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चीन में पश्चिम की बयार
01-Jan-2018 02:57 PM 1573     

शिल्पा जो हमारी पारिवारिक मित्र हैं, के घर से लौटते वक्त उस दिन हमने एपी प्लाजा घूमने का मन बना लिया। रेलवे स्टेशन जाने के लिए हमें जिस स्टेशन से ट्रेन पकड़नी थी उसी स्टेशन पर एपी प्लाजा है। यह शंघाई का बहुत बड़ा मार्केट है जिसमें कपड़े, जूते, बैग, खिलौनों से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान और ज्वैलरी सभी कुछ बिकता है। इस बाजार की खासियत यह है कि यहां ज्यादातर विदेशी ग्राहक ही आते हैं और जमकर मोल-भाव कराते हैं। विदेशियों के साथ डीलिंग करते-करते दुकानदार भी विदेशी भाषा बोलने लगे हैं। जी हां, विदेशी भाषा मतलब "अंग्रेजी"। चीन में रहते हुए मुझे चार साल हो गए हैं और यहां रहते हुए चीनियों के ऊपर हावी होती अंग्रेजीयत को देखकर कई बार मैं सोच में पड़ जाती हूं। विश्व की प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक चीन की संस्कृति पर जिस तरह से पश्चिमी संस्कृति का अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है, एक दिन यहां की युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से कोसों दूर हो जाएगी। ये अलग बात है कि वर्तमान में संपूर्ण विश्व "मिश्रित संस्कृति युग" में जी रहा है और भविष्य में संपूर्ण विश्व में एक ही संस्कृति बची रह जाएगी जो सभी संस्कृति के सम्मिश्रण से बनी होगी।
उस दिन एपी प्लाजा के पर्ल मार्केट में हमारी मुलाकात ब्राजील के दंपत्ति से हो गई। बातों-बातों में पता चला कि वे लोग भारत भ्रमण करते हुए चीन पहुँचे हैं। पति-पत्नी के साथ ब्राजील की एक पूरी टीम थी। हमें देखते ही वो एकदम से पूछ बैठे "वेयर आर यू फ्राम" मैंने कहा- "इंडिय"। इतना सुनते ही उनकी आंखें चमक उठी। फिर क्या था पर्ल मार्केट में खड़े-खड़े ही हमारी दोस्ती हो गई और भारत-चीन की बातें करते हुए उन्होंने बताया कि सन् 2010 में भी वो चीन आये थे, लेकिन तब के चीन और अब के चीन में बहुत फर्क आ चुका है। सड़कों और ईमारतों के अलावा लोगों के रहन-सहन में भी काफी बदलाव आ गया है। ये लोग तो बिल्कुल पश्चिमी संस्कृति में ढल चुके हैं। मुझे लगा मिसेस "एनी" ने मेरी जुबान की बातें छीन ली हों। अंग्रेजीयत इन पर इस कदर हावी होती जा रही है कि ये अपनी संस्कृति को भी भूलाते जा रहे हैं। अमेरिका जाना और अंग्रेजी में बातें करना चीन के युवा पीढ़ी का सबसे बड़ा सपना बनता जा रहा है।
शुरुआती दिनों की बात है, एक साल ही हुए होंगे हमें चीन आये हुए। मेट्रों से हम पति-पत्नि कहीं जा रहे थे, साथ की सीट पर एक महिला पांच-छह साल के बच्चे के साथ बैठी थी। हमें देखते ही वो पूछ बैठी "इंग्लिश"? "हांं" में मेरा सिर पूरी तरह से अभी हिला भी नहीं था कि अपने बेटे के बैग से अंग्रेजी की एक किताब निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दिया। बेटे से चीनी भाषा में कहा- इनसे अंग्रेजी पढ़ो। हद तो तब हो गई जब वो ट्रेन में ही मुझसे अंग्रेजी पढ़ाने को कहने लगी और मंजिल आने तक मैं उनके बेटे को अंग्रेजी पढ़ाती रही।
