ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चलो मन गंगा-जमुना के तीर
01-Apr-2016 12:00 AM 1825     

मन की शांति के लिए दरिया के किनारे से अच्छा स्थल और कोई नहीं हो सकता। रसखान के "कालिंदी कूल' में जितना आनंद है, उतना ही मथुरा के लोक गीतों में जमुना को लेकर है - आज ठाड़ो री बिहारी जमुना तट पे, मत जइयो री अकेली पनघट पे।
प्रयाग में तो गंगा और जमुना दोनों का संगम है। वैसे दोनों ही नदियां भारत के भिन्न स्थलों पर पायी जाती है। हेमंत कुमार का गाया, काबुलीवाला फिल्म का गीत मन में रस भर देता है - गंगा आये कहाँ से, गंगा जाये कहाँ रे, लहराए पानी में जैसे धूप-छाँह रे।
इसीलिए हर बरस नदियों के तट पर मेलों का आयोजन होता है। मेला क्या मिलने का बहाना है, लेकिन अब तो वो भी एक गुज़रा हुआ ज़माना है। अब तो होली, दिवाली और तीज ही ढंग से मना लें तो बहुत है। फिर भी मेलों का महत्व कुछ कम भले ही हो गया हो खत्म नहीं हुआ। ख़ास तौर पर बारह बरस के अंतराल पर आयोजित होने वाले मेले अभी भी लोगों को आकर्षित करते हैं।
मेला बड़ी विचित्र चीज़ है। इसका अभिप्राय तो होना चाहिये कि मेल-मिलाप कराये। लोग बाग़ मेले में जाते ही इसलिए हैं कि आपस में मेल-जोल बढ़े। नए-नए दोस्त बनें। लेकिन वस्तुत& होता क्या है? बेतरतीब भीड़-भड़क्का। इस क़दर रेलमपेल होती है कि नए लोग तो क्या मिलेंगे, पुराने भी बिछड़ जाते हैं। क्या आजकल के ट्रैफ़िक (यातायात) को लोग कोसते हैं! पूछिये उनसे कि सड़क वाली बात तो समझ में आती है किन्तु सड़क से हट कर मेले के अंदर जो बेचारी माँयें अपने नौनिहालों को संभालने में बावली हो जाती हैं। फिर भी एक आध बच्चा हाथ छुड़ा के इधर-उधर गुम हो ही जाता है।
अरे साहब फिल्म वाले इश्क़-मुहब्बत, चोरी-डकैती, अपहरण-फिरौती इत्यादि मसलों पर तो फ़िल्में बनाते ही हैं, लेकिन सबसे हिट फॉर्मूला-फिल्म अगर बनती है तो वह है- मेले में खोये और रेलवे स्टेशन पे पाये लोग। डार से बिछड़े (कृष्णा सोबती से क्षमा प्रार्थना सहित) पत्तों की मानिंद मेले में बिछड़े भाई-भाई, बड़े होकर किसी खलनायक की माँद में मिले। ये खोने-बिछड़ने और फिर मिलने का सिलसिला बचपन से जवानी तक की एक ऐसी यात्रा होती है, जिस पर पूरी पिक्चर नाच-गानों से लैस, रोमांच और रोमांस दोनों से प्लावित तथा मनोरंजन से भरपूर होती है। सवाल यह उठता है कि इस यात्रा की समय-सीमा कैसे निर्धारित की जाये। लो कर लो बात! फलों में फल - केला, तो मेलों में शिरोमणि- कुम्भ मेला। जी हाँ, बारह बरस के बाद आता है ये महा-कुम्भ। बस मसाला तैयार। बारह बरस की उमर में जुदा हो जाओ कुम्भ के मेले में और बारह साल के बाद चौबीस वर्ष के नौजवान बन कर नाचते गाते हुए पुन& कुम्भ के मेले में आताताइयों से लड़ते हुए फिर मिल जाओ। परफैक्ट!
