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विवादों में रहकर निर्विवाद
श्रद्धेय नामवर सिंह (93 वर्ष) के निधन से हिन्दी साहित्य जगत ने एक ऐसा महान सृजनशील साहित्यकार खो दिया है जो हिन्दी साहित्य के सृजन और मार्गदर्शन मूलक समीक्षा के प्रति बेहद समर्पित व्यक्तित्व था। कुछ लेखक जो भी नया करते हैं, विवादों में रहते हैं या...
हिन्दी आलोचना के डिक्टेटर नामवर सिंह
नामवर सिंह असाधारण प्रतिभा संपन्न आलोचक थे। असाधारण इसलिए कि उनकी पुस्तक "बकलम खुद" 1951 में छपी जब वे सिर्फ 24 साल के थे। "हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग" 1952 में छपी जब वे 25 साल के थे, "आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँँ" 1954 में छपी जब वे 2...
हिन्दी सम्पर्क की भाषा है और रहेगी
भारत से जुड़ा कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो हिंदी से अनभिज्ञ हो। और मैं सिर्फ़ उन शब्दों की बात नहीं कर रहा जो विश्व प्रसिद्ध हैं, जैसे मसाला, पण्डित या गुरू। मैं बात कर रहा हूँ, "दिल माँगे मोर" और "जय हो" जैसे जुमलों की। यदि हिंदी भाषा के विक...
निर्णायक मोड़ पर सभ्यता
भारत की सभ्यता के "हिमालय" पर आक्रमण करने वाली कोई बाहरी या विदेशी ताकत नहीं, बल्कि यह भारत की अपनी बात है, अंदरूनी बात है और यह अंदरूनी बात बड़ी सशक्त और ताकतवर है। यह इसकी विशेषता भी है और यह उसकी कमजोरी भी है। यह शक्ति या ताकत है- धर्म और धर्म क...
कुहासे में है धर्म
भारत के सामाजिक जीवन में प्राचीन काल से ही धर्म का विशेष स्थान रहा है। यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि धर्म सामाजिक जीवन का नियामक रहा है। भारतीय संविधान सभी धर्मावलम्बियों को समान मूलभूत अधिकार देता है। सभी धर्मों को एक ही धरातल पर स्वीकार करने वाली...
आधुनिक समय में धर्म और पाखंड
प्रारंभ में आदमी जंगल में रहता। शिकार करता और अपना पेट भरता। ये जंगल का कानून था। समय सबको बदलता है। इस व्यवस्था में बदलाव शुरू हुआ। पहले महिला-पुरूष अकेले थे। इसके बच्चे हुए। इनकी संख्या बढ़ी। धीरे-धीरे परिवार बनने बना।परिवार बनने के साथ इस ...
आचरण और दिखावे का द्वंद्व
भारत के एक क्रांतिकारी साहित्यकार ने कहा था : "सभी धर्म असत्य हैं, मिथ्या हैं, आदिम दिनों के कुसंस्कार हैं; विश्व-मानवता के इतने बड़े शत्रु और कोई नहीं।" तो अवश्य इसका कारण था। कड़वे शब्द होने के बावजूद भारत में पाखंडपूर्ण धार्मिकता को देख कर बड़ी दृ...
चीनी सिने परंपरा
सिनेमा उन्नीसवीं सदी का एक महत्वपूर्ण चमत्कार है जिसने पूरे विश्व में एक नयी सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक क्रांति लायी। सिनेमा समाज का एक ऐसा दर्पण है जो हमें भूत और वर्तमान का सजीव चित्र तो दिखाता ही है, साथ ही साथ भविष्य का भी दर्शन कराता है। स...
नीदरलैंड के फिल्म महोत्सव और यूरोप
भारत में वालीवुड और विश्व में हॉलीवुड का चकाचौंधी हल्ला है, जिसमें क्राइम, अंडरवल्र्ड के कारनामों और वारदातों के जोखिमों का जोश और शोर, जंग और जश्न का रुतबा दिखायी देता है, जिसमें मनुष्यता के घुटन की पीड़ा का दंश भी हुंकारता हुआ महसूस होता है, लेकि...
सिंगापुर की फ़िल्मी दुनिया
सिंगापुर में ये बात बहुत प्रियकर है कि यदि फ़िल्म अच्छी हो और सही तरहसे मार्केट की गई हो तो मलय, चीनी लोग भी हिंदी फ़िल्में देखने आते हैं।उदाहरण के लिए दंगल देखने वालों में बहुत-सी संख्या चीनी लोगों की थी।इससे पहले कि हम सिंग...
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