ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बोलचाल बनाम कार्यालयीन हिंदी
01-Sep-2017 10:40 AM 6036     

भाषा और मनुष्य का आपसी संबंध कुछ इस प्रकार है कि एक के बिना दूसरे की कल्पना नहीं की जा सकती है। भाषा ही हमारे चिंतन, भाव-बोध, संप्रेषण संवाद का महत्वपूर्ण साधन है। हम न केवल भाषा के सहारे सोचते हैं किंतु समझते और समझाते भी हैं। भाषा के जिस रूप का प्रयोग किसी विशिष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए किया जाता है उस भाषा रूप को प्रयोजन मूलक अर्थात फंक्श्नल लेंगवेज कहा जाता है, प्रयोजनमूलक यानी जीवन की विविध एवं विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु उपयोग में लाई जानेवाली हिंदी। बीसवीं सदी के अंतिम पांच दशकों में हिंदी केवल सामान्यत बोलचाल तथा साहित्य तक ही सीमित नहीं रही बल्कि यह प्रशासन, न्यााय, पत्रकारिता, वाणिज्य, बैंक, विज्ञापन आदि विभिन्न क्षेत्रों में भी प्रयुक्त हो रही है। ये सभी क्षेत्र औपचारिक भाषा प्रयोग के क्षेत्र हैं, जिनके लिए हिंदी में उन क्षेत्रों के भाषा रूप अर्थात पारिभाषिक रूप को विकसित करने की जरूरत को अनुभव किया गया। मसलन विभिन्न व्यवसायों से संबंधित व्यक्तियों जैसे बैंकर, व्यापारी, पत्रकार, डॉक्टर, वकील, प्रशासक, वैज्ञानिक आदि के कार्यक्षेत्रों में प्रयुक्त, होनेवाली हिंदी बोलचाल की हिंदी से अलग होगी। वह खास उस क्षेत्र के प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होगी। भाषा के सभी रूप, चाहे वह बोली जाने वाली भाषा के हों या लिखी जानेवाली भाषा के, मानव सभ्यता और संस्कृति के लिए जरूरी है।
पिछले तीन दशकों में जिस तेजी से समाज और संस्कृति में परिवर्तन हुए है उसके चलते हिंदी का इस्तेमाल सिर्फ दफ्तरी हिंदी या साहित्यिक हिंदी तक सीमित न रहकर तमाम गैर पारंपरिक क्षेत्रों में फैल गया है। इन माध्यमों में हिंदी की दस्तक इतनी अनायास और अनाक्रामक है कि बिना किसी शोर शराबे, जोर जबर्दस्ती या विज्ञापन के इसका इस्तेमाल एक अलग अंदाज में बढ़ता ही जा रहा है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण ने समकालीन यथार्थ को गहरे प्रभावित किया है। सूचना और इलेक्ट्रॉनिक क्रांति ने बैंकिंग, व्यवसाय, व्यापार, राजनीति और साहित्य को ही नहीं बदला है बल्कि भाषा के सरोकार भी बदल गये हैं। आज के समय में जिन उपकरणों ने लोगों का जीवन, रंग-ढंग, सामाजिक तौर तरीका, चाल-चलन और अभिव्यक्ति के अंदाज एवं भाषा के इस्तेमाल में परिवर्तन कर दिया हैं उनमें अखबार, टेलीविजन, रेडियो, इंटरनेट, मोबाइल का खास दखल है।
संवाद के इन आधुनिक उपकरणों के चलते बोलचाल की हिंदी का खूब विस्तार हुआ है। जब भाषा का विस्तार होता है तो जाहिर है शब्द भंडार भी बढ़ता जाता है। "विस्तृत" होते इस शब्द भंडार का नमूना इन वाक्यों में देखिए। "एक्जाम" सिर पर हैं और मैंने अभी तक एक भी "बुक" खोलकर "स्टडी" नहीं की है। मेरे "माइंड" में कुछ घुस नहीं रहा है, दो "बुक्स" "नावल" और "स्टोरी बुक" तो मैंने अपनी मम्मी को पढ़ने को दे दी है। वही मुझे इनका "थीम" बता देगी। इसी तरह विज्ञापन एवं पत्रकारिता की एक बानगी देखें, "गर्मी से राहत पाने के ट्रिक्स समर ब्यूटी एंड फूड स्पेशल", "डबल होंगी सभी सिंगल लेन सड़कें।"