खैर ये मिलना मिलाना तो होता रहेगा; कुछ दिलचस्प दृश्य देखने के लिए भी तैयार हो जाइये। एक बात बतायें - आप घर में बैठ कर या दफ्तर अथवा संसद भवन में अपने लैपटॉप या आई पैड पर (मोबाईल पर भी) कम कपड़ों (या बिना कपड़ों) वाली कन्या-कुमारियों की तस्वीरें देखेंगे तो आपको जेल यात्रा भी करनी पड़ सकती है। लेकिन हम आपको कुम्भ के मेले में ले चलते हैं - जी भर कर चिड़िया-दर्शन कीजियेगा (जी हाँ डत्द्धड्ड ध्र्ठ्ठद्यड़ण्त्दढ़! अंग्रेजी में ऐसे ही बोलते हैं जब आप सुंदरियों को निहार रहे होते हैं।)
बेचारी गरीब, जिप्सी, भील और भी ट्राइबल महिलाएं, जिनके पास नहा कर पहनने को दूसरा परिधान नहीं होता, वे पानी के अंदर जाते-जाते अपना घाघरा ऊपर उठाती जाती हैं (यानि गीला नहीं होने देतीं) और गले तक पानी में डुबकी लगते समय उसे सर पर रख लेती हैं। बाहर आते वक़्त वे उस घाघरे को नीचे सरकाती जाती हैं। उनकी लज्जा अक्षुण रहती है। फिर भी लोग इस उम्मीद में टकटकी लगाये रहते हैं कि कभी तो द्मथ्त्द्र द्वद्र होगा। वो चुटकुला सुना है ना कि एक साहब ने मोती रक़म खर्च करके हवाई जहाज़ की यात्रा सिर्फ इसलिए की कि खूबसूरत महिला मिलेगी सेवा करने को। उनका उतरा हुआ चेहरा देखने लायक था जब होस्टेस की जगह होस्ट (बकौल काका हाथरसी जैसे जला हुआ टोस्ट) मिला दिलजोई के वास्ते। ऐसे ही हादसे (चुटकुले) के शिकार आप भी हो सकते हैं -- जब आपको सद्यस्नाता कामिनियों के स्थान पर पूर्णतया वस्त्रहीन नागा बाबा नज़र आयें। सारे के सारे चिड़िया-दर्शक (डत्द्धड्डद्म-ध्र्ठ्ठद्यड़ण्ड्ढद्धद्म) आँखें सेंकने के बजाए आँखें चुराते दृष्टिगोचर होंगे। साहबान, कमाल की बात तो यह है कि आप मतलब, हिंदुत्व वाले, बजरंग दल, मौलवी और मुल्ला आदि पढ़ी-लिखी, संभ्रांत महिलाओं के मिनी स्कर्ट (जींस तक) पहनने पर ऐतराज़ (कभी कभी दंगा-फ़साद) कर देते हैं; लेकिन इन नागा बाबाओं की ओर नज़र उठा भी नहीं देख सकते (देखना भी नहीं चाहते) आखिर धार्मिक मेले का मामला जो ठहरा।
धर्म के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है। लश्कर-ए-तोइबा, आईएसआईएस वाले क़त्ल-ए-आम कर देते हैं, खाप वाले "सम्मान-वध' के नाम पे हत्या कर देते हैं। दरअसल सारे फ़साद की जड़ ही धर्म की बंद सोच है। सभी इंसान दोस्त होते हैं, लेकिन हिन्दू मुसलमान ईसाई बनते ही जानी-दुश्मन बन जाते हैं। बनो भाई बनो और मरो-खपो; मगर बन्दापरवर प्रकृति, कुदरत, नेचर को तो बक्श दो। दोस्तों वातावरण को शुद्ध रखो भले ही अपने दिमाग में भरी गंदगी को बरकरार रखो। लाखों का समूह मेले में आता है - खाता-पीता भी है। खाओ भाई। जीभर के खाओ - पेट भर के खाओ; मगर उसके बाद कागज़-पत्तर, प्लास्टिक इत्यादि बटोरकर कहीं मुनासिब जगह पर तो रख दो। यह क्या कि खाया-पिया और फेंका।