चीन के सभी सरकारी विद्यालयों में प्रारंभिक स्तर से ही अंग्रेजी अनिवार्य विषय के तौर पर पढ़ाया जाने लगा है, लेकिन यहां के उच्च मध्यम वर्गीय और मध्यम वर्गीय परिवार सरकारी स्कूल की अंग्रेजी पढ़ाई से संतुष्ट नहीं हैं। लिहाजा ये लोग अपने बच्चों को निजी अंग्रेजी कोचिंग संस्थान भेजते हैं या फिर सिर्फ अंग्रेजी के आकर्षण की वजह से उन्हें मँहगे निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में भेजते हैं। चाहे बच्चे शिक्षक की अंग्रेजी टोन को समझे या नहीं, पर पढ़ेंगे उसी स्कूल में।
इसे विडंबना ही कहेंगे कि चीन की तरक्की के पीछे जिस मैन्डरीन भाषा का अहम योगदान रहा है उस भाषा को बोलने वाले लोग आजकल अंग्रेजी बोलने वाले चीनी से खुद को कमतर महसूस करते हैं। अंग्रेजी ना बोल पाने की वजह से इनमें कहीं ना कहीं हीनभावना भी पनपती जा रही है। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत विकास की राह में बड़ा रोड़ा समझते हैं।
कुछ दिनों पहले की ही बात है मैं अपने अपार्टमेंट के नीचे ही अपनी दक्षिण भारतीय मित्र से फोन पर अंग्रेजी में बातें कर रही थी, जैसे ही हमारी बातचीत खत्म हुई हमारे ही अपार्टमेन्ट की एक चीनी महिला जो पास ही खड़ी थी मेरी तरफ आकर टूटी-फूटी अंग्रेजी मिश्रित चीनी भाषा में बोली- "इंडिया इंग्लिश योदा?" "नीदा इंग्लिश इज़ गुड" "इंडिया इंग्लिश फ्राम स्कूल"। मैं चीनी महिला की उत्सुकता को समझ गई और मैंने कहा यश- इंग्लिश, इंग्लिश फ्रॉम किंडर-गार्टेन इन इंडिया, वो यो हिंदी एंड इंग्लिश, लियांगा। (हां, भारत में अंग्रेजी बच्चे स्कूल से ही पढ़ते हैं) उस महिला ने जवाब में जो कहा उससे मैं अंचभित नहीं हुई। महिला ने कहा- हेन हॉव (बहुत अच्छा) चयांगो (चीन) मयो इंग्लिश (चीन में इंग्लिश नहीं है) बू हॉव (ये अच्छा नहीं है) वो याओ इंग्लिश, शबॉव-बॉव याओ इंग्लिश (हमें इंग्लिश आनी चाहिए, बच्चों को इंग्लिश आनी चाहिए)। मैं मुस्कुरा कर रह गई। महिला की बातों से यह स्पष्ट था कि यहां कि आम जनता अब अंग्रेजी की कमी महसूस करने लगी हैं।
ये सच है कि अंग्रेजी अब सिर्फ यूनाईटेड स्टेट ऑफ अमेरिका और यूनाईटेड किंगडम की भाषा नहीं रह गई है। धीरे-धीरे यह अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा बनती जा रही है। लेकिन, ये भी सच है कि चीन ने इतनी तरक्की अपनी भाषा के बूते ही की है। कंप्यूटर एप्लीकेशन से लेकर इंटरनेट बैंकिग, ऑन लाइन शॉपिंग साइट, सभी कुछ मैंडरीन भाषा में ही विकसित किया है। ऐसे में किसी भी काम के लिए चीनियों को किसी अंग्रेजी साइट पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। चिकित्सा के क्षेत्र में भी चीन ने काफी तरक्की की है और वो भी अपनी भाषा में। टीसीएम (चाइनीज़ ट्रेडिशनल मेडीसिन) आधुनिक अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से किसी मायने में कमतर नहीं है। इन्होंने अपनी भाषा का इस्तेमाल औषधि और चिकित्सा के क्षेत्र में जिस लगन और बुद्धिमत्ता से किया है वो इनके भाषा प्रेम को ही दर्शाता है।
यहां की एक बात जिससे मैं अत्यधिक प्रभावित हूं वो ये है कि चीन की बहुमुखी तरक्की में यहां की भाषा का विकास भी शामिल रहा है। यहां विज्ञान, तकनीकी, कला से लेकर अर्थशास्त्र, मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट हर प्रोफेशन और हर विषय की पढ़ाई मैंडरीन में ही होती है। भारतीय शिक्षा-व्यवस्था से विपरीत इन्हें किसी भी पढ़ाई के लिए अंग्रेजी का मुंह नहीं ताकना पड़ा है। इन्होंने हरेक विषय और प्रोफेशन की किताब को अपनी भाषा में प्रकाशित किया है। शायद यही के बड़ी वजह है कि बीस साल में चीन दुनिया की दूसरी आर्थिक ताकत बनकर खड़ा हो गया है।
