ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
रक्त कमल
02-Jul-2019 11:16 AM 185     

रक्त कमल नाम था उसका। हालांकि इस नाम के साथ "था" लगाने में दिल और दिमाग दोनों को ही सख़्त ऐतराज़ है। न ही हाथों को यह कबूल है कि उसकी कोई नई पुरानी तस्वीर एक अच्छे से फ़्रेम में जड़कर दीवार पर लटका दी जाए। हां आंख और कान चाहे खुले हों या बंद वो स्टैटन आइलैंड से लौंग आइलैंड की तरफ़ लौटती हुई फ़ैरी के कोने में खड़ी दिखाई भी देती है और सुनाई भी। अपनी सहज स्वभाविक रसीली आवाज़ में वही गाना गाती हुई जो कई बार मेरी ज़िद से की फ़रमाइश पर ही उसने सुनाया है।
तूमी मेघला दीनेर नील आकाशेर शौप्न आमार मोने/ तूमी आलोक पियाषी पियाषेर आशा निबिड़ आंधार खोने।
(तुम बादलों से घिरी दुपहरी में नीले आसमां का स्वप्न हो मेरे लिये। / तुम निबिड़ अंधेरे लमहे में रोशनी की प्यासी प्यास की आशा हो मेरी।)
गाते हुऐ वो अपनी ढाकाइल साड़ी का पल्ला कभी दोनों हाथों से फैला कर शाम के धुंघलाते आकाश की तरफ़ उठाती, कभी ज़रा-सा झटककर समंदर को दिखा देती। ऐसा लगा जैसे हल्की हवा में उड़ कर बहती लहरों को तसल्ली दे रही हो कि इत्मीनान रक्खो तुम! सांझ का पहला तारा उगने तो दो। अपने दामन में सहेज कर तुम्हीं को नज़राना दे दूंगी।
"तूमी मेघला दीनेर" वाला गाना मैंने पहली बार उसी से सुना था। उसके बाद न किसी को यही गाना गाते सुना न सुनते। और जब कभी उसको गाते सुना तो यूं लगा कि यह गाना या तो उसने ख़ुद ही लिखा है या फ़कत उसी के लिये लिखा गया है। ख़ास कर गाने का अंतरा :
तूमी भ्रमर फूले ते कानेर काने कौवा कौथा।
तूमी अलीर बूके ते फूटिबार आकुलौता।
तूमी राधार बूके ते कानूर तृषा ओ गो प्रेमेर बृंदाबोने!
(तुम वो बात हो जो भंवरे ने फूल के कानो में कही!
तुम कली के दिल में फूल बनके खिलने की आकुलता हो!
तुम प्रेम के बृंदाबन में कान्हा की तृष्णा हो राधा के मन की!)