इसी तरह अखबारों की भाषा का नूमने देखें- अपनी जॉब से यंगस्टनर्स को एंटरप्रेन्योरशिप की राह दिखा रहे हैं, जबकि गवर्नमेंट हमेशा जॉब्सब क्रियेट करने की बात करती है। कंफ्यूजन अच्छी चीज है अपनी बच्चों के कंफयूज होने पर भी हमें ओके रहना चाहिए। क्योंकि कंफयुज रहेंगे तो माइंड खुला रहता है। फोकस करके कंफ्यूजन को दूर कर सकते हैं।
इन वाक्यों में कितने शब्द अंग्रेजी के हैं उसे देखकर लोगों का यह तर्क रहता है कि चाहे ये शब्द अंग्रेजी के हैं, पर इस्तेमाल तो अक्सर होते हैं। इसलिए इन्हें स्वीकार करने में क्या हर्ज़ है। कोई हर्ज़ नहीं। पर समस्याएं बहुत हैं। क्या इतने ज़्यादा शब्द स्वीकार कर लिए जाएं पर क्रियाओं, कारकों, लिंग, वचन और वर्तनी का क्या किया जाए? बोलचाल में तो खैर व्याकरण को ताक पर रखा जा सकता है, बोलने वाला बिना पूछे ही रख भी देगा, पर लिखित भाषा का क्या? हिंदी और इसकी लिपि बहुत वैज्ञानिक मानी जाती है। फिर उसमें बहुवचन के रूप में एक्जाम्स लिखें या एक्जाम, बुक लिखें या बुकें, स्टाइल या स्टाइलें, ट्रिक या ट्रिक्स, थीम को पुÏल्लग मानें या स्त्रीलिंग। बैंक से बैंकिंग प्रचलित हो गया। आने वाली पीढ़ी "बैंकिंग" को सिर्फ संज्ञा मानेगी जबकि यह तो क्रिया भी है। पहले इस तरह की बात उर्दू भाषा के शब्दों के बारे में की जाती थी कि "कागज़" का बहुवचन उर्दू के हिसाब से "कागजात" हो या हिंदी के हिसाब से "कागजों"। "हाल" को बहुवचन में "हालात" लिखना ठीक लगता है पर हिंदी व्याकरण लगा देने से "हाल", "हालें", "हालों" या "हालातों" लिख देने से हालत बिगड़ने लगती है। सारे प्रयोग ही बचकाने लगते हैं। जैसे बैंक से बैंकों चल निकला है पर बॉण्ड से बॉण्डों, चेक से चेकों, या डिविडेंड से डिविडेंडों लिखते-पढ़ते समय हिंदी प्रेमी न चाहते हुए भी नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।
यूं तो भाषा हर वक्त बदलती है लेकिन बाज़ार की शक्तियां कभी-कभी उसे बहुत तेजी से बदलती हैं और भाषा का बदलना और उसे अपनाना जरूरी हो जाता है। हिन्दी के साथ यही हो रहा है। ऐसे परिवर्तन को देखकर एक सहज प्रतिक्रिया भाषा के शुद्धतावादी आग्रह के रूप में प्रकट होती है। परंपरागत शब्द, वाक्या जब नए बनने लगते हैं तो परंपरागत शब्दों की आदी जुबान और कान कष्ट पाने लगते हैं। चूंकि भाषा के बदलने का अर्थ "जीवन का बदलना" भी है इसलिए "न बदलने वाले तत्व" ऐसी परिवर्तनकारी स्थिति में बड़ा कष्ट पाते हैं। वे नहीं मानते कि कोई भी भाषा कभी भी "शुद्ध" नहीं रही, न रह सकती है और बदलना उसकी प्रकृति है। भाषा के बदलने के हिमायती अक्सक यह तर्क देते हैं कि शब्द "टेस्ट टूयब बेबी" नहीं हैं, जिन्हें सोच विचारकर प्रयोगशाला में पैदा किया जाये। शब्द तो अनायास ही जाने-अनजाने आसपास की परिस्थितियाँ, जरूरतों से उपजते हैं, सजते-संवरते हैं, प्रचलित होते हैं, मरते हैं, पुनर्जन्म पाते हैं और इस तरह इनकी जीवन यात्रा अनवरत चलती रहती है। अलग-अलग शहरों, स्थानों में उनकी अलग-अलग भंगिमाएं, अलग-अलग अंदाज होते हैं, जो वहां की आबो-हवा से पैदा होते हैं। शब्दों ही नहीं, वाक्यों पर भी अलग-अलग संस्कारों परिवेशों का असर पड़ता है। दो भिन्न संस्कार और परिवेश वाले लोग किसी एक ही बात को अलग-अलग ढंग