चलो यह तो भारतीय स्पेशल मानसिकता है कि घर का कचरा पड़ोसी के घर फेंक दो, लेकिन धर्म के नाम पे जो हवन आदि होते हैं उनके औचित्य पर पुनर्विचार करना होगा। प्राचीनकाल में जब देश का आधा - बल्कि ज़्यादा ही - जंगल से भरा हुआ था, तब हवन आदि का एक उद्देश्य होता था। समय के साथ परिवर्तन आवश्यक है। हम आजकल भोजपत्र पर तो नहीं लिखते - काग़ज़ पर लिखते हैं। अपनी सुविधा के लिए हम हर बदलाव मंज़ूर कर लेते हैं; तो फिर बेहतर भविष्य के लिए क्यों नहीं गैरज़रूरी परम्पराओं को बदला जा सकता? जंगलों की संख्या कम होने से वि·ा-ग्रीष्मता (ढ़थ्दृडठ्ठथ्-ध्र्ठ्ठद्धदत्दढ़) बढ़ रही है। ऐसे में पेड़ काट कर हरीतिमा को कम करना, क्या हमारे मौसम, हमारी प्राणवायु तथा हमारे वातावरण के लिए हानिकारक नहीं है? हम गंगा घाट कार में जाने की चेष्टा करते हैं (क्यों भाई पैदल क्यों नहीं चल सकते, वह भी जूते उतार के नंगे पैर); परन्तु वातावरण की स्वच्छता एवं सुरक्षा के लिए पुरानी और बेकार हो चुकी मान्यताओं को नहीं छोड़ सकते?
सचमुच अगर व्यवस्था सही हो और लोगों में अपने देश, संस्कृति के प्रति जागरूकता आ जाये तो बारह बरस में एक बार आने वाला कुम्भ मेला अपने आप में एक असाधारण और अप्रतिम घटना बन जाये। विदेशों में इतना बड़ा जनसमूह एकत्रित करने के लिए केवल विज्ञापन पर ही कितना खर्च पड़ सकता है इसका अंदाज़ा भी लगाना मुश्किल है। विदेशी पर्यटक तो इस भीड़ को देख कर ही चकित रह जाते हैं। काश हम उन्हें अपनी व्यवस्था और सफाई से भी आश्चर्य चकित कर पाते।
हमने भी प्रयाग का कुम्भ देखा है - बचपन में। बावजूद "अति विशिष्ट व्यक्ति' की शान से गंगा स्नान करके भी हमने दोबारा ऐसे किसी मेले में ना जाने का निर्णय ले लिया था और कभी गये भी नहीं। हमारी छोड़िये। जनसाधारण की बात करें तो अभी भी मेले के नाम से लोगों का मन आनंदित हो जाता है। जनता की इस ललक का बॉलीवुड ने खूब फायदा उठाया है। मेले का मौसम आते ही रेडियो और टीवी पर मेला संबंधित गीतों की बौछार आ जाती है। कुछ भी हो भारत की मिट्टी की सुगंध भरे गीतों का अंदाज़ बस अपना ही है। हमें भी लोगों ने अक्सर गुनगुनाते हुए पकड़ा है -- आगरे का घाघरा मंगवा दे रसिया, कि मैं तो मेला देखन जाऊँगी।
तो साहब इस बार सिंहस्थ कुम्भ उज्जयनी में क्षिप्रा नदी के किनारे आयोजित हो रहा है, मन हमारा भी डोल रहा है। जी बहलाने के लिये चलो गाना ही गा लिया जाये ----
चलो मन गंगा-जमुना के तीर
बंसी बजावत, गावत कान्हा
संग लियो बलवीर
मोर मुकुट पीतांबर सोहे
कुंडल झलकत हीर।

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