ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चलो विलायत
CATEGORY : रम्य रचना 01-Feb-2017 12:34 AM 626
चलो विलायत

आख़िर लोग यात्रा क्यों करते हैं? आराम से घर क्यों नहीं बैठते? लो यह भी कोई पूछने की बात है! यह तो इंसानी  फ़ितरत है साहब। सुना है ना कि खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। जब तक काम काज में मसरूफ़ रहे -- भलमनसाहत से घर में बैठे रहे; पर ज्यों ही फ़ुरसत के लम्हे मयस्सर हुये -- कुलबुलाने लगे कि अब क्या करें। सारे जहान में कुछ ना करने से ज़्यादा थकाने वाला काम कोई नहीं होता और बोरियत से ज़्यादा भयंकर कोई रोग नहीं होता। डॉक्टर को भी जब मरीज़ में सिर्फ बीमारी के लक्षण नज़र आते हैं लेकिन कोई बीमारी दिखाई नहीं देती तो वह हवा पानी बदलने का मशवरा दे देता है और दिल के बहलाने को कुछ विटामिन नुस्खे में लिख देता है।
अब अगर आप जलवायु परिवर्तन हेतु दूसरे शहर में बसे किसी रिश्तेदार के घर चले गये तो उसका हवा पानी प्रदूषित हो जाता है। वैसे आपका भी  सुधरने के बजाये और ख़राब हो जायेगा -- इसकी सम्भावना ज़्यादा है।
अगले ज़माने में समझदार लोग चार धाम की यात्रा पर निकल जाते थे। ठीक हो गये तो राम-राम और अगर सिधार गये तो जयराम जी की। अब जब सर पर क़फ़न बांध कर निकल ही पड़े तो क्या "राम नाम जपना" और क्या "राम नाम सत्य है" जपना! लेकिन दोस्तों वक़्त थोड़ा बदल गया है। लाख नये ज़माने की भत्र्सना करो, यह सच है कि जनसंख्या बढ़ने साथ-साथ मेडिकल साइंस ने भी तरक्की की है। इससे लोगों की उम्र भी बढ़ गयी है। पहले जहाँ पचास पार करते ही लोग बुज़ुर्गों में शुमार हो जाते थे और साठ के होते ही उन पर "सठिया" जाने का तमग़ा लग जाता था, वहां अब पचास वर्षीय तो जवान कहलाते हैं। सलमान खान को ही देख लो फिफ्टी प्लस हैं और अभी तक शादी भी नहीं हुई। अब तो कहते हैं कि ज़िन्दगी शुरू ही साठ के बाद होती है। बात भी सही है। पहले तो ज़िम्मेदारियों का बोझ जीने नहीं देता। कारोबार कहीं जाने नहीं देता। भइये और भी ग़म हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा। बस उम्र की हीरक जयंती मनाने के बाद ही "दीवाना कर दिया है गम-ए- रोज़गार ने" जैसे जुमलों से छुटकारा मिलता है। इतनी लम्बी तक़रीर का लुब्बेलुबाव ये है कि ज़िन्दगी मसलों से निवृत्ति के बाद ही अक्सर माहौल बदलने का ख़याल दिल में आता है। हमें भी आया। ख़ुशी की बात यह है कि हमारे बच्चों ने भी कह दिया "माँ आप कहीं घूम आओ"। अँधा क्या चाहे दो आíखें। हम पर्यटन के लिये तैयार!
साहबान! एक बात हम पहले ही साफ कर दें - कि हम चार धाम नहीं जाने वाले। क्यों? पहली बात तो यह कि बेवक़ूफ़ लोग जवानी में तो पहाड़ या अन्य खूबसूरत स्थानों पर जाते हैं "मज़े करने" और बुढ़ापे में गिरते पड़ते, मरते खपते यानि घनघोर कष्ट उठाते हुए तीरथ को जाते हैं। अरे यार अक्लमन्दी इसमें है कि जब तक शरीर में दम-खम है जाकर तीरथ कर आओ, ट्रेकिंग का भी मज़ा आ जायेगा। हम तो बचपन में मसूरी से देहरादून तक पैदल आये थे। आप कल्पना भी नहीं कर सकते क़ि पथरीले ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते पर उछलते कूदते हम कितनी मस्ती से घण्टों की यात्रा करके देहरादून पहुँचे थे - यह थी बिना प्लानिंग की ट्रेकिंग। आज भी उसे याद करके हमारा चेहरा खिल उठता है। दूसरी बात यह है जब सारा तीरथ (चार धाम सहित) हमने युवावस्था में कर लिया तो अब क्यों ना आराम से यात्रा करके आराम की जगह जायें। बरसों की मेहनत-मशक्कत और गम-ए-रोज़गार के बाद इतना हक़ तो बनता है कि बच्चों से सेवा करवायें। साहब कभी नाव पानी में तो कभी पानी नाव में, है ना!