त्रिपुरा में जन्मी और कलकत्ता में तालीम हासिल करने वाली वो बंगालन जब गाती तो उसका तलफ़्फुज़ और अंदाज़ उसकी आवाज़ में एक हल्की-सी नमकीनी मिला देते। अल्फ़ाज़ और अहसास की जुगलबंदी का बेजोड़ रिश्ता उसके दिलकश चेहरे के साथ धूप छांव की लुक्का छिप्पी खेलता साफ़ दिखाई देता। फ़ैरी से उतरती भीड़ को एक झटका-सा लगा तो उसके पीछे आते हुए अजनबी ने उसको संभाल लिया। ट्रेन तक मेरे साथ दस मिनट तक पैदल चलते हुए वह कुछ नहीं बोली। ट्रेन में बैठने के बाद सफ़र का अगला घंटा वो चुपचाप खिड़की से बाहर पीछे दौड़ते नज़ारों को देखती रही और मैं कभी उसको या अपने आसपास की खाली सीटों को। फ़ैसला करना मुश्किल था कि उसके साथ कोई बात शुरू की जाए या उसको उसी मुकाम पर रहने दूँ जहां वो किसी अपने पराये के साथ थी या एकदम अकेली। फिर सोचा कि अब उसके साथ अगली मुलाकात शायद एक साल बाद ही होगी। वैसे भी वह न्यूयार्क मुझी से मिलने आई हुई थी। अगले ही दिन से लंदन में एक महीना रुक कर नई दिल्ली लौट जाना था उसको। पिछले एक हफ़्ते में उसे जितनी बार अनमनी सी देखा, उतनी खोई हुई तो गुज़रे पचास साल में कभी नहीं दिखाई दी।
"क्या सोच रही हो?" मैंने पूछ तो लिया लेकिन साथ यह भी जोड़ दिया कि न बताना चाहो तो भी चलेगा। मेरी फ़िक्रेबाज़ी की आदत से वो बख़ूबी वाकिफ़ थी ही। यह भी पता था उसको कि किसी को पहले कुछ कहलवा कर या ख़ुद कहकर कांधा लेना देना बिल्कुल नागवार न सही मगर मेरे पसंदीदा शौक कतई नहीं थे।
वो मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कुराहट भी अपने आपमें एक आर्ट फ़ार्म हो चुकी थी। हंसती तो ऐसे कि जैसे होंठों से उभरती मुस्कान रोकने की कोशिश में अचानक खिली धूप में एक मस्ताई हुई बदली यकलख़्त बरसकर आगे निकल जाऐ। और मुस्कुराती तो यूं कि जैसे फूलों की क्यारी में से ज़रा सकुचाकर कुछ अधखिली कलियां दामन में समेट रही हो।
"अरे यार! चलती गाड़ी में तो लोग निपट अजनबी को भी राज़दान बना देते हैं। हमको अजनबी ही मान लो आज।" मैंने कहा।
वो मेरे सामने वाली सीट से उठकर मेरी तरफ बढ़ी तो मैंने अपनी खिड़की के साथ वाली जगह उसके लिए खाली कर दी। वो बैठी तो वहीं लेकिन खिड़की की तरफ़ पीठ कर ली और मेरा चेहरा दोनों हाथों में लेते हुए अपनी तरफ़ उठा लिया।
"तूमी तौ जानो कि तूमी आमार ड्ढन्ड़थ्द्वद्मत्ध्ड्ढ थ्र्ड्ढथ्र्दृद्धन्र् डठ्ठदत्त् आछो। आमार जन्ने कौनो दीन द्मद्यद्धठ्ठदढ़ड्ढद्ध हौते पारबो ना। ग़्ड्ढध्ड्ढद्ध, ड्ढध्ड्ढद्ध. (तुम को तो पता है न कि तुम ही मेरा एकमात्र थ्र्ड्ढथ्र्दृद्धन्र् डठ्ठदत्त् हो। कभी, कहीं अजनबी बन जाओ, ऐसा हो ही नहीं सकता। बिल्कुल नहीं। कभी नहीं।)।
"तो यह बताओ कि आज अपने अकाउंट से कुछ निकालना है या वहां कुछ जमा करना है?"