जिस रफ्तार से चीन में विकास हुआ और निरंतर हो रहा है उससे पूरी दुनिया प्रभावित है। चाहे वो विश्व का सबसे लंबा ग्लास ब्रिज हो या फिर बहुमंजिली इमारतें बनाने की तकनीक, चीन ने सब कुछ अपने देश में ही विकसित तकनीक के बूते किया, लेकिन उससे भी ज्यादा जो बात प्रभावित करने वाली है वो ये है कि ये सभी तकनीक उन्होंने अपनी भाषा में विकसित की। अब तक का मेरा अनुभव यही कहता है कि चीन को आधुनिक चीन बनाने में यहां की सरकारी नीतियों के अलावा लोगों की कर्मठता, जीवन पद्धति, खान-पान और प्रकृति से लगाव के साथ यहां की भाषा का बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहा है। जानकारों के मुताबित बीते दिनों में चीन जब आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा था तब देश को उस स्थिति से उबारने के लिए यहां के लोगों ने अपना समय, अपना पैसा और अपना हुनर देश के नाम कर दिया। उस दौरान भाषा के क्षेत्र में भी लोगों ने बहुत काम किया और देश को एकसूत्र में बांधने के लिए अपनी भाषा का भरपूर फायदा उठाया। जबकि भारत की ही तरह चीन में भी भाषा और बोलियों की विविधता पाई जाती है।
बदलते परिवेश में स्थानीय लोग पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव की वजह से अंग्रेजी भाषा की जानकारी का अभाव महसूस करने लगे हैं। ये अंग्रेजी के आकर्षण का ही नतीजा है कि अंग्रेजी में बातें करना, बच्चों को मँहगे अंग्रेजी विद्यालय में भेजना चीनियों के लिए भी प्रतिष्ठा का विषय बनता जा रहा है। यही वजह है कि यहां अंग्रेजी मातृभाषा वाले देश के लोगों को अंग्रेजी शिक्षक की नौकरी आसानी से मिल जाती है। यह जरूरी नहीं कि उनके पास शिक्षक-प्रशिक्षण का अनुभव या सर्टिफिकेट हो ही। उनकी नौकरी में नेटिव स्पीकर कंट्री का पासपोर्ट होना ही उनकी योग्यता को साबित करता है।
कुछ पांच-सात साल पहले तक तो नेटिव कंट्री पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं थी सिर्फ उनकी चमड़ी का सफेद रंग ही शानदार वार्षिक पैकेज वाली अंग्रेजी शिक्षक/शिक्षिका की नौकरी दिलाने के लिए काफी था। पिछले कुछ सालों से वर्क वीजा के लिए नेटिव कंट्री का टैग जरूरी हो गया है। समय के साथ यूरोपीय देशों खासतौर पर अमेरिकी संस्कृति का बढ़ता प्रभाव चीन के भविष्य के लिए खतरा समझा जाने लगा है। चीन की युवा पीढ़ी जिस रफ्तार से यूरोपीय संस्कृति की गिरफ्त में आती जा रही है, यहां की संस्कृति के संरक्षकों के लिए यह चिंता का विषय बनता जा रहा है। अंग्रेजी चाल-चलन इन पर हावी होता जा रहा है लिहाजा इनकी समृद्ध सभ्यता युवाओं से दूर होती जा रही है। परिवारवाद धीरे-धीरे बिखराव में बदलता जा रहा है। विवाह की पुरानी परंपरा और उससे जुड़े रीति-रिवाज अब महज छोट-छोटे गांवों तक सिमट कर रह गये हैं। युवा पीढ़ी में तलाक और लिव-इन क्लचर फैशन बन गया है। चिंता इस बात की है कि जिस बुनियाद की वजह से चीन आज विकास की दौड़ में आगे है कहीं वो ही ना उखड़ जाए!

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