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बुन्देली साहित्य में लोक कथाएं
08-Jul-2017 07:51 PM 4664     

प्रत्यक्षदर्शी लोकानां सर्वदर्शी भवेन्नरः - महर्षि व्यास ने सत्य ही लिखा है कि लोक जीवन का प्रत्यक्ष ज्ञान ही जीवन को उसके मंगल कलश रूपी अन्तः वाह्य को जानने का एक आधार है। लोक जीवन मानव जीवन को सम्पूर्णता से समझने का माध्यम है। लोक जीवन भौतिक और अध्यात्म दोनों को साधता है। छोटे-छोटे लोक जीवन के कर्म भले ही व्यवहारिक रूप में सामान्य हो लेकिन लोक विश्वासों में इनके गहरे अर्थ छिपे होते है।
लोक साहित्य में किसी भी अंचल के लोक का जीवन जीवन्त रहता है। लोक साहित्य भारतीय साहित्य की आत्मा है, यदि इसे साहित्य से अलग कर दिया जाऐ तो निश्चय ही भारत का साहित्य निष्प्राण हो जाएगा, प्राणहीन होने पर अस्तित्व स्वतः ही मिट जाता है। यह वो लोक साहित्य है जो विभिन्न संवेदनाओं, भावनाओं, अनुभूतियों और कल्पनाओं के सम्मिश्रण से जन-जन के हृदय को सदियों से आनन्दित करता रहा है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लोक को स्पष्ट करते हुए टिप्पणी की है कि- लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नही है, बल्कि नगरों या ग्रामों में फैली हुई समूची जनता है, जिसके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर में रहने वाले परिष्कृत रुचि सम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो भी वस्तुएं आवश्यक होती हैं, उनको उत्पन्न करते है।
लोक कथाएं लोक जीवन का अभिन्न अंग है। लोक कथाओं का उद्देश्य लोकरंजन के साथ-साथ लोक शिक्षण करना होता है। प्रायः गांव के लोग अपनी दिनभर की दिनचर्या से निवृत्त होकर मनोरंजन के लिए घर के भीतर बूढ़ी महिलायें या मातायें परिवार के बच्चों को रात में कहानियाँ सुनाती हैं और घर से बाहर चौपालों में गांव के बड़े-बूढ़े अलाव के पास घेरा बनाकर बैठ जाते थे, फिर कथा, कहानियाँ, गीत, लोक गीत, सुनाना प्रारम्भ करते थे। कहानियां आज भी व्रत, त्योहार या देवीपूजन के समय पंडित या परिवार की वरिष्ठ महिलाओं द्वारा कहानियाँ कही जातीं हैं। यह सभी कहानियाँ लोक कथा के रूप में जानी जाती हैं। इनमें पौराणिक प्रसंगों से लेकर उपदेशपरक सहित मनोरंजक कथानक होता है। कई कथाएं तिलस्म या रोमांच से भरपूर होती हैं। कुछ कथाएं समाज कल्याण का जीवंतचित्र बड़ी स्वाभाविकता के साथ प्रस्तुत कर देती हैं। इन लोक कथाओं से क्षेत्रीयता का सामाजिक परिवेश पूरी तरह समझा जा सकता है। इन कथाओं से आपसी स्नेह आत्मीयता तो बढ़ती ही है, साथ ही संस्कार, रीति-रिवाज, परम्पराएं एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आसानी से हस्तांतरित हो जाती हैं। वाचिक परम्परा के कारण इनका स्वरूप भी बदलता रहता है। विशेष रूप से यह कथाएं तीज़ त्योहार के अवसरों पर बड़े विधि-विधान नियमों से कही जाती है। हरछठ, ऋषि पंचमी, महालक्ष्मी, वटसावित्री, सुअटा, झैंझी, टेसू, अहोई, गोवद्र्धन पूजा, भइयादौज, करवा चौथ, दीवाली, तुलसी व्रत आदि।
हरछठ की बुन्देली कथा का संक्षिप्त रूप यहाँ प्रस्तुत है। यह कथाएं आज भी प्रायः ग्रामीण क्षेत्रों में आसानी से सुनी जा सकती है :
