ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
ब्राजेन्द्र श्रीवास्तव
ब्राजेन्द्र श्रीवास्तव

लेखक-समीक्षक, साहित्य एवं कला, विज्ञान एवं अध्यात्म, ज्योतिष एवं वास्तु, ब्राहृविद्या एवं ब्राहृाण्ड विज्ञान जैसे विविध विषयों पर निरंतर लेखन। 50 से अधिक शोध-पत्र वि·ाविद्यालयों व राष्ट्रीय संगोष्ठियों में प्रस्तुत। विश्वविद्यालय में अतिथि अध्यापन का सुदीर्घ अनुभव। आजीवन सदस्य : ग्वालियर एकेडेमी ऑफ मैथमेटिकल साइंसेज, इण्डियन इंस्टीट¬ूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन, नई दिल्ली।


रोमन लिपि का कपट मृग और देवनागरी
हिन्दी को भारत देश में आज जो सर्वमान्य सम्पर्क भाषा का दर्जा मिला हुआ है वह समय प्रवाह की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इतना जरूर है कि इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम कर रहे गैर हिन्दी भाषी स
न हारने की ज़िद
परम्परागत ग़ज़ल का स्वरूप क्या है? हिन्दी की वर्तमान ग़ज़ल इससे कितनी भिन्न है? हिन्दी की वर्तमान ग़ज़ल की समीक्षा के लिये नया समीक्षाशास्त्र क्यों जरूरी है? ये और कुछ ऐसे ही अन्य प्रश्न, "वो अभी हारा नहीं
गाँव-देहात की सद्भावी परम्परा
जो परिवर्तन विगत कई सौ साल में हुए हैं उससे कहीं अधिक परिवर्तन कुछ दशकों में ही इस पृथ्वी पर हो गए हैं। आगे इनमें और तेजी ही आएगी। ऐसे ही हमारे गांव-देहातों में भी परिवर्तन आए हैं और आते जा रहे हैं। ज
महेश अनघ की कहानियां  कौतूहल काव्य रस और सामाजिक न्याय की त्रिवेणी
समकालीन हिन्दी की कृतियों में "जोग लिखी" और "शेषकुशल" नवगीतकार और कथाकार महेश अनघ के ये    दो कहानी संग्रह, इस कारण से उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं क्योंकि इनमें कौतूहल काव्य रस और सामाजिक

भारतीय अध्यात्म के अबूझ बिम्ब
एक विज्ञापन में लिखा है, आध्यात्मिक वस्तुएं- माला, चन्दन, अगरबत्ती सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। इसमें अध्यात्म शब्द के प्रयोग से यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की है कि अध्यात्म "वस्तु' में हैं जिनके प्रयोग
मेक इन इंडिया में स्वदेशी भागीदारी भी हो
निति आयोग अध्यक्ष अरविन्द पानगड़िया ने 20 दिसंबर 2015 के इंडियन एक्सप्रेस में कहा कि भारत एक मार्केट इकानॉमी है अर्थात यह खरीद-बिक्री की बाजार व्यवस्था पर निर्भर अर्थव्यवस्था है। अब यदि यहां बाजार व्यव
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