ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मगर देखो, कहाँ पहुँचे
01-Aug-2018 12:57 AM 1217     

यदि किसी कवि की एक पंक्ति भी लोक में इतना गहरे तक पैठ जाए कि वह अपनी बात कहने के लिए उसका सहारा ले तो समझिए रचनाकार सफल है, उसका जीवन सार्थक हो गया। लेकिन यह सौभाग्य सबको नहीं क्योंकि सब में इतनी क्षमता नहीं होती। किसी लेखक को खुद को कोट नहीं करना चाहिए और यदि किसी अन्य को कोट करे तो इतना शिष्टाचार होना चाहिए कि वह उसके रचनाकार को विनम्रतापूर्वक उसका श्रेय भी दे। आजकल यह शिष्टाचार कम हो गया है। शब्द किसी और के होते हैं लेकिन हम उनके रचनाकार का नाम नहीं बता कर सुना देते हैं। श्रेय और तालियाँ खुद बटोर लेते हैं। यह उसी तरह की बेईमानी है जैसे कोई नेहरू जी का "प्रथम सेवक" वाला विचार, कोई अपने नाम से उछाल दे। खैर, तत्काल कोई प्रसिद्ध पंक्ति ध्यान में नहीं आ रही है इसलिए विनम्रतापूर्वक अपनी ही चार पंक्तियों से बात शुरू कर रहा हूँ :
जहाँ पहुँचे, तहाँ पहुँचे
यहाँ पहुँचे, वहाँ पहुँचे
पहुँचना था कहाँ हमको
मगर देखो, कहाँ पहुँचे।
मानवेतर सृष्टि में जीव जीव का भोजन है। जीवन-चक्र एक-दूसरे पर आश्रित होकर चलता रहता है। उनके जीवन का उद्देश्य किसी प्रकार जीवित रहना है। वहाँ सभ्यता-संस्कृति और मूल्यों का न तो कोई स्थान है, न आवश्यकता और न ही दिखावा। अन्दर-बाहर सर्वत्र सम्पूर्ण पारदर्शिता। सबकी दौड़ और दुनिया आहार-निद्रा-भय और मैथुन तक ही है। वे न भाषण झाड़ते, न प्रेम का नाटक करते, न सेवा का दंभ भरते, न ही ईष्र्या-द्वेष की आग में जलते हैं। कोई जीव सात-पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संग्रह नहीं करता, कोई किसी की जय नहीं बोलता और न ही कोई जिल्ले सुभानी का उगलदान थामे खड़ा रहता है, न किसी आर्यपुत्र और चक्रवर्ती सम्राट के लिए कोई ताम्बूलवाहिनी बगल में उपस्थित रहती है, न कोई नित नए वस्त्र बदलता है, न कहीं माल्यार्पण और न ही शाल और श्रीफल। दम हो तो भोजन का प्रबंध करो, पानी पीना हो तो खुद चलकर जाओ किसी जलस्रोत तक। नहीं तो मरो भूखे-प्यासे। न कोई खेती करता है और न ही कोई कुछ बेचता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य का कोई चक्कर नहीं। न कोई आय, न दुगुना करने का जुमला।
जब मनुष्य ने खेती करना सीख लिया। दो दाने घर में आ गए तो जीवन कुछ निश्चिन्त हो गया। निश्चिन्तता में ही नाचना-गाना, सभ्यता-संस्कृति सूझती है और यहीं से जीवन-मूल्य, सेवा, परोपकार, दया, संवेदना के विचार शुरू होते हैं। इस निश्चिन्तता ने छल-प्रपंच, नाटक, आडम्बर और कुटिलता को भी जन्म दिया। सेवा और व्यवस्था के नाम पर स्वार्थ सिद्धि का प्रबंधन शुरू हुआ। इसमें धर्म, व्यवस्था, राजनीति, व्यापार आदि कई प्रकार के घटक आ मिले। इन सबमें छुपे स्वार्थ, कुटिलता, धोखे को समय-समय पर विचारशील लोगों ने देखा, समझा, समझाया और समस्त जीव मात्र के हित के लिए समूह, समाज और देशों की संवेदना को जाग्रत करने का काम किया।