"दोनों में से कूछ बी नौईं।" अपने बंगला उच्चारण में वो बोली और खिड़की से पीठ टिकाकर मुझसे ज़रा दूर खिसक गई।
"अच्छी बात है! अपने बैंक मैनेजर को माछेर झोल और दोही भात खिलाने का न्योता देने वाली हो तो अगले साल दिल्ली आते ही तुम्हारे नए घर तक पहुंचने का इंतज़ार रहेगा मुछे।"
"हैं! शेई हौबे ई। किंतु ऐक्खोने शुदू ऐकटा प्रौश्न कोरते चाई तूमाके।" (हां।वैसा तो होगा ही, लेकिन इसी वक्त मुझे तुम से एक ही सवाल पूछना है।)
"कोई नया खाता खुलवाना है क्या?" मैंने पूछ तो लिया लेकिन इस यकीन के साथ कि रोज़मर्रा की उथल-पुथल से हट कर कुछ ऐसा हुआ है जिसको बताना और छिपाना दोनों ही उसके लिए आसान नहीं हो रहा। मैंने ग़लत सोचा। क्योंकि वो न ही अपना सवाल पूछने में झिझकी और न ही माकूल अलफ़ाज़ का चुनाव करने में कोई ख़ास वक्त लगा उसको।
"नीजेर नाम आगे ऐकटा ओन्न लोकेर नाम दीऐ आमी की पेलाम? बौलो तूमी आमा के?" (किसी अन्य व्यक्ति का नाम अपने नाम के बाद जोड़कर मुझे क्या मिला? तुम बताओ मुझे?)े
उसने हर शब्द पर दबाव डालकर इतनी सफ़ाई से कहा कि जैसे कई बार रिहर्सल कर चुकी हो।
नई दिल्ली में इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च की डिप्यूटी डायरेक्टर की हैसियत से अपना कैरियर शुरू करने के बाद मिनिस्ट्री ऑफ एज्युकेशन में उसी संस्था की मेंबर सेक्रेटरी के प्रतिष्ठित पद से रिटायर हुए डॉ. रक्त कमल बर्मन चन्द्रा को काफ़ी साल हो चुके थे। स्वभाव से मनमौजी और व्यवसाय से बहुभाषी उसके पति डॉ, दिलीप चन्द्रा ने भी करीबन पांच साल पहले आल इंडिया रेडियो से 15 विदेशी भाषाओं के डायरेक्टर्स में से एक के पद से अवकाश पाया था। ह्यूस्टन में एमबीए की डिग्री लेकर वहीं रहने वाला उनका बेटा कम्प्यूटर इंजीनियर तो है ही। अपने चीनी मूल वाले क्लाइंट्स के साथ विशेष व्यापारिक सहयोग कायम करने के लिए जब उन्हीं के उच्चारण सहित उनकी नक्ल उतारता है तो समझ नही आता कि वो गाहक को ललचा रहा है या उसका कचूमर बनाने की धमकी दे रहा है। लंदन से पब्लिक कम्प्युनिकेशन में एमए करने के बाद उनकी बेटी अपनी कम्पनी की प्रमुख प्रतिनिधि है और देश विदेश तो जाती ही है। साथ ही अपनी किशोर सुन्दरता को वेल टेलर्ड वेस्टर्न ड्रेस में समेटे बेहद शालीनता से किसी को इतना भी करीब नहीं आने देती कि कोई हवा का आवारा झोंका बनकर ही बहक जाने की कोशिश कर पाए। पिछले साल जब दिल्ली जाना हुआ तो पूरे परिवार के साथ एक शाम हंसते हंसाते ख़ुशगवार गुज़री थी। उसके मैमोरी बैंक के खाते में से उसकी चालीस बरस पुरानी शादी शुदा ज़िदगी के कई किस्से शामिल थे। सिवाय उसके पति के नाम का। वो हमेशा "भद्रलोक" ही कह कर उसका ज़िक्र किया करती। पहले कुछ अटपटा सा लगा और फिर मुझे भी इसी ख़ासियत को दिलीप के नाम की तरह इस्तेमाल करने की आदत हो गई। ख़ास कर तब जब वो हम दोनों के साथ न हो।
ऐसे ही कुछ पन्ने पलटने में कितना वक्त लगा, इसका अहसास तभी हुआ जब उसने अपना एक हाथ मेरी आँखों पर रक्खा और दूसरे से मेरे माथे को हल्का-हल्का ठोंकना शुरू कर दिया।
"तूमी शूने छो जे आमी जिग्याश कोरे छी? (तुमने सुना है न कि मैंने क्या पूछा?)" वो ज़रा ऊंची आवाज़ में बोली। मैंने हामी भरी लेकिन फिर भी उसने अपना सवाल अंग्रेज़ी में दुहरा दिया : "ज़्ण्ठ्ठद्य ड्डत्ड्ड क्ष् ढ़ड्ढद्य त्द द्धड्ढद्यद्वद्धद ढदृद्ध ठ्ठड्डड्डत्दढ़ ठ्ठददृद्यण्ड्ढद्ध दठ्ठथ्र्ड्ढ द्यदृ द्यण्ड्ढ दठ्ठथ्र्ड्ढ द्यण्ठ्ठद्य त्द्म थ्र्न्र् दृध्र्द?"