हरछठ की कथा तौ बहुतै बड़ी है थोरी-सी बताइ देत हैं। एक गांव मा ग्वालन वाई रहत ती। गइया बैल छिरिया, सबई, कछू हतो। दूद दही मठा बेचिबे को काम कत्त हती। भरो पूरो घर। बस एक औलाद नाई हती। बड़े मान मनौती तै एक मोड़ा भओ। ग्वालन वाई मोड़ा कौ कइंया लैके दूद बेचिबे जान लगी। तभई हरछठ को दिन आ गओ। पैसा कमाइवै के लालच में हरछठ को ऊ मोड़ा को कइयाँ दबाइकै दूद दही बेचिबे गांव-गांव चल दई। सोचन लगी अब मोड़ा कौ गैल मै कितै छोड़ै। तभई छौकरो की छाँव दिखी। वाई उतई मोड़ा कौ लिटाई कै गाँव चली गई। जल्दी-जल्दी दूद-दही बेचि कै लौटी। पैसा रोज से दूनो मिलो। खुशी-खुशी पेड़ के ढ़िगा आई मोड़ा के सांसै नहीं चलि रही। वाई रोन चिल्लान लगी। घबराई गई। आसपास सै सब अपओ काम छोड़ि-छोड़ि आई गये। तभई एक किसान ने कही। आज तौ हरछठ है। दूद-दही तुमने काये बेंचो। जाओ अब सबन के घरि से वापस लई आओ, ग्वालिन वाई दौरी-दौरी गई। दूद दही सब लौटाई लाई। सबन के पैसा वापस करि आई। सब गाँव की औरतन नै मोड़ा कौ आशीष दऔ। इधर मोड़ा की सांस चलन लगी, रोऊन लगो। हरछठ मइया की कृपा से बुरे दिन टरि गए। भक्ति कभऊं निरफल नाही जात है। जैसे माता मइया ग्वालिन वाई पै किरपा करी बैसियै सप्पै किरपा करिओ, भूलो विसरो माफ करिओ।
लोक कथाओं में मानव मन का इतिहास अंकित रहता है। इनमें बड़ी सहजता, सरलता, मृदुता एवं मानव अपने मनोजगत में जो कुछ भी वैचारिक मंथन करता है, कल्पनाएं करता है, वह सब कुछ इन लोक कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करता है। भले ही यह लोक कथाएं मनोरंजन का आधार हों पर इनका अस्तित्व बहुत पुराना है। संस्कृत साहित्य की समृद्ध परम्परा में कथा साहित्य ने बहुत लम्बी यात्रा की है। वेद-उपनिषद एवं नीति ग्रन्थों की कथाएँ सदैव कर्तव्यबोध, परोपकार, सेवाभाव की प्रेरणा प्रदान करती है।
अनेक बुन्देली लोक कथाएं महाभारत एवं पौराणिक ग्रंथों से जुड़ी हुई हैं। झैंझी बुन्देली का बहुत प्रसिद्ध पर्व है। इसकी कथा महाभारत से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि यह झैंझी नरकासुर दैत्य की कन्या थी जब बब्रुवाहन (टेसू) महाभारत का युद्ध लड़ने चला तो रास्ते में झैंझी से उसकी भेट हुई। झैंझी को देखकर टेसू ने झैंझी से विवाह करने की प्रतिज्ञा ली। यह कौरव सेना का सबसे अधिक बलशाली था। कृष्ण को यह पता चला तो उन्होंने विवाह से पूर्व ही उस बब्रुवाहन का सिर काट दिया। मरने से पूर्व टेसू ने युद्ध देखने की इच्छा प्रकट की थी। प्रभु ने उसकी प्रार्थना को स्वीकार कर उसका कटा हुआ सिर टेसू के पेड़ पर रख दिया। तभी से बब्रुवाहन का नाम टेसू पड़ गया। वहीं से वह महाभारत का युद्ध देखता रहा। टेसू से ही झैंझी की कथा जुड़ी है। यहां लड़कियाँ झैंझी खेलती हैं और लड़के टेसू बनाते हैं। कहा जाता है कि महाभारत काल में टेसू घटोत्कच का बेटा था इसलिए झैंझी टेसू का ब्याह दीवार पर मिट्टी या गोबर से बने घटोत्कच के समक्ष किया जाता है। लोक गीत गाकर ब्याह हिन्दू रीति रिवाज से किया जाता है। इसी क्रम में एक और कथा "सुअटा राक्षस" की जो कन्याओं का अपहरण करता था। कन्याएं इस राक्षस से बचने के लिए पार्वती का व्रत किया करतीं हैं।
इन कथाओं के जरिये बड़े ही साधारण तरीके से रीति रिवाज, तौर-तरीके खेल-खेल में लड़कियों को मिल जाया करते। कितना भी समय व्यतीत हो जाए पर यह लोक कल्याण की भावना से जुड़ी कथाएं सदैव हृदय में विद्यमान रहती हैं। इन कथाओं में प्रकृति भी हम मनुष्यों की भांति वाचन परम्परा का निर्वहन करती है। नदियाँ, पहाड़, पशु, पक्षी, पेड़, चिड़िया आदि मुहावरे भी यहां प्रयुक्त होते है। इन कथाओं को व्याकरण के दायरे में कैद नही किया जा सकता।
अपने रंग-ढ़ंग में सजी-संवरी यह कथाएं बहुत ही आनंद प्रदान करती हैं। यह साहित्य सर्जना होकर भी केवल साहित्य नहीं है यह यथार्थ के साथ स्वप्न में भी यात्रा कराती हैं। समय के साथ-साथ कलातीत हो जाती है।
विकास के बदलते दौर में आज हम अपनी धरोहर को खोते जा रहे है। हमें अपनी संस्कृति को बचाने और संरक्षण की आवश्यकता है तभी नयी पीढ़ी को इस संस्कृति से जोड़ा जा सकेगा।

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