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चले गए अनुपम भाई
01-Jan-2017 11:50 PM 3592     

उन दिनों कॉलेज में था। आपातकाल में सेंसरशिप का विरोध करते हुए पत्रकारिता की शुरुआत हो गई थी। शायद उन्नीस सौ पचहत्तर या छियत्तर के आसपास अनुपम भाई से मुलाक़ात हुई थी और तब से लेकर उनके आख़िरी सफ़र पर जाने तक एक बड़े भाई जैसा स्नेह उनसे मिलता रहा। गंभीर बीमारी के बावजूद उनमें एक चुंबकीय ऊर्जा का अहसास होता था। उन दिनों चंबल घाटी डाकुओं के खौफ से थर्राती थी। डाकू मोहरसिंह और डाकू माधोसिंह जैसे गिरोह राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सरकारों के लिए मुसीबत बन गए थे। तब लोगों को विनोबा भावे के डाकू समर्पण अभियान की याद आई थी और लोकनायक जयप्रकाश नारायण दूसरे डाकू आत्मसमर्पण अभियान के सूत्रधार बने थे। लेकिन इसकी तैयारियाँ तो महीनों पहले शुरू हो गई थीं। चंबल के खूंखार डाकू गिरोहों से संपर्क करने और उन्हें हथियार डालने के लिए तीन लोगों ने परदे के पीछे बड़ी भूमिका निभाई थी। ये थे - प्रभाष जोशी, अनुपम मिश्र और श्रवण कुमार गर्ग। इन लोगों ने महीनों तक बीहड़ों की खाक़ छानी, बिना किसी सुरक्षा के डाकू गिरोहों की मांद में पहुंचे और उन्हें समर्पण के लिए मनाया। यह समर्पण अभियान आज भी चंबल घाटी का सबसे क़ामयाब अभियान माना जाता है। इसके बाद इन तीनों ने एक किताब लिखी - चंबल की बंदूकें गांधी के चरणों में। यह इस अभियान का इकलौता प्रामाणिक दस्तावेज़ है। उन दिनों बुन्देलखण्ड के एक पिछड़े ज़िले के एक निहायत क़स्बाई मानसिकता वाले एक पत्रकार के लिए अनुपम भाई एक सितारे से कम नहीं थे। मेरा इलाक़ा भी डाकू गिरोहों के खौफ़ से थर्राता था। ऐसे में कोई चंबल घाटी के दुर्दान्त डाकू गिरोहों को हथियार डालने के लिए मज़बूर कर देता है तो वो तो उस दौर के पत्रकारों के लिए हीरो से कम नहीं था। अनुपम भाई की इस ताक़त का अहसास उनसे मिलने के बाद ही हो जाता था। उसके बाद नईदुनिया, नवभारत टाइम्स, दूरदर्शन, आजतक तथा अन्य मीडिया संस्थानों में काम करते हुए उनसे लगातार मुलाक़ातें होतीं रहीं। उनके गांधीवादी चिंतन और पर्यावरण के प्रति सरोकारों का पता तो बाद में चला।
वैसे तो "हमारा पर्यावरण" और "राजस्थान की रजत बूंदों" के ज़रिए उन्होंने अपने पाठकों को सम्मोहन से बाँध लिया था। लेकिन "आज भी खरे हैं तालाब" ने तो एक बार फिर अनुपम भाई को हमारा स्टार बना दिया था। हमने उनकी मेहनत देखी थी। ओह! लगता था ये इंसान नहीं फ़रिश्ता है और दुनिया को बदल कर छोड़ेगा। अनुपम ने अपनी इस किताब से जो करिश्मा किया, वो बेमिसाल है। आज भारत में किसी लेखक की कोई किताब हज़ार डेढ़ हज़ार बिक जातीं है तो वो आसमान में उड़ने लगता है। लेकिन जिस किताब को अनुपम भाई ने रचा है, वो तो अदभुत है। दस साल तक देश भर में घूमे, सारे देश के तालाबों का अध्ययन किया, उनकी बदहाली देखी, हमारी संस्कृति से उसका रिश्ता समझा और फिर उनकी कलम से ये अनमोल कृति निकली। सन् 1993 में यह किताब छपकर पाठकों के हाथों में आई। मैंने इसे 1994 में पढ़ा। एक बार। दो बार। तीन बार। न जाने कितने बार। न यह बेस्ट सेलर श्रेणी में थी, न इसमें घटिया अश्लील भाषा थी और न चटखारे लेकर लिखी गई किसी की अंतरंग कहानियाँ। यह किताब एक सुबूत है कि गंभीर सरोकारों और पर्यावरण जैसे विषय पर आप समाज की चिंताओं के साथ खड़े हों तो समाज भी आपको सर पर बिठाता है। इस किंवदंती