इस बुद्धिमत्ता से लिये गये निर्णय के पश्चात कब यह तय करना बाकी रह जाता है कि जाना कहाँ है। लो इसमें सोचना क्या है? चलो विलायत! भाईजान पेड़-पौधे, नदी-झरने, पहाड़ और वादियाँ तो सभी जगह एक से होते हैं - सिर्फ रूप-रंग का अंतर होता है। लेकिन मुक्तलफ़ जगहों का खान-पान और परिधान वाक़ई मुख्तलफ़ होता है। यह अंतर ही पर्यटक के मस्तिष्क का विकास एवं विस्तार करता है। "ऐसा भी होता है?" और "ऐसा भी हो सकता है?" इस प्रकार के सवाल बुद्धि को धारदार कर देते हैं। हमें हमारे आरामगाह से निकाल लाते हैं; वरना तो हम कूप मण्डूक के कूप मण्डूक ही रह जायें।
यही कारण था हमारे विलायत भ्रमण का (भारत-भ्रमण की तो अधिक मात्रा - दृध्ड्ढद्ध ड्डदृद्मड्ढ - हो गयी थी) तो साहब हमारी पहली विदेश यात्रा थी - थाईलैंड की। बैंकॉक को विलायत नहीं कहा जा सकता। ये तो एकदम हिंदुस्तान जैसा है। वही भीड़, वही रास्ता-जाम, वही अनुशासनहीनता और पर्यटकों को लूटते वाहन चालक। इन सारी मुसीबतों को दरकिनार कर हम शहर घूमने (ड़त्द्यन्र् द्यदृद्वद्ध) के लिये निकले तो वही मन्दिर और मन्दिर में बुद्ध भगवान! लाहौल विला क़ूवत! क्या ज़रूरत थी हमें इतने पैसे खर्च करके हिंदुस्तान के बाहर जाने की?
अगली बार हमने सिंगापुर जाने का कार्यक्रम बनाया। भाईसाहब, पूरे दक्षिण एशिया में - थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपीन आदि में कभी भी घूम लो लेकिन विलायत सिर्फ सिंगापुर में मिलेगा। देखो भैया विलायत का अर्थ भले ही विदेश हो मगर इस लफ्ज़ की छवि बचपन से हमारे दिमाग में कुछ पश्चिमी जैसी रही है और मापदण्ड पर सिंगापुर सौ प्रतिशत पूरा उतरता है। वहाँ की स्वच्छता, अनुशासन, नागरिक भावना एकदम अनुकरणीय है। भैये अगर ग़लती से भी आप ने किसी दुकान या मॉल से कोई चीज़ उठा ली और बिना पैसे दिये निकलने की कोशिश की तो ख़ुदा क़सम सीधे हवालात की हवा खानी पड़ेगी। भारत की तरह आप किसी नेता के भी रिश्तेदार क्यों ना हों - कोई रियायत नहीं मिलेगी।
एक छोटा-सा रेतीला जज़ीरा है सिंगापुर। सब जानते हैं कि रेत में खजूर, नागफ़नी तथा कुछ और विशेष पेड़-पौधों के अतिरिक्त कुछ नहीं उगता। सिंगापुर के सांतोसा आइलैंड की हरीतिमा और पेड़-पौधों की विभिन्नता देख कर हम तो ऐसे शर्म से पानी पानी हो गये कि हमारी उपजाऊ मातृभूमि (भारत) में कोई ऐसा बाग़ नहीं है जिसे देख कर दिल बाग़-बाग़ हो जाये। हमारी बात झूठ लगे तो फिल्म वालों से पूछ लो। सिलसिला में  अमिताभ और रेखा को खूबसूरत ट्यूलिप फूलों के बीच नाचने-गाने के लिये एम्स्टर्डम क्यों जाना पड़ा। भारत में ही कहीं शूटिंग कर लेते। पर कैसे कर लेते? हमें तो काश्मीर का शालीमार बाग देखकर भी रोना आ रहा था - ऊँची दुकान फीका पकवान।
