ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
शांत बहने दो अकेला मुसाफिर
02-Jul-2019 11:18 AM 671     

शांत बहने दो

मैं मुसाफिर हूँ अकेला
एक पथ पर चल रहा

सुबह उठकर जिधर जाऊँ
कष्ट-दुख क्या-क्या न पाऊँ
पक्षियों की भाँति डेरा
कुछ ठिकाना है न मेरा
आज तेरे द्वार पर हूँ
उस द्वार पर भी कल रहा था
मैं मुसाफिर हूँ अकेला

पथ विकट, पर लक्ष्य तय है
पड़ाव आने पर भी भय है
जाने कहाँ, कब, कौन होगा
जो भरा विष मौन होगा
अब सुधा का पान करना
सोच मैं हर पल रहा हूँ
मैं मुसाफिर हूँ अकेला

कौन अपना औ" पराया
किसने, किसको, कब मिटाया
इस उम्र तक कटते व जुड़ते
देखे बहुत मिलतेे-बिछुड़ते
आज अंदर और बाहर
हर ओर से मैं जल रहा हूँ
मैं मुसाफिर हूँ अकेला।

 

अकेला मुसाफिर

नयनों में अश्रु रहे इनके,
सब कुछ रहा इनमें समाया।

बेचैनी बढ़ती रही,
साँसें चढ़ती रहीं।
नयनों में अश्रु सतत छलके,
उभरी हैं रोतेे-रोते,
मेरी नयनों की पलकें।

जलती रही आज तक
गाल गीला कर गई है।
आसमाँ से आ नयन में,
वह बूँद सागर भर गई है।

गोद कहते हैं जिसे,
सागर उसी में बह रहा है।
शांत बहने दो मुझे, वह
बिन कहे भी कह रहा है।

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