की एक झलक। अब तक गांधी शान्ति प्रतिष्ठान इस किताब की दो लाख से ज़्यादा प्रतियां बेच चुका है। क़रीब 18 साल तक हर साल एक लाख रुपए कमाने के बाद अब प्रतिष्ठान ने मुनाफे और कॉपीराइट से मुक्त कर दिया है क्योंकि माँग इतनी है कि आपूर्ति संभव नहीं। इसलिए पिछले पांच साल में अनगिनत प्रकाशकों ने इसे छापा है। जानकारी के मुताबिक इस तरह क़रीब दस लाख प्रतियां बिकीं हैं। नेशनल बुक ट्रस्ट और अन्य आठ प्रकाशन समूहों ने इसे आठ भाषाओं में अनुवाद कर प्रकाशित किया है। किताब का ब्रेल अनुवाद उपलब्ध है। आठ भाषाओं और ब्रेल के क़रीब 40 संस्करण बाज़ार में आ चुके हैं। इक्कीस आकाशवाणी केंद्रों ने इसे पूरा प्रसारित किया है। एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं। अनेक बार उर्दू में यह एक ग्रन्थ की शक़्ल में आया। इसे संपादक शब्बीर क़ादरी ने प्रकाशित किया है। निरुपमा अधिकारी ने इसे बांग्ला भाषा में अनुवाद किया। बांग्ला में तो लोग इस पर टूट पड़े। सुहासिनी मुले ने इस किताब पर एक फिल्म "नेचर टुडे" बनाई। क़रीब एक दर्ज़न डाक्यूमेंट्री इस पर बन चुकीं हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय ने अच्छी हिंदी के पाठ्यक्रम में इस किताब के अंश प्रकाशित किए हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने इस किताब की 25 हज़ार किताबों का ऑर्डर किया। गांधी शान्ति प्रतिष्ठान इतनी संख्या में जब नहीं दे पाया तो सरकार ने अपने प्रेस में छपा कर किताबें गांव-गांव बंटवाई। भारत ज्ञान विज्ञान परिषद् ने भी यही किया। इसकी 25 हज़ार प्रतियां खुद छपवाईं। जिसे हम सक्सेस स्टोरी कहते हैं - इस किताब के आगे सारी सक्सेस स्टोरीज़ दम तोड़ जाती हैं। गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक और न जाने कितने राज्यों के हज़ारों गाँवों में किताब से प्रेरणा लेकर अनगिनत तालाब और छोटी-छोटी नदियाँ ज़िंदा की गईं। गुजरात में सैकड़ों गाँवों में अनुपम भाई की मौजूदगी में ये काम हुए। जब ढोल धमाकों के साथ अनुपम भाई का स्वागत होता तो बेचारे अनुपम भाई सकुचाते एक कोने में बैठ जाते। चिपको आंदोलन और राजेन्द्र सिंह के जल आंदोलन के वो स्तंभ रहे हैं। आज जब हर किताब में कॉपीराइट एक्ट के तहत सर्वाधिकार सुरक्षित मुद्रित होता है तो अनुपम भाई कहते थे - इसका कोई कॉपीराइट नहीं है। कोई भी इस्तेमाल कर सकता है। स्रोत दें तो अच्छा लगेगा। बताइए यह क्या गांधी या बिनोबा का कोई 2016 का अवतार नहीं था। हमारे असली भारत रत्न थे अनुपम भाई। आख़िरी मुलाक़ात में अनुपम भाई से मैंने मध्यप्रदेश की दो पत्रिकाओं का ज़िक्ऱ किया था। एक जबलपुर से जयंत भाई के संपादन में अठारह साल से निकल रही "नीतिमार्ग" और दूसरी भोपाल से आत्माराम शर्मा की "गर्भनाल"। नीतिमार्ग के तो वो पहले से मुरीद थे, लेकिन "गर्भनाल" के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी। संयोग से उन्हीं दिनों नीलम कुलश्रेष्ठ ने गर्भनाल में "आज भी खरे हैं तालाब" पर एक अच्छा आलेख लिखा था। मैंने उन्हें दिया तो एकदम बच्चों की तरह खुश हो गए। गर्भनाल के कुछ और अंक मैंने दिए। उन्होंने एक-एक शब्द पढ़ा। बाद में उनका एक सन्देश मिला - गर्भनाल के बारे में बताने के लिए आभार।
अनुपम भाई के बाद आज उन जैसा मुझे एक भी व्यक्तित्व नहीं दिखाई देता। अलविदा! अनुपम भाई! आप हमेशा हमारे दिलों में बसे रहेंगे।

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