"मुझे कुछ सोचने का मौका दोगी?" एक अहम सवाल का तुरंत जवाब देने से बचने की मैंने एक कमज़ोर कोशिश की।
"ग़्दृ. क्ष् ध्र्ठ्ठदद्य द्यदृ त्त्ददृध्र् द्धत्ढ़ण्द्य ददृध्र्." उसका कुदरतन रेश्मी त्वचा से दमकता चेहरा अब तमतमा रहा था।
"मेरे पास तुम्हारे सवाल का कोई जवाब नहीं है।"
"क्यों?"
"क्योंकि हर सवाल का एक ही सही जवाब शायद किसी मैथमेटीशियन को ही आता होगा। मैथमैटिक्स काफी कमज़ोर है मेरा। स्कूल तक सीखना लाज़मी था। इसलिये जमा, नफ़ी, ज़रब, तकसीम करना ही आता है। रिश्तों के नफ़े नुकसान का ब्योरा रखने की आदत नहीं मेरी।"
"ओ शोब आमी जानी। (वो सब मुझे मालूम है।)" उसने मेरी जुमलेबाजी को पूरी तरह नज़रन्दाज़ करते हुए मुझे तक़रीबन लाजवाब ही कर दिया।
"शेई जोन्ने शुदू तूमाके जिग्याश कोरछी। (इसीलिये तो तुमसे ही पूछ रही हूं।)" उसका इसरार टालना मुश्किल हो गया।
"जहां तक मुझे याद है, तुम्हारे खाते में अपने भद्रलोक के साथ अभी तक कोई ज्वाइंट अकाउंट नहीं है तुम्हारे इस बैंक मैनेजर के पास।" मैंने उसके भरोसे का मान रखना चाहा।
"और अगर होता तो?"
"तो फिर मुझे तुमसे आज उस अकाउंट में कुछ जमा करने की बात उठाना मुनासिब लगता।"
"लेकिन क्या?" वो एक लम्बी ख़ामोशी के बाद बोली।
"कुछ ऐसा जिसमें आज के बाद भी कुछ जमा करने की या फिर जहां से कभी कुछ निकलवाने की उम्मीद रहे। और हां! हो सके तो अकाउंट हिंदी या अंग्रेजी में ही खुलवाना। इस बैंक मैनेजर को सहूलियत रहेगी।" मैंने माहौल की संजीदगी के बोझ को कम करना चाहा। वो अब एकदम सहज हो गई। एक निहायत नाज़ुक मुस्कुराहट ने ओठों से सरकते हुऐ उसके माथे को सहला दिया।
"मैं भद्रलोक के लिये आलू, रोटी और अपने लिये माछ, भात जैसा खाना ताज़ा बनाती रहूंगी।"
"और?"
"हम दोनों मॉर्निंग वॉक के लिये साथ-साथ जाते रहेंगे।"
"और?"
"दो साल पहले भद्रलोक का जो चैंटिंग ग्रुप मैंने भी ज्वाइन कर लिया है, मैं वहां भी जाती रहूंगी।"
"और?"
"मुझको हमेशा याद रहेगा कि मिनी और मौंटी अपने पापा को बहुत प्यारे हैं और भाई-बहन दोनों अपने मां पापा के लिये बहुत कुछ करना चाहते हैं।" उसने कहा और एक ऐसी लाचार नज़र से मुझे देखने लगी जो कहती हो कि "मेरे मुँह से ऐसा क्या कहलवाना है तुम्हें जो तुम को मालूम नहीं?"
