ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बोली-भाषा-2
01-Jan-2019 01:22 PM 1231     

पढ़ने-लिखने से समझदारी आती है। पहले भी सुनता था और आज भी सुनता हूँ। आज एक नई बात जुड़ी कि पढ़े-लिखे कम समझदार होते हैं। वे सिर्फ़ अपना हित सोचते हैं सह-हित नहीं। समझदारी में सह की चिंता होती है। सह का मतलब ही दो है और सम्-मझ भी दो का ही इशारा करता है। सम् और मझ भी दो के सूचक हैं। धारा के दो किनारे होते हैं। इन किनारों के बीच का हिस्सा ही मझ है। यह अगर दोनों किनारों बीच के मध्य बहे, तो ही सम्मझ होगी, अन्यथा किसी एक किनारे की ओर झुकी होगी। सम्मझ नहीं होगी। इस तरह समझदारी सह की चिंताओं का उचित समाधान हुई। ऐसे समझदार, जब अन्यों से पूछते फिरते हैं कि "कौन जीतेगा कौन जीतेगा", तो उनकी समझदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भाई, फिर आपने सम्मझा क्या! और जब सम्मझा ही नहीं, तो काहे के समझदार। ऐसा क्यों हुआ और कैसे हुआ? सच तो यह है कि धारा के मझ उतरे ही नहीं, इसलिए कि एक तो धारा, दूसरे उसका मझ। पहले तो धारा ही डराती है कि न जाने किस अतल में बहा ले जाय। दूसरे, उसका मझ तो गहरा होता है। उसमें भी डूबने का ख़तरा है। सो, एक किनारे पड़े-पड़े कि खड़े-खड़े कि पड़े-खड़े कि खड़े-पड़े धारा को देखनेवाले लोग हैं। ये जीवन को ऐसे ही सहते हैं। दूसरे किनारे से इनका कोई सरोकार नहीं। ये जीवन-धारा के किनारे-किनारे चलते लोग हैं। ये धारा को सिर्फ़ देखते हैं भोगते नहीं। फिर तो धारा के दूसरे किनारे को जानने-भोगने का सवाल ही नहीं उठता। ऐसा ही जीवन उपभोगी होता है, भोगी नहीं। जिसने जीवन को भोगा ही नहीं, उसे जीवन के स्वाद का क्या पता! हाँ, उसके रंग-रूप का पता उसे भोगी से भी अधिक होगा। तभी तो बेस्वाद जीवन को रंगता-रूपता रहता है।
यह सब एक दिन में नहीं हुआ। प्राचीन काल से ही इसका प्रारंभ हो चुका था। जो बिना पकाए, परंतु पका-पकाया ही खाते थे, वे खाने के स्वाद के गुणगान के अलावा उसकी रचना-प्रक्रिया को भी भषते-भाषते थे। पकाने की क्रिया को देखते थे, सो, दिखाते थे। पकानेवाला तो पकाने में लगा होता था, सो, न देखता था, न दिखाता था। इतना ही नहीं, पकाए हुए का स्वाद भी न बताता था। इस तरह उसका भषना-भाषना कम होता था। बिना पकाए, परंतु पका-पकाया खानेवाला खाने के स्वाद से मजबूर होकर उसके स्वाद का गुणगान करता था, जिससे पकानेवाले का जी प्रफुल्लित (उत्साहित) होकर पकाने के काम करने लगता था। यही उसके जीवन की अर्थवत्ता थी। इस तरह भषने-भाषने का काम बिन पकाए, परंतु पका-पकाया खानेवाला ही करता था, इसलिए भाषा का वही अधिकारी हो गया। खाने के स्वाद का गुणगान करने से और अच्छे खाने की संभावना बनती देख वह झूठा गुणगान भी करने लगा और बिना पकाए ही पका-पकाया खाने का फल पाने लगा। भाषा इसीलिए कभी कर्मठों की नहीं रहीं। काम के दौरान वे काम के साथ-साथ ख़ुद से बोलते-बतियाते थे, इसलिए उनकी बोली हुई, भाषा नहीं। बोली के संकुचित होने में कर्मठ का संकोच शामिल है। अपनी कृति का गुणगान वह नहीं कर सकता, परंतु जब सुनता है, तो प्रफुल्लित (उत्साहित) हो जाता है। भाषा ने उसके इसी संकोच का बहुत फ़ायदा उठाया। फल (शस्त्र) का भोग (सृजन) तो उसने किया, भाषा ने तो उसका उपभोग किया और उसके बारे में जो कुछ भषा-भाषा उसे "शास्त्र" नाम दिया। इस तरह वह सृजन (शस्त्र) का शास्त्र हो गई। शस्त्र से बड़ी। कहीं इसी कारण तो नहीं, भाषा-शास्त्र का पढ़ना-पढ़ाना होता है, बोली-शास्त्र का नहीं। क्या नहीं लगता कि अगर बोली- शास्त्र का भी पढ़ना-पढ़ाना होता, तो हम ख़ुद सृजन करने में समर्थ होते।
