ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चल सन्यासी मंदिर में
01-Mar-2016 12:00 AM 1307     

साहबान! सन्यासी या तो मंदिर में जायेगा या जंगल में। ग़लत! डार्विन के अनुसार जब बन्दर ड्ढध्दृथ्ध्ड्ढ होकर इंसान बन सकता है तो साधु व्यापारी क्यों नहीं बन सकता? बन सकता नहीं हुज़ूर बन चुका है। सुना नहीं -- नीचे पान की दुकान, ऊपर गोरी का मकान और बिचली मंज़िल पर विराजमान हैं धर्म के ठेकेदार -- सावधान! सावधान!
अंग्रेजी में एक कहावत है 'द्धड्ढथ्त्ढ़त्दृद त्द्म द्यण्ड्ढ दृद्रत्द्वथ्र् दृढ थ्र्ठ्ठद्मद्मड्ढद्म' अर्थात धर्म भीड़ के लिए, भांग यानि चरस और गांजे के समान है। इसका नशा सर चढ़ कर बोलता है। भक्तों को अन्धश्रद्धा का ऐसा पाठ पढ़ाया जाता है कि वे अक़्ल को ताक पर रख कर सही-गलत में अंतर करना भूल जाते हैं। भूल जाते हैं कि ये तथाकथित पैग़ंबर, मसीहा, साधु, संत आदि सब इंसान हैं ना कि ई?ार या ई?ार का अवतार। इनमें भी इंसानी कमज़ोरियाँ उतनी ही मात्रा में पाई जाती हैं जितनी हममें और आपमें। कहने को तो हम भी कह सकते हैं कि हम बहुत आध्यात्मिक व्यक्ति हैं - जो कि हम हैं; लेकिन यह बात हम डंके की चोट पर (टेलीविज़न के पर्दे पर या भीड़ जमा करके) नहीं कहते। अरे भैया हम जो हैं सो हैं। ये हल्ला बोल वाली फ़ितरत उन लोगों की होती है जो वो नहीं होते जो दिखाते हैं। हाँ हम चमत्कार नहीं कर सकते। बाबा लोग कर सकते हैं। तो क्या हुआ! इस हिसाब से पीसी सरकार, जो इतने बड़े जादूगर थे, बहुत बड़े संत या बाबा माने जाने चाहिए। वो तो सांई बाबा से भी ज़्यादा बड़े करतब दिखाते थे। बाबा तो बस एक चुटकी भस्म हवा में से निकालते थे मगर जादूगर सरकार तो टोपी में से खरगोश निकल लेते थे।
ख़ैर, मुद्दा यह है कि बाबा लोग चरस, गाँजा, पान, भांग ना जाने क्या क्या खाते हैं; अघोरी तो... चलें छोड़ें वो क़िस्सा फिर कभी। देवदासी प्रथा भी इन्ही बाबाओं की बनाई हुई थी। शनि के मंदिर में औरतों का प्रवेश निषेध भी इन्हीं की करतूत है। निषेध तो विधवा विवाह भी था। परम्परा तो सती होने की भी थी। यह सब स्त्री विरोधी परम्पराएँ समाप्त की गयीं ना। शनि मंदिर निषेध बरकरार है। पिटने का डर ना हो तो ये लोग देवदासियों को भी पुनर्जीवित कर दें। बिना देवदासी के भी आसाराम जैसे बाबा ने कौन सी कसर छोड़ दी।
सबरीमला के एक पंडित ने कहा कि प्रवेश निषेध तो 10 से 50 वर्ष की आयु तक की स्त्रियों के लिए है। जवान औरतों को देख कर हमारा ध्यान भटक जाता है। सही बात! वि?ाामित्र जैसे संत का ध्यान भी मेनका को देख कर भटक गया था, ये तो उनके सामने छछूंदर भी नहीं हैं; लेकिन कोई हमें बतायेगा कि ये ध्यान भटकना - ये असंयम किसकी गलती है? महाज्ञानी, महापुरुष संत महाराज की या स्त्रियों की? भक्तों की जमात में शामिल साधारण पुरुष असंयम की बात करें तो समझ में आता है लेकिन ये बाबा किस मुंह से संत बनते हैं? अगर हमारा मन आम देख कर ललचा जाता है तो क्या आम उगाना बंद कर दें? अरे इनसे अच्छी औरतें हैं जो हैं जो बिना ज्ञान ध्यान और पंडिताई का दावा किये मर्यादा से नहीं भटकतीं वरना वो भी दो चार देवदास रख लेतीं।