से बोलेंगे। हमारे बोलने का ढंग हमारी संस्कृति एवं जीवन पद्धति से जुड़ा होता है। यह बात हैदराबाद की हिंदी, दक्षिण भारतीयों की हिंदी या मुंबइया हिंदी में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। जोधपुर में लोग गाली भी जी लगाकर देते हैं, हमारी जीवन शैली भी हमारी भाषा को प्रभावित करती है, जैसे लखनऊ के खालिस नवाबी परिवेश में पला व्यक्ति गाली भी बेहद सभ्य एवं सलीके से देगा - जैसे "जनाब, आपको शर्म आनी चाहिए", पहले जनाब कहा फिर लताड़ा। "हुजूर आपका शराफत से ताल्लुक नहीं है।" इसी प्रकार पंजाब के परिवेश एवं रंग ढंग में पला-बढ़ा व्यक्ति खुशखबरी भी गाली के अंदाज में ही देगा। "अबे पाजी! इधर आ, तू तो बड़ा शातिर निकला, तू फस्र्टं डिवीजन में पास हुआ है।" या "साले, तू विदेश में नौकरी के लिए जा रहा है।" जीवन और भाषा का अटूट रिश्ता होने के कारण जीवन के अनुकूल भाषा पर उसका प्रभाव दिखाई देता है। जैसे बनारस का आदमी किसी का हालचाल पूछेगा तो कहेगा- "का गुरु, का हालचाल हय" इससे बनारस की जीवन शैली का बोध होगा, जहां किसी को किसी काम की जल्दी नहीं। सब कुछ इत्मीनान से अपने आप होता है। अत: उसकी भाषा में एक स्थिरता है, जल्दबाजी नहीं दिखती, किंतु यही हालचाल यदि मुंबई या दिल्ली का आदमी किसी से पूछेगा तो कहेगा- "और क्या हाल, सब ठीक ठाक।" इसमें एक हड़बड़ी दिखाई पड़ती है। उसके प्रश्न में तेजी है। सवाल के साथ ही जवाब भी शामिल है, जवाब की प्रतीक्षा भी नहीं करता, बल्कि उसका उत्तर स्वयं देकर शीघ्रता से आगे बढ़ जाता है।
जाहिर है, भाषा-प्रयोग से वहां के लोगों की जीवन पद्धति का फर्क पता चलता है। मुंबई में बोलचाल की अपनी खास शैली है जिसमें कांदा-बटाटा, बनेला, बिगड़ेला, सड़ेला, खायेला, पियेला, मेरेकू, तेरेकू, जास्ती, बिंधास, घाई-घाई, भेजा, लफड़ा, खाली-पीली, नाका, फोकट में, चल-फुट, बोम काय को मारेला है जैसे तमाम शब्द यहां के लोगों की बोलचाल के अंग बन चुके हैं और अटपटा भी नहीं लगता, कुछ ही दिनों में ये शब्द बाहर से आकर यहां बसे लोगों की जबान पर भी चढ़ जाते हैं। हैदराबाद की हिंदी का भी एक अलग अंदाज है। पूरा वाक्य न कहकर चंद शब्दों में ही बात कह देना हैदराबादी हिंदी की खासियत है। लय, स्वर को खींच कर अपनी बात रखी जाती है- मेरु कू नको! तूमने क्यों कर करा? का बातां करी हऊ! क्या बोल रए भई! कहां कू जाना! बातां बड़े मजे करतां! इंगे कू जाके उंगे कू मुड़ जाना! हौ की जगह हऊ! बड़े मियां आदि। महमूद की फिल्मों में हैदराबादी हिंदी के मजेदार उदाहरण मिलते हैं।
स्पष्ट है कि भाषा किसी बने बनाये, रटे रटाये नियमों में बंधकर नहीं चलती, वह सहज स्वाभाविक रूप से अपने भौगोलिक परिवेश और सांस्कृतिक रंग में रंगकर उपजती जाती है। भाषा जानने के लिए बड़े-बड़े शब्दकोशों या पारिभाषिक शब्दों की दरकार नहीं होती। बस वह दिल से निकलनी चाहिए! यूं भी देखा जाये तो हम पाते हैं कि जब-जब हमारी जिंदगी बदलती है उसी के अनुरूप कई शब्द और अभिव्यक्तियां हमारे जीवन और जबान पर आ जाती है। हिंदी में धडल्ले से प्रयोग में आ रहे अंग्रेजी शब्दों को देखकर अक्सर कई लोग उत्तेजना से भर उठते हैं। किंतु आज के समय में यह जरुरी है कि जो हो रहा है उसे समझा जाये, क्योंकि जो हो रहा है उससे हिंदी भाषा का एक नितांत नया और जबरदस्त ढंग से सामथ्र्यवान और निर्भय रूप उभर रहा है।