"एक उम्र के बाद अंधेरे बिस्तर में हुऐ ख़ामोश समझौते मियां बीवी के रिश्ते को अपने तईं कोई नई एनर्जी नहीं दे पाते। ऑन द अदर हैंड, रिश्ते की पुरानी चादर कभी घिसकर, कभी धुलकर ऐसी मुलायम पड़ जाती है कि बिस्तर का पैबंद लगाते हुऐ उसके फट फटा जाने का ख़ौफ़ सतानें लगता है।"
"यह तुमको किसने बताया?" वो इतनी भौचक्की दिखाई दी कि जैसे अचानक किसी ने उसको नाकाबिले बरदाश्त गुस्ताख़ी करते बीच रास्ते में धर पकड़ा हो।
"सुना तो तुम से ही था। कई साल पहले। तुम्हारी अपनी ख़ास बांगला भाषा में। रुक रुककर बोलते हुए जैसे बात नहीं कर रही बल्कि कोई स्क्रिप्ट डिक्टेट करवा रही हो।"
"और सुनकर तुमने क्या कहा?"
"कुछ भी नहीं।" वो खिलखिला कर हँस दी और ज़ोर से सिर हिलाते हुऐ बार-बार कहने लगी : "क्ष् त्र्द्वद्मद्य ड्डदृ ददृद्य डड्ढथ्त्ड्ढध्ड्ढ त्द्य."
"किस बात का? जो तुमने कही? या जो मुझसे कहा न गया?"
"दोनों का।"
"तुम चाहो तो आज वो कह दूं जो तब नहीं कहा गया?"
"हां। बोल दो।"
"मुझे लगता है कि तुम अपने भद्रलोक के साथ एक ज्वाइंट अकाउंट खोल ही लो। यकीन मानो!"
"च्र्ण्ड्ढ द्धड्ढद्यद्वद्धद न्र्दृद्व ढ़ड्ढद्य ध्र्त्थ्थ् डड्ढ थ्र्द्वड़ण् थ्र्दृद्धड्ढ द्यण्ठ्ठद द्यण्ड्ढ त्दद्यड्ढद्धड्ढद्मद्य त्द्य न्र्त्ड्ढथ्ड्डद्म."
"क्तदृध्र् द्मदृ?"
"एड्ढड़ठ्ठद्वद्मड्ढ क्ष् द्मड्ढड्ढ डदृद्यण् दृढ न्र्दृद्व ठ्ठड्डड्डत्दढ़ थ्र्दृद्धड्ढ द्यदृ त्द्य ठ्ठद्म द्यत्थ्र्ड्ढ ढ़दृड्ढद्म डन्र्." वो झट राज़ी हो गई, खुलकर हँसी और दोनों हाथों को कागज़-कलम की तरह मोड़ लिया :
"अब बताओ। क्या करना है?" उस ने पूछा।
"एक पासवर्ड चुन लो।" मैंने भी शुगल जारी रखा।
"तुम सजेस्ट कर दो।"
"तपस्विनी चलेगा?" मैंने उसको ऊपर से नीचे तक एक उड़ती नज़र से देखकर कह दिया।
उसने फ़ौरन अपनी साड़ी का लटकता पल्लू समेटकर पूरी तरह अपनी बाहें और काँधे लपेट लिये। फिर मेरे सामने वाली सीट पर जा बैठी और दायें हाथ की अंगुलियों को माला के मनकों की तरह फिराने की हरकत के साथ अपनी दोनों आंखें मूँद कर, निपट उदासीन आवाज़ में कहा :
"मैं तो पिछले बहुत साल से तपस्विनी ही हूँ। तुमने जो पासवर्ड बनाया वो चलेगा तो नहीं, लेकिन दौड़ेगा ज़रूर।"
स्टैटन आईलैंड की फ़ैरी से उतरने के बाद लांग आईलैंड रेलरोड की सवारी करते हुए उसके साथ मेरी इस रूबरू मुलाकात को करीबन एक साल हो गया तो मैंने दिल्ली फ़ोन किया उसको। उठाते ही बोली :
"तुम पहले दिलीप से बात कर लो।"
"कैसे हो तुम दोनों?" मैंने पूछा तो दिलीप का जवाब उसकी आदतन ज़िदादिली लिये हुऐ भी अलग सा लगा।
"क्या बताऐं आपको? पिछले कई महीनों से हम दोनों बस म्युज़िकल चेयर ही खेल रहे हैं।"
"संगीत बांगला में बजाते हो या पंजाबी में?"