जब तक पकाना-खिलाना और खाना रहा, तब तक कोई ख़ास परेशानी नहीं हुई, परंतु जब से भाषा ने पकाने-खिलाने को खाने से अलगा दिया, तब से पकानेवाले का सह असह्य होने लगा। फिर तो उसने भी धीरे ही सही, परंतु भषना-भाषना शुरू कर दिया। इस तरह भाषा ही भाषा को भेदने और भाषा ही भाषा से भिदने लगी। बिना पकाए, पका-पकाया खानेवालों की संख्या बढ़ने लगी, फिर तो भाषा-भाषियों को मशीन की शरण लेनी पड़ी। मशीन पकाती है और वे पका-पकाया खाते हैं। उपभोक्तावाद यही है। ध्यान रहे कि मशीन की शरण भाषा-भाषियों ने ली, परंतु मशीन का निर्माण कर्मठों ने किया। भाषा-भाषी भषने-भाषने में माहिर थे, निर्माणने में नहीं। निर्माण की माहिर तो बोली-बानी है। सो, उन्हें बोली-बानी के पास जाना पड़ा। मशीनों को उन्होंने भषा-भाषा और बोली-बानी ने उनका निर्माण किया। इसके लिए बोली-बानी को भषना-भाषना सिखाना पड़ा, तब जाकर मशीन का निर्माण हुआ। ध्यान रहे कि भाषा-भाषियों के विस्तार को संकोचने पर ही मशीन का उत्पादन हुआ। फिर तो मशीन का भषना-भाषना शुरु हुआ, जिसके सम्मुख भाषा-भाषियों की भाषा संकुचाने लगी। भाषा-भाषियों के उत्पात से जैसे बोली-बानी संकुचाती थी, वैसे ही अब मशीन के उत्पात से भाषा-भाषी संकुचाने लगे। इस तरह मानुस मनुष्य के भषन-भाषन को मशीनी भाषा नियंत्रित करने लगी, तो भाषा-भाषियों का भाषना दूभर हो गया। फिर तो उन्हें उसी बोली-बानी की शरण में जाना होगा, जिसने मशीन की उत्पत्ति की। इसे और इसकी भाषा को नियंत्रित (संहारने-संभालने) की सामथ्र्य उसी में है। मानुस-जीवन की भाषा उसके बग़ैर ज़िन्दा नहीं रह सकती। मुझे तो यही सही भी लगता है और सह्य भी। बोली-भाषा को परस्पर सहे बग़ैर मानुस-जीवन असह्य हो जाएगा।
मानुस जीवन का लक्ष्य फल है, परंतु उसकी प्राप्ति संज्ञान नहीं है। संज्ञान तो उसके जन्म की पूरी प्रक्रिया को जानना भी है और जनना भी है। भाषा जानने के बावजूद जनने में समर्थ नहीं है। जनने में समर्थ तो बोली-बानी है। भाषा को इसीलिए बोली के सह रहना पड़ता है। बोली का स्वभाव भाषा के और भाषा का स्वभाव बोली के विरुद्ध है। बोली क्रियती (करती) है और भाषा कहती। फल का उपयोग करने के बाद वह फल के रूप और स्वाद का गुणगान करती हुई इसे संज्ञा (नाम) मानती है। फल की इस संज्ञा को ही यह संज्ञान मानती है। जो इसकी भूल है। स्वाद से लेकर जनन तक का ज्ञान ही उस फल का संज्ञान है। इस तरह भाषा संज्ञा (नाम) पर ठहर गई, काम तक उसकी गति हुई ही नहीं। फिर संज्ञान कैसे होता! संज्ञान तब होगा, जब वह काम करने लगेगी। बोली स्वरती है, जबकि भाषा व्यंजती। भाषा लँगड़ी है, परंतु अंधी नहीं। फिर भी वह अंधी बोली के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करती। अंधी