ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
चल हंसा वा देस
01-Jun-2016 12:00 AM 2431     

अपना देश, खासकर मध्यकालीन भारत फ़क़ीरों का देश रहा है। अरबी का एक मूल है -फ़-क़-र, जिसका अर्थ है - निर्धनता। इसी मूल से फ़क़ीर शब्द की निष्पत्ति हुई है। फ़क़ीर परंपरा को मध्यकाल में देश पर बाह्र आक्रमणों के कारण हुई सामाजिक और आर्थिक विषमता की उपज माना जा सकता है। इन मध्यकालीन फ़क़ीरों को समकालीन भारतीय समाज में संत और साधु कहा गया। महाभारत में संत को सत्य की संतति माना गया है। निर्धनता या फक़ीरी में सत्य पर कायम रहना जनसाधारण के लिए मु¶िकल है। संत ही इस वैषम्य में सत्य पर दृढ रह सकते हैं; अतएव फ़क़ीर संत कहलाए।
फक़ीरी बंधनकारी है और अमीरी इस संसार में मुक्ति का द्वार खोलती है। फिर चतुर्विध पुरुषार्थों - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के क्रमिक अनुसरण के बिना मुक्ति कैसे सम्भव हो सकती है? कैसे बिना अर्थ-सामथ्र्य और कामना की पूर्णता के बिना वंचित वर्ग सुखी हो सकते हैं? वर्णाश्रम व्यवस्था में सर्वाधिक वंचित वर्ग कैसे मुक्तिपथ पर बढ़ सकते हैं? कैसे मानव समाज बिना किसी भेदभाव के निःश्रेयस और अभ्युदय की ओर बढ़ सकता है? इन नानाविध चिंताओं को इन साधुओं ने साध लिया था कि भक्ति से ही मुक्ति सम्भव है। भक्ति शब्द की निष्पत्ति "भज्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ है - सेवा करना। सही अर्थों में इन संतों ने मानव को ई·ार का अंश मान श्रद्धा और प्रेम से मानवता की सच्ची सेवा की।
मध्यकालीन भारतीय संतों की इस परम्परा में कबीरदास आज के संदर्भ में सर्वाधिक प्रासंगिक कहे जा सकते हैं। कबीर निर्गुण भक्ति काव्यधारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। निर्गुण भक्ति काव्य की ज्ञानाश्रयी शाखा को संत काव्य भी कहा जाता है और इसकी भाषा सधुक्कड़ी कहलाती है। निर्विवाद रूप से, कबीर ज्ञानाश्रयी भक्ति काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। अरबी मूल क-ब-र का अर्थ है - महानता। इसी से कबीर और अकबर जैसे शब्द आये। संयोगवश कबीर और अकबर दोनों ही भारतीय इतिहास में अपने-अपने क्षेत्रों में महान हुए। कबीर निर्धन और निम्नवर्गीय बुनकर थे। सम्भवतः भक्ति आंदोलन के आरंभिक चरण में ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्य कवियों की तरह उन्हें धार्मिक और सामाजिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा होगा। वेदों को पढ़ने की आज्ञा नहीं होगी, छुआछूत का ¶िाकार होना पड़ा होगा या फिर मंदिर में उनका प्रवेश निषिद्ध किया गया होगा। इसी कारण वर्णाश्रम व्यवस्था, धार्मिक बाह्र आडम्बर और कुरीतियों के ख़िलाफ़ उनकी आवाज मुखर हुई होगी। वैसे, कबीर से काफी पहले नाथ और सिद्ध संप्रदाय के साधुओं ने जाति प्रथा का विरोध शुरू कर दिया था।
भक्तिमत धर्म के क्षेत्र में समानता के व्यवहार को लेकर आया। आरंभिक संतों जैसे ज्ञाने·ार, नामदेव आदि ने भक्ति का प्रचार करते हुए इंसानी भाईचारे पर बल दिया। फिर कबीर, रैदास, नानकदेव आदि सभी निर्गुण काव्यधारा के ज्ञानाश्रयी कवियों ने भक्ति काव्य को केवल ई·ारीय उपासना तक सीमित न रखकर उसे व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ा।