हम दैनंदिन व्यवहार में उसी भाषा में बात करना पसंद करते हैं जिसमें बोलने, स्वयं को अभिव्यक्त करने में हमें कोई हिचक न हो, किसी प्रकार की कुंठा न हो, जिसमें हम बेझिझक खुल कर अपनी बात कह सकें और जब दो व्यक्तियों के बीच कोई एक सामान्य भाषा न हो तो जाहिर है उसे एक ऐसी सम्पर्क भाषा का सहारा लेना ही पड़ेगा जिसमें वे दोनों आपसी संप्रेषण कर सकें। भारत जैसे विविध भाषी देश में जहां केवल गिनी-चुनी जनता को अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है और जहां भाषागत स्वरूप में इतनी अधिक भिन्नता है और एक प्रांतीय भाषा जानने वाला दूसरे राज्य की भाषा का एक शब्द भी नहीं समझ सके तो ऐसे में देश के सर्वाधिक क्षेत्र में, सर्वाधिक लोगों द्वारा बोली-समझने वाली भाषा के रूप में हिंदी ही ऐसी कड़ी बन सकती थी। कहना न होगा कि हिंदी अपनी इस जन-सम्पर्क की भूमिका में पूरी तरह से खरी उतरी है।
सरकारी कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग एक ऐसा क्षेत्र रहा है जिसमें हिंदी का विकास सहज रूप से करने की बजाए निर्देशों और आदेशों के अर्थ में ज्यादा किया गया है। संविधान में हिंदी का राजभाषा का दर्जा देने, राजभाषा अधिनियम एवं नियम बनने के बाद 1970 से आज लेकर हिंदी के कार्य को लगभग पांच दशक पूरे होने को हैं। उस दौरान राजभाषा हिंदी का मूल उद्देश्य बैंकों की समूची कार्य संस्कृति में भाषिक परिवर्तन लाना था, ताकि देश की आम जनता के बीच संवाद एवं कामकाज की भाषा हिंदी हो सके। हिंदी अधिकारियों से संप्रेषण अधिकारी के रूप में काम की अपेक्षा थी जो दो भाषाओं को जोड़कर सेतु के रूप में काम करें। पर तमाम प्रयासों, नीति, नियमों के बावजूद बैंकों एवं सरकारी कार्यालयों में मूल रूप में हिंदी में कामकाज का दायरा काफी सीमित है। सदियों से अंग्रेजी में कामकाज की जो प्रथा बनी हुई थी उससे अलग हटकर हिंदी में स्वतंत्र रूप से काम करने की प्रवृत्ति आज भी नदारद है। संपर्क एवं व्यवहार में चाहे हिंदी का भरपूर इस्तेमाल हो रहा है पर हिंदी में जितना भी लिखित काम हो रहा है वह अनुवाद के जरिए ही हो रहा है। अनुवाद की इस संस्कृति की वजह से हिंदी अनुवाद आधारित पिछलग्गू भाषा बनकर ही रह गई है और हर काम को अनुवाद के जरिए करने के कारण सरकारी कार्यालयों एवं बैंकों में हिंदी का एक कृत्रिम, बोझिल और अटपटा स्वरूप ही दिखाई देता है। हिंदी के क्लिष्ट रूप को स्पष्ट करनेवाला एक चुटकुला प्रचलित है, एक बार एक सज्जन रेल्वे स्टेशन से बाहर आये और एक रिक्शेवाले से पूछा- परिसदन चलोगे? रिक्शे वाला चकरा गया बोला, साहब हम ठहरे अनपढ़, हमें अंगेजी नहीं आती, हिंदी में बोलिए, तब उन सज्जन ने कहा "सर्किट हाउस" चलोगे? इस पर रिक्शेन वाला तुरंत समझकर बोला "हां जरूर चलूंगा"।