होने के बावजूद नहीं देखती कि अंधी बोली के बिना उसका ख़ुद का अस्तित्व नहीं। फिर भी ख़ुद को ऊँची और बोली को नीची मानती हुई तिरस्कारती है। अंधे के कंधे पर सवार कोई अंधा लँगड़ा ही ख़ुद को श्रेष्ठ और अंधे को निम्न कहेगा, कोई लँगड़ा नहीं। वह चल नहीं सकता, परंतु चला सकता है, इसलिए कि उसके पास आँख है। इस तरह वह अंधे के कंधे का बोझ नहीं, माथा है, जिसमें दो आँखें हैं। इस तरह अंधे और लँगड़े एक-दूसरे को सहते हुए जीवित रहते हैं। यह स्थूल चित्र बोली को अंधा और भाषा को लँगड़ा दर्शाता है। भाषा क्रिया को देखती-दिखाती है और बोली क्रिया को करती-कारती। भाषा को अगर लगता है कि उसका जीवन ख़तरे में है, तो समझना चाहिए कि बोली भी ख़तरे में है। मशीन के उत्पात से जितना भाषा परेशान है, उतना ही बोली भी परेशान समझना चाहिए। ऐसे में, दोनों अगर सबयोगी नहीं हुए, तो मशीन के उत्पात से दोनों तबाह होंगे। यही मानुस जीवन का सच है। अंधे के कंधे पर सवार लंगड़े का चलना ही मानुस की जीवन-धारा है। धरा नहीं, धारा, इसलिए कि इसने बाहर से दो, मगर भीतर से चार जीवन धरा-धारा है। चर से चार और धर से धारा। इस तरह यह धरा (धरती) का चार (चलना) है। दोनों किनारों का यही मिलना है। धारा इसी तरह दोनों किनारों को धरते-धारते हुए चलती है। मानुस जीवन का यही दाना-बाना (दाएँ-बाएँ) है।
उनकी चिंता "कौन जीतना चाहिए" अथवा "किसे जिताया जाय" पर टिकने की बजाय पराश्रित हो गई है। उसे ख़ुद पर ही विश्वास नहीं रहा। ख़ुद पर आस हो, तो न विश्वास हो। आस जब मशीन पर है, तो विश्वास भी मशीन पर ही होगा। इसलिए वह मशीन से पूछ रहा होता है कि "कौन जीतेगा?" मशीन जिसे जिताएगी, उसे वह भी जिता देगा। साफ़ है कि उसमें अपने पैरों खड़ा रहने की भी शक्ति नहीं रही। इस पढ़े-लिखे से वह अनपढ़ अधिक समझदार है, जो किसी से पूछता नहीं फिरता कि "कौन जीत रहा है?" वह तो अपने मत से एक प्रत्याशी को जिता रहा होता है। नतीजे में भले न वह हार जाय। उसने तो अपनी जान उसे जिताने की कोशिश की। इतने से वह संतुष्ट हो जाता है और अपनी जीवन-चर्या में पहले की तरह रच-बस जाता है। हमारा पढ़ा-लिखा वर्ग, जिसे मध्य वर्ग भी कहते हैं, वह जीते हुए को जिताता है और उसकी जीत को अपनी जीत मानता है। सोच-विचार की मानवीय गुणवत्ता से उसका कोई वास्ता नहीं, वास्ता है तो सिर्फ़ जीते हुए के पक्ष में दिखना। उसकी सुरक्षा इसी में है। वह सुरक्षित दिखना चाहिए। मीडिया द्वारा जीत-हार के प्रायोजित कार्यक्रम ऐसे ही पढ़े-लिखे लोगों के लिए होते हैं। मीडिया का काम जीतते हुए को बताना है। इससे एक ओर तो जीतते हुए को पता चलता है कि वह जीत रहा है और दूसरी ओर ऐसे समझदार दर्शकों को पता चलता है कि कौन जीत रहा है। इस तरह मीडिया के कार्यक्रम जीतनेवाले के कार्यक्रम होते हैं। इस तरह कह सकते हैं कि मीडिया का काम किसी को जिताना और किसी को हराना हो गया है। मशीनी भाषा भाषा-भाषियों की भाषा को भी खा गई। भाषा-भाषियों की भाषा मशीनी भाषा की ऐसे ही ख़ुराक बन रही है। ऐसे ही दर्शक मीडिया की जनता है। वह जीवन-धारा के एक किनारे खड़ा-खड़ा या पड़ा, या खड़ा-पड़ा, या पड़ा-खड़ा अपने किनारेवाले