जैसे-जैसे किसी व्यक्ति और विचार को लोगों का समर्थन मिला तो उस विचार के प्रचार-प्रसार के नाम पर संस्थानों का जन्म हुआ और फिर वे संस्थान ही सत्ता और शक्ति के केंद्र बन गए। उन्होंने ही फिर पुनर्विचार, संवाद और परिवर्तन के रास्ते रोकने शुरू कर दिए। इस धरती पर इतना अन्न-जल है कि सब शांति से रह सकते हैं लेकिन धर्म और शक्ति संस्थानों की कुटिलताएँँ सरल जीवन को उलझा रही हैं।
जब सभी धर्म दया, समानता, सादगी और संवेदना की बात करते हैं तो फिर समय-समय पर सभी क्षेत्रों, समाजों में हुए महान विचारकों के बावजूद क्यों हम किसी की भिन्न जाति, नस्ल, धर्म, खानपान, पहनावे को बर्दाश्त नहीं कर पाते। क्यों इस आधार पर किसी को पीट-पीट कर मार डालते हैं। अंधविश्वास को मिटाने, प्रयोग और प्रमाण के आधार पर सत्य को जानने-समझने की बात करने वालों को गोली मार देते हैं और फिर इसे पूर्वाग्रहों, कुतर्क और कानून की गलत व्याख्या की आड़ में छुपाने की कोशिश करते हैं। यह सब बहुत चिंतनीय है।
क्या जंगल में शेर किसी जानवर का विशेष प्रयत्न करके इसलिए शिकार करता है कि वह खास नस्ल-धर्म का है? वह केवल अपनी भूख मिटाता है। वह ऐसा योजनाबद्ध और भेदभावपूर्ण शिकार नहीं करता क्योंकि वहाँ न धर्म-युद्ध है, न जिहाद है, न राष्ट्रीयता, न रंग और नस्ल, और न ही चुनाव जीतने के लिए वोटों का ध्रुवीकरण है। यदि वहाँ भी ऐसा होने लगे तो शायद जंगल भी शहर जितना ही खतरनाक हो जाए।
इसलिए विश्वशांति, विकास, भाईचारा आदि के विचार कुछ देर के लिए चमक बिखेरते हैं लेकिन फिर वे ही टुच्चे हाथों में जाकर जुमले बन जाते हैं और यह दुनिया पुराने लटकों के साथ नए-नए दुःख झेलती रहती है। आज दुनिया में करोड़ों लोग शरणार्थी बनकर मारे-मारे फिर रहे हैं, किसी को भी कहीं भी दाढ़ी, टोपी, रंग, नस्ल, धर्म के नाम पर हड़काया, डराया, मारा जा रहा है। कहाँ जाए आदमी? कौन-सा धर्म अपनाए, किस तरह के कपड़े पहने, क्या नाम रखे, क्या खाए, कौन-सी भाषा बोले कि जिंदा रह सके? सामान्य आदमी न किसी धर्म के लिए जीना चाहता है और न ही किसी देश और भाषा के लिए। उसे जो जहाँ-जिस धर्म, देश, जाति में जन्म मिला वह उसका चयन नहीं था, एक जैविक संयोग मात्र था। वह तो दुनिया में आ गया तो सिर्फ जीना चाहता है।
क्या उसे इस धरती पर, जहाँ रोज अरबों रुपए हथियारों, दिखावे, विलासिता और दंभ के चलते खर्च किए जा रहे हैं, एक सामान्य मनुष्य के लिए एक अंजुरी भर जल, एक साँस भर हवा, एक खिड़की भर आकाश, दो मुट्ठी अन्न, दो पहर की निश्चिन्त नींद और एक सहज मुस्कान नहीं है? यदि नहीं, तो फिर कोई अर्थ नहीं है इन बड़ी-बड़ी बातों और सभ्यता-संस्कृति का। क्या इसी के लिए हम सृष्टि के आदि काल से विकास-यात्रा पर हैं?
सोचें, कहाँ के लिए चले थे और कहाँ पहुँचे।

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