कबीर स्वयं अनपढ़ थे और उनके पदों को उनके ¶िाष्यों के द्वारा लिपिबद्ध किया गया या गायन परम्परा में आगे बढ़ाया गया। इस कारण उनकी रचनाओं की प्रामाणिकता का निर्धारण कठिन रहा है, अपितु प्रसिद्ध है कि उनके प्रमुख ¶िाष्य धर्मदास ने सबसे पहले उनकी बानियों का संग्रह "बीजक' के नाम से तैयार किया। बीजक का अर्थ है - गुप्त धन बताने वाली सूची अर्थात् शब्द रूपी बीजक या गुरु प्रदत्त ज्ञान धन की सूची। बीजक के तीन भाग हैं - साखी (साक्षी सहित या आँखों देखी), सबद (शब्द कीत्र्तन) और रमैनी (परम तत्त्व में रमाने वाली)।
कबीर का रचना संसार व्यापक है और पत्रिका के एक अंक में उसका आकलन कर पाना कठिन है; तथापि वत्र्तमान संदर्भ में उनका मूल्यांकन धार्मिक बाह्राचार का खण्डन करने वाले, जाति प्रथा के विरोधी, हिन्दू-मुस्लिम समन्वय के पक्षधर, रहस्यवादी और हठयोगी के रूप में की जा सकती है।
जून का महीना अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का महीना भी है। ध्यातव्य है कि कबीर ने अपनी रचनाओं में हठयोग के कुछ सिद्धांतों का भी प्रयोग किया। हठयोग का प्रभाव कबीर पर नाथपंथ के कारण था। योग का अर्थ है- जुड़ना। आत्मा का परमात्मा से मिलन ही योग है। योग के कई रूप हैं- ज्ञानयोग, कर्मयोग, राजयोग, हठयोग आदि। हठयोग अंगों और ·ाास पर नियंत्रण प्राप्त कर की जाने वाली साधना पद्धति है, जो मानव को शारीरिक और मानसिक विकारों से मुक्त करती हुई अध्यात्म की ओर उन्मुख करती है।
यह कहना समीचीन होगा कि कई अर्थों में कबीर अपने समय के आगे थे। आज हम जिन मानव सत्यों को पहचान सके हैं और उन्हें मानव मूल्यों के रूप में अंगीकार कर चुके हैं, उन्हें कबीर ने नितांत विरोधी परिस्थितियों में खोज लिया था। यद्यपि कबीर के समय की सीमा उनके नारी संबंधी दृष्टिकोणों में परिलक्षित हुई है, तथापि उन्हें हठयोगी मानकर इसे दरकिनार किया जा सकता है। उस युग में उन्होंने एक ऐसे मानव धर्म की स्थापना का प्रयास किया, जिसकी सत्यता और प्रासंगिकता उनके अवसान के शताब्दियों बाद पहचानी गयी।
आज धर्म के नाम पर सम्पूर्ण वि·ा सांप्रदायिक और मज़हबी उन्माद के दावानल में जल रहा है। भारतीय सहिष्णुतामूलक समाज भी इससे अछूता नहीं रह पा रहा है। धर्म, सम्प्रदाय, जाति, वर्ण के नाम पर लोगों में कबीर के समय से अधिक भेदभाव और घृणा है। वै·िाक स्तर पर धार्मिक उन्माद आतंकवाद का पर्याय होता जा रहा है। 21वीं शताब्दी में भी लोग अंधवि·ाासों और मज़हबी हिंसा में लीन हो रहे हैं। ऐसे समय में कबीर का मूल्यांकन ज़रूरी है, जो यह एहसास करा सके कि इस संसार में कुछ भी सत्य नहीं है सिवाय मानव प्रेम के।
चल हंसा वा देस जहँ पिया बसे चितचोर।
सुरत सोहासिन है पनिहारिन, भरै टाढ़ बिन डोर।।
वहि देसवाँ बादर न उमडै रिमझिम बरसे मेह।
चौबारे में बैठ रहो ना, जा भीजहु निर्देह।।
वही देसवाँ में नित्त पूर्निमा, कबहुँ न होय अंधेर।
एक सुरज कै कवन बतावै, कोटिन सुरज ऊँजेर।।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^