को जिताता हुआ ख़ुद भी जीतता है। बावजूद इसके अगर उसकी हार हो गई, तो बर्दाश्त नहीं कर पाता। उसका जीवन ही ख़तरे में पड़ जाता है। चारों ओर से दुश्मनों के बीच घिरा पाता है। मानो, किनारे से जीवन-धारा के बीच पड़ गया हो। ऐसे में चैन कहाँ! फिर तो वह अपने हारे हुए प्रत्याशी के कार्यकर्ताओं से भी बढ़-चढ़ कर व्यवहार करने लगता है। उस पार्टी का सबसे बड़ा ख़ैरख़्वाह बन जाता है। यह सब बोली-बानी से हटकर भाषा-भाषी होने का परिणाम है। सर्जक ने तो इसे देख ही लिया और आत्मव्यंग्य के माध्यम से "चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती" के माध्यम से प्रकट भी कर दिया, फिर भी हमारी आलोचन-दृष्टि इसे नहीं देख पाई। वह तो प्रोफ़ेसररूपी अश्व पर सवार होकर सेमिनारी व्याख्या करती रही। देखने-दिखाने से निरंतर दूर होती गई। देखने-सुनने को उत्कंठित युवाएँ सुनती रहीं, सिर्फ़ सुनती और सिर धुनती रहीं। भषती-भाषती और दिखती रहीं, परंतु देखती नहीं। देखने की कोशिश होती, तब न देखते-दिखाते हुए सुनते-सुनाते। पत्थर तोड़ना "तोड़ती पत्थर" का स्वाभाविक काम है, परंतु निद्र्वंद्व भाव से उसे मज़दूरन आरोपित कर दिया। सवाल भी पैदा नहीं हुआ कि इसे मज़दूरी कौन देता है। सड़क का पत्थर, क्या सड़क बनाने के लिए तोड़ा जा रहा है, तो तुड़वा कौन रहा है। दृष्टि ही यहाँ पथ-पथ कर सड़क हो गई है, जिस पर हमारी दृष्टि ऐसे सरकती है कि चाहने पर भी कहीं रुकती नहीं। कहते हैं न कि आपकी दृष्टि पर पत्थर पड़ गया है। इसी दृष्टि-पथ के पत्थर को तोड़ती वह है। यही उसका स्वाभाविक कर्म है। दृष्टि के पथ-पथ कर पत्थर होने का मतलब दृष्टि का बँध जाना है। बद्ध दृष्टि सत्य को देखने में असमर्थ होती है। इस तरह यह कविता दृष्टिबंध को वैसे ही तोड़ती है, जैसे छंदबंध को तोड़कर कविता के जीवन और जीवन की कविता को मुक्त करके जीवन को जल की तरह संचरित करती है। दृष्टि का नम होना ही दृष्टियुक्तता है, तभी वह जीवन को देखने-दिखाने में समर्थ होती है। दृष्टिबंध और बंधदृष्टि को तोड़ने की युक्ति है यह कविता। स्त्री द्वारा पथ का पत्थर तोड़ा जाना दृष्टिबंध और बंधदृष्टि को मुक्त करने की युक्ति है। युक्ति भी तो सहना ही है। यही युक्ति सरस भी है और सरसाती भी है। इसीलिए यह स्त्री सरस्वती है, जो इलाहाबाद में ही हो सकती है, कहीं अन्यत्र नहीं। इलाहाबाद सरस्वती की नगरी रही है, जो सरसती हुई अन्यों को भी सरसाता थी, उसकी दृष्टि पथ-पथ कर पत्थर हो गई है। अब वह सरसती ही नहीं, तो सरसाए कैसे! ऐसी नगरी की दृष्टि को सरसती है यह स्त्री। इसीलिए सरस्वती है।
दोस्तो, विशेषकर नवयुवको, इस उम्र में जिसका मुझे भान हुआ, उसे आपके सम्मुख रखा है, इस आशय से कि हम अपने उत्तरदायित्व के प्रति जागरूक नहीं रहे। इसके लिए माफ़ करेंगे और मेरे इस भान को देखे-समझेंगे कि इसमें कोई सच्चाई है या नहीं। हम तो समय में रहने के आदी रहे। इसीलिए समय पर रहे नहीं। तभी तो चुके न होने पर भी समय को चूक गए। इसीलिए पछताते हैं। सिर धुनते हैं। हम तो समय के चुके ठहरे, परंतु आप समय को न चूकें, यही आस भी है और विश्वास भी।

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