चलिए गोरी को ऊपर के मकान में छोड़ते हैं और नीचे पान की दुकान पर आते हैं। पान की दुकान यानि भानुमति का पिटारा। जिस चीज़ की दरकार हो वो हाज़िर है। भई व्यापार है। हाँ तो धर्म का व्यवसाय करने वाले बाबा लोग भी अपना व्यापार हर दिशा में फैला देते हैं।
पतंजलि ब्राांड किस क़दर मशहूर हो रहा है। चंदन के हार, देसी मसाले और गाय के घी तक तो ठीक था। लेकिन बाबा तो नूडल्स भी बेचने लगे -- उसके लिए बेचारी मैगी पर बैन लगवा दिया। बतौर गब्बर "बहुत नाइंसाफी है।'
बाबा रहीम (गुरमीत) आजकल बड़ी सुर्ख़ियों में हैं। वे तो फिल्मों में भी अदाकारी दिखाते हैं। नाचते गाते हैं। काफ़ी रंगीन मिज़ाज हैं। वे भी एक फ़ूड चेन चलाने की योजना बना रहे हैं। भाई लोगों परंपरा तो यह भी है कि सन्यासी को भौतिकता से दूर रहना चाहिए। आध्यात्म में अधिक व्यस्त रहना चाहिए। फ़ूड चेन बना कर, नूडल्स और बिस्कुट आदि बेचकर - वस्तुतः बनियागीरी करके - क्या ये संत महानुभाव परम्परा नहीं तोड़ रहे? नहीं जी यह तो प्रगतिशीलता है, विकास है।
बस ये आधुनिकता का आवरण औरतों के मामले में मुखौटे की भांति उतर जाता है और इनका असली चेहरा सामने आ जाता है। हमेशा आपस में मारकाट करने वाले पंडित और मुल्ला औरतों के मसले पर एकमत हो जाते हैं। कहाँ और किस तरह औरतों को नीचा दिखाया जाये ऐसा कोई मौका ये धर्माधिकारी नहीं छोड़ते। दरअसल औरतों को चाहिए कि वे आडंबर वाले धर्म को एकदम त्याग दें। फिर देखिये इन मज़हबी ठेकेदारों का आधा धंधा सेंसेक्स की भांति क्रैश हो जायेगा। बचपन में गया करते थे -
नीम हाकिम खतरा-ए-जान, नीम मौलवी खतरा-ए-ईमान
वो पंडित जाये भाड़ में, औरत का ना करे सम्मान
वीर तुम बढ़े चलो : इस इलेक्ट्रॉनिक्स के ज़माने में हमारे बच्चे पुरानी पीढ़ी से कहीं ज़्यादा बुद्धिमान हो गए हैं। अंततः वह कहावत सही हो ही गयी - कटोरे में कटोरा, बेटा बाप से भी गोरा। बहुत अच्छा है। केवल गुरू और पिता ही अपने नौनिहाल को अपने से अधिक सफल देखना पसंद करते हैं। बाकी लोग तो बस जलते कुढ़ते रहते हैं। मगर साहबान हमें यह नहीं पता था कि ये इलेक्ट्रॉनिक यंत्र हमारे बच्चों को बहादुर भी बना देंगे। देखिये ना अपने भारत के दिल - दिल्ली के जाने-माने विद्यालय जेएनयू और जाधवपुर वि?ाविद्यालय के छात्र खुले आम जान हथेली पर रख कर पाकिस्तान के झंडे लहराएंगे -- अफज़ल गुरु को शहीद बतायेंगे। ऐसा करते वक़्त ना तो के उनके दिल में कोई खौफ होगा, ना ही आँखों में किसी क़िस्म की पशेमानी। ऊपर से तुर्रा यह कि पुलिस और सरकार जब वाजिब कार्यवाही करती है तो वे सीना तान कर "अभिव्यक्ति की आज़ादी' की बात करते हैं। इस आज़ादी के तहत क्या वो अपने अम्मा-बाबा को भी गाली दे देंगे?
अब जब दिल्ली बोले तो कोलकाता वाले कैसे पीछे रह जाते! तू डाल-डाल तो मैं पात-पात। तो भैया जाधवपुर विद्यालय ने भी दे दिए मार्चिंग ऑर्डर। सारे के सारे विद्यार्थी (कौन-सी विद्या?) लेफ्ट राइट, लेफ्ट राइट करते हुये निकल आये "आज़ादी आज़ादी' का नारा लगाते हुये।
अरे यार दे दो ना इन्हें आज़ादी। या तो जलावतन करके भारत देश से आज़ाद कर दो (वीसा ज़ब्त कर लेना) या सीधे ज़िंदगी से आज़ाद करके अफज़ल गुरु के पास भेज दो। कुछ गंदगी ही साफ़ हो जायेगी - भारत स्वच्छ हो जायेगा। अफज़ल भी खुश हो जायेगा यार - दोस्तों से मिल कर। वो शेर सुना है ना --

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