ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बोले रे पपीहरा, अब घन गरजे
01-Jul-2016 12:00 AM 4870     

मेघाच्छादित आकाशा को देख मयूर नाचने लगते हैं। पपीहा "पिय आया, पिय आया' गाने लगता है।
दादुर और झींगुर अपनी हर्षध्वनि से पावस ऋतु का स्वागत करते हैं। कुल मिलाकर, प्रकृति के संगीत
और मानवीय उमंग का एक सुंदर संपर्क बन जाता है। चहुँ ओर मंगल वर्षा होने लगती है।

भारत में ऋतुओं की संख्या छह है- ग्रीष्म, वर्षा, शारत्, हेमंत, शाीत और बसंत। इन छह ऋतुओं में से बसंत ऋतु को ऋतुओं का राजा और वर्षा को ऋतुओं की रानी माना गया है। रानी माता का एक रूप है- श्रृंगार प्रियता का रूप। वर्षा रानी धरती माता का साज-श्रृंगार करती है। अविराम वर्षा के बाद धरती माता की गोद हरी-भरी तथा शारीर स्निग्ध और कोमल हो जाता है। सम्पूर्ण प्रकृति शाीतल और रंगीन हो जाती है और जिस प्रकार वर्षा नवजीवन की सृष्टि करती है, उसी प्रकार कवि, साहित्यकार, चित्रकार, संगीतकार आदि इस ऋतु के मनोहारी आकर्षण से प्रेरित होकर सृजनधर्मी हो जाते हैं और हम उनकी कलाओं के रस वर्षण का आनंद पाते हैं।
खासकर संगीत के लिए वर्षा ऋतु एक महत्वपूर्ण ऋतु मानी जाती है। यह मल्हार गायन और वादन की ऋतु है। कई प्रकार के मल्हार इस ऋतु में गाये-बजाये जाते हैं। यथा मियाँ मल्हार, शाुद्ध मल्हार, मेघ मल्हार, सूरदासी मल्हार के अलावे राग देशा से फिजाँ गूँजने लगती है और इनके साथ-साथ नदियों के कलकल, झरनों के झरझर, मेघों के गर्जन, पपीहे के पीहु पीहु, मेढकों के टर्र-टर्र आदि से प्रकृति भी अपने राग-रंग में डूब जाती है।
वस्तुतः मियाँ मल्हार या मियाँ की मल्हार संगीत सम्राट तानसेन द्वारा सृष्ट राग है। मेघ मल्हार को राग मेघ के नाम से भी जाना जाता है। इसी प्रकार सूरदासी मल्हार को सूर मल्हार भी कहते हैं। इनके अलावे मीराबाई का मल्हार, गौड़ मल्हार, रामदासी मल्हार प्रमुख हैं।
राग मल्हार के बारे में एक किम्वदन्ती मुझे याद आती है, जो इस प्रकार है- ग्रीष्म ऋतु के प्रचंड ताप की वेदना से जब धरती कुम्हलाकर मैली सी हो जाती है और लोगों के मनोभाव भी मलयुक्त हो जाते हैं, तब बारिशा का जल त्रिविध तापों को शाीतलता प्रदान करता हुआ सभी प्रकार के मलों को हर लेता है। राग मल्हार भी मल का हरण कर स्वच्छ और सुंदर प्रकृति के राग और रंग से मानव मन को एकाकार करता है।
मियाँ की मल्हार की एक विख्यात बंदिशा है- बोले रे पपीहरा अब घन गरजे... इसी तरह राग मेघ की झपताल में निबद्ध एक प्राचीन और पारम्परिक बंदिशा के बोल है- गरजे घटा घन कारे री कारे, पावस रुत आई...
पावस ऋतु में अधिकतर विभिन्न प्रकार के मल्हार को ही गाया-बजाया जाता है। मल्हार के अलावे इस ऋतु का कुछ और रागों से सम्बन्ध है, जैसे राग देशा, जैजवंती और वृन्दावनी सारंग।