"तीमारदारी का माहौल भी है और मुखातिब आपसे हूं तो उर्दू ही माकूल बैठेगा न?" दिलीप की आवाज़ ज़रा सी चहकी।
"जल्दी बता दो दिलीप। हो क्या रहा है?" मेरी अपनी सांस लम्बी खिंचने से कतरा रही थी।
"पहले स्लिप डिस्क की वजह से मैं बिस्तर से लगा रहा। अब स्टमक वाइरल से निबटने के लिये इनका उठना, बैठना, चलना, फिरना नहीं हो पाता।"
"तो हर महीने साथ जाकर इनको एक नई साड़ी ख़रीदवाने का प्रोग्राम भी मुल्तवी हो गया होगा।"
"जितने महीने नहीं जा पाए, उतनी साड़ियां एक ही महीने में लेने का इरादा तो है ही और लगता यही है कि जल्दी ही पूरा भी..." कहते हुए दिलीप ने "एक्सक्यूज मी" इनको साथ ले जाकर बरामदे की धूप में बैठाना है" बोला तो फ़ोन कट गया।
मैंने तीन चार कोशिश की तो मीठी नींद से उठ कर पहली अंगड़ाई लेती हुई किशोरी के अंदाज में टैलिफ़ोन औपरेटर की वही पिटी पिटाई रिकार्डिंग सुनाई दी कि "आप जिस व्यक्ति से बात करना चाहते हैं, वो अभी व्यस्त है।" एक महीना बाद उसने ख़ुद फ़ोन किया तो दुर्गा पूजा की तैयारियों में लगी वो मिनी और मौंटी के दिल्ली आने का इंतज़ार कर रही थी। कुल मिला कर एक हफ्ते में ही चार नई साड़ियां ख़रीद चुकी थी। बता रही थी कि चेंटिग ग्रुप में जाते वक्त वो हमेशा एक नई साड़ी पहनती है और अक्सर ही अपने चुने रंग, डिज़ाइन और मटीरियल की तारीफ़ सुनती है।
फिर पिछले हफ़्ते ख़बर मिली कि रक्त कमल नहीं रही। नवरात्रि के पहले दिन पूजा के लिये मंदिर गई थी और वहीं पर जलते दीयों से झुलस गई। दिलीप की त्रासदा भाग दौड़ में मंदिर में मौजूद हर एक इंसान ने ख़ुद को जोखिम में डाला। मां को बचाते हुऐ मौंटी का हाथ जल गया लेकिन सिंथैटिक सिल्क की नई साड़ी में जो आग लगी तो उसके तपस्विनी शरीर का सत्तर प्रतिशत हिस्सा भस्म करके ही बुझी। दिल्ली से अब तक फ़ोन आते हैं मुझे यह ख़बर सुनाने के लिये। दिलीप का भी दो बार फ़ोन आ चुका है कि जो मैंने सुना वह सही है। मुझे न किसी को कुछ कहना है। न किसी से कुछ सुनना है।
क्ष् त्र्द्वद्मद्य ड्डदृ ददृद्य डड्ढथ्त्ड्ढध्ड्ढ त्द्य.

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