संतोसा जाने के लिये, यूँ तो आप बस या कार से भी जा सकते हैं लेकिन दुनिया की सबसे शानदार केबल कार भी फेबर पहाड़ से चलती है। दुनिया का सबसे बड़ा जलजीव कुंड (अरे भैया ठ्ठद्दद्वठ्ठद्धत्द्वथ्र्) जिसे द्वदड्डड्ढद्ध ध्र्ठ्ठद्यड्ढद्ध ध्र्दृद्धथ्ड्ड भी कहते हैं वहीं है। मतलब पर्यटन का असली आनंद लेना हो तो सिंगापुर और सिंगापुर में संतोसा अवश्य जायें।  
रेत और हरियाली का यूँ तो कोई मेल नहीं होता, लेकिन अगर क़ुदरत रेगिस्तान में नखलिस्तान बना सकती है तो क़ुदरत का बेहतरीन नमूना - आदमी, कोशिश तो कर ही सकता है। अरे जनाब इंसानी कोशिश ने हमें चौंका दिया जब हम गये दुबई। हम तो जाना ही नहीं चाहते थे -- कि कौन सूखी रेत और गगनचुम्बी इमारतें देखने जायेगा, वो भी पैसे खर्च के! हमें तो नदिया, झरने, पहाड़ और जंगल वगैहरा दिखा दीजिये बस! लेकिन हुज़ूर दुबई की हरियाली ने तो हमारे "बागों में बहार है" वाले गार्डन सिटी बंगलौर को भी  मात दे दी। दुबई से अबुधाबी तक जाने का रास्ता मानो जन्नत को जाने वाली सड़क हो। इस हरित रूपांतर का राज़ मालूम है? कहते हैं कि इसके लिए बाहर के मुल्कों से  मिट्टी मंगाई गयी और फिर पौधे। सिर्फ बीज बोने या कलम लगा देने से कोई ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता। परवरिश भी करनी पड़ती है। पता है वहाँ पेड़ या पेड़ की शाख़ काटने वालों के हाथ काट दिये जाते हैं। भारत का दुर्भाग्य है जहाँ फ्लाई ओवर बनाने के लिये एक हज़ार पेड़ समूचे कटवा दिये जाते हैं। नेता लोग ज़िंदाबाद!
चलिये आपको ले चलें झाड़ी-प्रदेश पर्थ में। आधे ऑस्ट्रेलिया के बराबर है पर्थ, वहाँ  का रेगिस्तानी पश्चिमी इलाका। संसार का दूसरा भारी हवा वाला शहर है पर्थ; पर कहीं भी हमने रेत उड़ती नहीं देखी; क्योंकि वहाँ सड़क के किनारे नाले और घरों के सामने हरी-हरी घास का कालीन सा बिछा रहता है। राजाज्ञा के अनुसार इस घास को हरा रखना घरवासी की ज़िम्मेदारी होती है, वरना। जी हाँ डंडे यानि कड़े अनुशासन के बिना किसी भी देश-राज्य की हालत हिंदुस्तान जैसी हो जायेगी। हाथ-कंगन को आरसी क्या, देखिये हमारा बागों का शहर, बंगलोर, कूड़े-कचरे का शहर बन गया, लोगों की उदासीनता तथा नेताओं की स्वार्थपरता के कारण।
यात्रा, पर्यटन, यहाँ तक कि यायागीरी या खानाबदोशी, कुछ भी कहिये, इनसे  हमारे दिमाग़ का विस्तार होता है। ज़हनी संकीर्णता दूर होती है। ज़्यादा क्या कहें, बस एक मुक्तक में बयाँ कर देते हैं :
घर से  निकले तो अलग खान पान देखा है
वतन से दूर हमने हर तरफ इंसान  देखा है
कितने अवतार सजा रखे हैं उसने  यारों
अनेकों रूप में हमने तो बस भगवान देखा है।

NEWSFLASH

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