इस बोझिल एवं अटपटे स्वरूप का मुख्य कारण है प्रशासन को दी गई हिंदी संबंधी औपचारिकताएं- कितना करना है, कब करना है, कैसे करना है आदि अर्थात आंकड़ों का खेल। कार्यालय के काम में स्वाभाविक भाषा की जगह अनूदित भाषा के प्रयोग के कारण "विकृत हिंग्लिश" का एक रूप विकसित हो गया है। अंग्रेज़ी जानने वालों की बात तो दूर, हिंदी जानने वाले भी इस भाषा के बवंडर में गोते खाते नजर आते हैं और हिंदी के नाम पर क्लिष्टता का लेबल चस्पा हो गया है। इसे कठिन बनाने में तथाकथित हिंदीदां ज्ञानवीरों का भी बड़ा हाथ है जो कथ्य की बजाए शब्दों से जूझते रहे और "मक्षिका स्थाने मक्षिका" वाली हिंदी गढ़ते रहे। लेकिन अब पिछले कुछ सालों से इसमें अनुवाद की जगह पुनर्सृजन या पुनर्लेखन की बात उठी है। जहाँ-तहाँ इस पर विचार भी हुआ है। कुछ सुपरिणाम भी देखने में आए हैं और लगता है कि यदि इस प्रक्रिया को सही रूप में अपना लिया जाए तो सरकारी हिंदी वाली बात खत्म हो सकती है और कामकाज में भाषा के उपयोग को लेकर नयी संभावनाओं को ढूंढा जा सकता है।
भाषा की दृष्टि से भले ही कुछ सुधार की ज़रूरत हो किंतु इसे मानने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए कि प्रशासन के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कठिन परिस्थितियों के चलते भी हिंदी किसी हद तक अपनी जगह बनाने में सफल हुई है। प्रशासन में हिंदी के प्रयोग की विफलता को लेकर कुछ लोग अक्सर विलाप-सा करते रहते हैं। ऐसा लगता है कि यह भी एक तरह की अतिवादी प्रतिक्रिया है। हमें समय के साथ उभर रही नयी संभावनाओं पर भी अपनी नज़र रखनी चाहिए।
आज न्यायालयों ने संविधान में दर्ज़ क्षेत्रीय भाषाओं में कागज-पत्रों को स्वीकार करना शुरू कर दिया है। कुछ हिंदीभाषी राज्यों की अदालतों ने तो काफी कार्रवाई भी हिंदी में करनी आरंभ कर दी है जिनमें निर्णय देना तक शामिल है। पर देखा जाए तो यह सुधार अभी निचली अदालतों एवं जिला और सेशन अदालतों तक सीमित है। उच्च न्यायालयों या उच्चतम न्यायालय के गलियारों में अभी हिंदी की गूंज नहीं है। धीरे-धीरे ही सही, पर न्याय के क्षेत्र में भाषा को भी न्याय की अपेक्षा है। यहां यह उल्लेखनीय है कि जनता के बीच व्यवहार की भाषा के रूप में हिंदी के कामकाज का दायरा अत्यंत व्यापक और विविध है। इसमें केवल आपसी संप्रेषण नहीं बल्कि मार्केट में उत्पादों के विज्ञापन, जनता के बीच अपनी योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार, मनोरंजन और प्रौद्योगिकी के प्रयोग का क्षेत्र भी शामिल है। बैंकिंग क्षेत्र में वाणिज्य, लेखा, विधि, अर्थशास्त्र आदि विषयों से जुड़ी सामग्री के साथ साथ कृषि, लघु उद्योग और आम आदमी यानी ग्राहकों से जुड़े न जाने कितने क्षेत्र हैं जो समूचे कामकाज का हिस्सा हैं।
प्रौद्योगिकी के विकास के साथ इंटरनेट, मोबाइल, एटीएम आदि न जाने कितनी तरह के और माध्यम हैं जो ग्राहकों से संवाद के क्षेत्र हैं जहां इनसे जुड़ी जानकारी को सहज सरल, समझने आनेवाली भाषा में अभिव्यक्त करना जटिल और चुनौतिपूर्ण है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से उन क्षेत्रों में प्रचलित शब्द हिंदी में अपना लिये जाते हैं और अंतत: वे हिंदी का एक हिस्सा बन जाते हैं। यह सहज प्रयोग से विकसित हो रही भाषा का रूप है जो अनुवाद की भाषा से बहुत अलग है।
इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि किसी उपभोक्ता वस्तु के विज्ञापन या उसके प्रयोग संबंधी निर्देश देने वाली भाषा और किसी सरकारी कार्यालय द्वारा जारी विज्ञापन की भाषा में जमीन आसमान का अंतर होता है। कारण बहुत ही सरल है - पहली स्थिति में उद्देश्य उपभोक्ता वस्तु की बिक्री और उस क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों की आम बोल चाल की भाषा में अपने सामान को जनता तक पहुंचाने का प्रयास है जबकि दूसरी स्थिति में अंग्रेजी में मूल रूप से तैयार विज्ञापन को राजभाषा संबंधी अनुदेशों के कारण हिंदी में अनुवाद कर प्रस्तुत करना है। पहली स्थिति में स्व-भावना, स्व-प्रयास शामिल है, जबकि दूसरी स्थिति महज कागजी कार्रवाई के लिए की गयी लीपा-पोती है।
आज व्यवसाय की तेज शक्तियों ने जनता को लुभाने, आकर्षित करने के लिए भाषा को बदल दिया है। नई व्यावसायिक हिन्दी को इस तथ्य का नोटिस लेना चाहिए। जिस रूप में व्यावसायिक हिन्दी की कल्पना की जाती है वह नए बाजार की नई व्यावसायिक हिन्दी से मेल नहीं खाती। इस क्रम में उपलब्ध और निर्धारित व्यावसायिक हिन्दी को नए बाजार के अनुकूल दुरुस्त किया जाना चाहिए। कठिन अनुवादों की जगह प्राय: प्रचलित अंग्रेजी शब्दों को यथावत या थोड़ा घिस के रखा जा सकता है। मसलन, कॉल मनी के लिए "शीध्रावधि द्रव्य" मुद्रा की जगह "कॉल मनी" ही चलाया जाए तो वह जुबान पर ज्यादा चढ़ेगा। "कन्फिस्केमशन" के लिए "अधिहरण" की जगह कन्फिमस्केशिन ही रहने दिया जा सकता है। कंपनी डिलीवरी, सप्लाई, प्रोजेक्शन, शेयर, स्टॉक, इन्फ्लेेशन, हैकर्स, ई-कॉमर्स, ई-बिजनेस, अखबार, आदि शब्द देखते-देखते प्रचलन में आए हैं। बढ़ते भ्रष्ट्राचार से "किक बैंक" मनी लांडरिंग, जैसे शब्द को हिन्दी में चला दिया। शेयरों के नाम, कंपनियों के नाम सभी अंग्रेजी में ही चलते हैं। इसी में से नई भाषा बनती है। आज वक्त की यही जरूरत है कि व्यवसायों और बाजार के बीच नयी बन रही हिन्दी का व्यापक सर्वेक्षण किया जाए और नई शब्दावली गढ़ी जाये।
अब प्रश्न यह उठता है कि खुले बाजार की अर्थव्यवस्था में हिन्दी का कामकाजी स्वरूप क्या होगा और कैसे होगा? सबसे पहले भाषा को "बाजार-मित्र" बनना होगा। शब्दावली तथा पाठ्यक्रम निर्माताओं को अपने पुराने ढंग के भाषा बोध को छोड़कर यह समाजशास्त्री य एवं भाषा वैज्ञानिक सत्य स्वीेकार करना होगा कि बनाई जाने वाली कार्यालयीन या कामकाजी भाषा किताबों और कोशों से नहीं बनाई जाती बल्कि स्थानीय वाचकों, बरतने वालों, बाजार के दुकानदारों, पल्लेदारों, मजदूरों, किसानों, व्यावसायियों, बैंकरों आदि के बीच कामकाज के विभिन्न स्तरों पर बन रही भाषा के बीच से स्तरीय शब्द चयन के जरिए बनती है और वहीं से उसे चुना जाना चाहिए। यदि ऐसा किया जाता है तो खुले बाजार की अर्थव्यवस्था के मित्र के रूप में नई भाषा बनाई जा सकती है। मौजूदा व्यावसायिक अथवा प्रशासनिक या कामकाज की हिन्दी हालांकि धीरे-धीरे बदल रही है किंतु इसे जल्द से जल्द बाजार-मित्र व बाजारनुकूल होना पड़ेगा।
इस क्रम में यह बात और ध्यान में रखी जानी चाहिए कि बाजारोन्मुख जनसंचार माध्यमों में भाषा रोज बनती बिगड़ती है और नये शब्दकोश यहीं से बनाए जा सकते हैं और उसी के अनुरूप कामकाज की शब्दावलियां एवं शब्दकोशों में निरंतर सुधार होना चाहिए। भविष्य में व्यावसायिक भाषा के रूप में हिंदी जितनी अधिक सहज और जीवंत होगी, उतनी ही यह जनसामान्य में अपनी जगह बनायेगी।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 15.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^