुलाई में लगे मजदूरों का दमन के खिलाफ विद्रोह वाला ब्यौरा इतिहास के पन्नों पर भी दर्ज है और उसे उसकी तीव्रता और चाक्षुष स्पर्श के साथ उपन्यास में शामिल किया गया है। उपन्यास में ऐतिहासिक तथ्यों का अनुसरण विधागत बाध्यता नहीं है मगर यदि लेखक इस संदर्भ में आग्रही हो तो यह एक अतिरिक्त लाभ वाली स्थिति मानी जाती है और पुष्पिता के इस उपन्यास को पढ़ते समय यही लाभ पाठकों को मिलता है।
यौन संबंधों के बारे में या फिर यौन अंगों के बारे में जब भी संदर्भ से जुड़कर पुष्पिता को लिखना पड़ा उन्होंने खुलकर लिखा है और पढ़कर लगता है कि वे वर्जनाओं को स्वीकार नहीं करती हैं मगर महिला लेखकों द्वारा इस संदर्भ में खुलकर लिखे जाने के ताजातरीन रिवाज के बहाने उन्होंने "हटकर" लिखने वाली छवि बनाने की कोशिश भी नहीं की है। यह लेखन कर्म सायास भी नहीं लगता है। क्या पुष्पिता यदि नीदरलैंड में न होकर भारत में रह रही होती तो क्या वे उस सबके कारण चर्चित नहीं हो गई होती? असल में महिला लेखकों के इसी "बोल्ड लेखन" को भारत में दुस्साहस कहा जाता है जबकि नीदरलैंड में वो सहज-स्वाभाविक माना गया और इससे उनका लेखन अपनी अलग पहचान बनाने में सफल रहा है।
"छिन्नमूल" में दृष्टा विधान के साथ का दृश्य भी एकाधिक बार इतना रोमानी नजर आता है कि देखकर महसूस करने की इच्छा बलवती हो जाती है। एक दृश्य देखिये (या यूं कहे पढ़िये) फुटबाल खेल के - ""बिजनेस क्लास के दर्शकों के लिए क्लब के आयोजकों की ओर से रिसेप्शन हॉल में गीत-संगीत का आधी रात से भी अधिक देर तक रोमांचक कार्यक्रम होता रहता है। कभी-कभी गायिका के होने पर उसके अधखुले वक्ष और रसीले होठों से प्रचलित गानों की लय, धुन और भी अधिक रोमांटिक लगने लगती हैं। ऐसे में पुरुषों की आँखों की उंगलियां, गायिका की खुली पीठ, गले, कपोल और अधरों तक का विलासी पान करके उसकी गायकी के साथ-साथ, उसकी देह का भी स्वाद चखती रहती हैं और वे खुद अपनी बीयर वाईन की शिप के साथ आनंदित होते रहते हैं।"" इस दृश्य में चाक्षुषता के साथ एक मर्द की अनुभूतियों का खुलापन भी सतह पर आता है।
और अनुभूति की सघनता तो देखिये पुष्पिता ने उपन्यास में एक स्थान पर लिखा है कि- "सूरीनाम" की धरती ही नहीं, ब्रिटिश गयाना, फ्रेंच गयाना, वेनेजुएला, पेरु, चिली और ब्राजील आदि के जंगल या यूं कहें पूरे दक्षिण अमेरिका के जंगलों को देखकर ऐसा लगता है कि पृथ्वी का यह हिस्सा आज भी कुंआरी कन्या की तरह है। जंगल आज भी मौलिक रूप में जीवित है जिसे भोगवादी आँखों ने अभी तक स्पर्श नहीं किया है। या मानो इसे अभी सिगरेट की तरह सुलगाकर पिया नहीं है। यह आज भी कलुषता और कसैलेपन से परे है। इस धरती पर व्यवसाय और बिजनेस उस खुमार तक अभी नहीं पहुंचा है जहां पूरी धरती को डॉलर और यूरो तथा वाइन और बियर में बदल देने की साजिश चल रही हो। पता नहीं यह सब संतोष प्रकट करने के लिये लिखा गया है या फिर इसमें भी "आशंका" के गर्भस्थ सूत्र के संकेत लेखक अपनी शैली में देना चाहती हैं। जो भी हो "छिन्नमूल" को एक सम्पूर्ण उपन्यास की संज्ञा से नवाजे जाने में मुझे संकोच नहीं है। यह आलोचनीय उदारता नहीं यह सत्यनिष्ठ अनुभूति है।

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