मल्हार में सबसे प्राचीन राग मेघ या मेघ मल्हार को ही माना जाता है जो कि औड़व- औड़व जाति (गांधार और धैवत वर्जित) का है, जो काफी ठाट से उत्पन्न हुआ। किसी-किसी घराने के कुछ संगीतकारों ने मेघ या मेघ मल्हार में कोमल गांधार का प्रयोग करके रागों की खूबसूरती को निखारा है।
हिंदी फिल्मों में भी राग मेघ मल्हार का सुन्दर प्रयोग हुआ है। सन् 1942 में निर्मित फिल्म "तानसेन' में मेघ राग पर आधारित एक विख्यात गीत "काले बदरवा पिया बिन ...' (गायक- खुर्शाीद बेगम, संगीत निर्देशान- खेमचन्द्र प्रकाशा) आपको स्मरण ही होगा। सन् 1969 में बनी एक और हिंदी फिल्म "कवि कालिदास' का एक गाना बहुत ही कर्णप्रिय है- "ओ आषाढ़ के पहले बादल, ओ नभ के काजल...' (गायक- मन्ना डे और लता मंगेशाकर, गीतकार- भारत व्यास और संगीत- एस.एन. त्रिपाठी)।
राग मियां मल्हार का लोकप्रिय फ़िल्मी गीत "बोले रे पपीहरा पपीहरा...' है, जिसे फिल्म "गुड्डी' में जया भादुड़ी पर फिल्माया गया था। इस गीत को वाणी जयराम ने अपना स्वर दिया था और इसके संगीतकार वसंत देसाई थे।
राग गौड़ मल्हार का भी विख्यात फ़िल्मी गीत "चलत पग मृगनयनी सुंदर...' (गायिका- रौशानआरा बेगम, फिल्म- नीला पर्वत, 1969) है, जो पावस ऋतु की रागमयी उपस्थिति को प्रस्तुत करता है। इसी तरह जितने भी फ़िल्मी गीत राग मल्हार पर आधारित बनाए गए, उन सबने इतिहास ही रचा।
शाुद्ध शाास्त्रीय संगीत के अलावे उपशाास्त्रीय संगीत के गायन की भी परम्परा इस ऋतु में रही है। इसमें कजली या कजरी प्रमुख है। मूलतः उत्तर प्रदेशा में जन्मी कजरी भारतीय लोक संगीत की एक विधा है। इसमें वर्षा-वर्णन, विरह-प्रेम, राधा-कृष्ण लीला आदि का गायन किया जाता है। उत्तर प्रदेशा के वाराणसी और मिर्जापुर आदि जगहों में स्त्रियाँ देवी की पूजा करते समय भी कजरी गाती हैं। उप शाास्त्रीय संगीत के कलाकार ठुमरी अंग में कजरी गाते हैं जो कि जत् ताल, दीपचन्दी, अर्धा (सितारखानी) तालों में गाया जाता हैं।
वर्षा ऋतु धान रोपने की भी ऋतु है। भारत के धान बाहुल्य प्रदेशाों में धान रोपनी का अपना अलग और निराला लोक संगीत है, जिसे अक्सर स्त्रियाँ धान के पौधे को रोपने के समय गाती हैं। नदियों में जल के तीव्र बहाव और मछलियों की अधिकता से नाविकों, मल्लाहों और मछुआरों का मन भाव-विभोर हो उठता है, जो उनके गीतों के रूप में प्रस्फुटित होता है। कुआरीं कन्याएं सावन में झूला झूलते हुए गाती हैं। मिथिलांचल में नवविवाहिताएं मधु श्रावणी का व्रत करती हैं और इस दौरान सौभाग्य का गीत गाया जाता है। मेघाच्छादित आकाशा को देख मयूर नाचने लगते हैं। पपीहा "पिय आया, पिय आया' गाने लगता है। दादुर और झींगुर अपनी हर्षध्वनि से पावस ऋतु का स्वागत करते हैं। कुल मिलाकर, प्रकृति के संगीत और मानवीय उमंग का एक सुंदर संपर्क बन जाता है। चहुँ ओर मंगल वर्षा होने लगती है

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