ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जन्म-शती स्मरण : नेमिचन्द्र जैन
01-Sep-2019 06:58 PM 686     

साहित्य की दुनिया में मेरा दाखिला 1972 में हुआ। शुरुआत कविता लिखने से हुई। उन दिनों नया प्रतीक, कल्पना, माध्यम, वसुधा आदि साहित्यिक पत्रिकाएँ मेरे घर आया करती थीं। उनमें प्रकाशित अनेक लेखकों की रचनाओं के बीच नेमिचन्द्र जैन को एक कवि-समीक्षक और नाट्यालोचक के रूप में पहचाना। उनसे मिलने-जुलने का सिलसिला तो 1982 से शुरू हुआ जब मुझे मध्यप्रदेश में हुए एक बड़े कला-आंदोलन से जुड़ने का मौका मिला। भोपाल में "भारत भवन" का परिसर नेमि जी से मिलने का निमित्त बना। वे वहाँ कई-कई बार आते रहे। वे हमेशा खादी का कुरता और चौड़ी मुहरी का पायजामा पहनते थे। वे अज्ञेय, नामवर सिंह, निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय, कुँवर नारायण आदि लेखकों के बीच अपनी वेष-भूषा और एकान्तिक स्वभाव के कारण कुछ अलग दिखायी पड़ते थे। मैंने इन लेखकों का नाम खासतौर पर इसलिए लिया कि इनकी कविता, कहानी और आलोचना की पुस्तकों पर नेमि जी ने समीक्षाएँ भी लिखी हैं ।
नेमिचन्द्र जैन का पहला कविता संग्रह -- एकान्त -- 1973 में प्रकाशित हो सका। न जाने क्यों उनने इसके प्रकाशन में इतनी देर लगायी। वे तो 1937 से कविताएँ लिख रहे थे और अपने छह-सात बरस के रचनाकाल में ही "तार सप्तक" के कवि के रूप में प्रसिध्द भी हो गये थे। नेमि जी जिस समय में कवि हुए वह बीसवीं सदी का चौथा दशक था और जिसमें रची जा रही कविता की प्रवृत्तियाँ -- छाया और रहस्य, राष्ट्रीयता और स्वच्छंदता के नाम से पहचानी जा रही थीं। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त और महादेवी वर्मा छाया और रहस्य के प्रतिनिधि कवि माने जाते थे। निराला इनसे कुछ अलग राह पर चले। माखनलाल चतुर्वेदी, सियारामशरण गुप्त, रामधारी सिंह दिनकर, बालकृष्ण शर्मा नवीन और हरिवंशराय बच्चन राष्ट्रीय और स्वच्छंद कवियों के रूप में पहचाने जाते थे। इन दोनों कवि-पहचानों के समानांतर कविता में नयी राहों के अन्वेषण की तैयारी भी चल रही थी और अज्ञेय नये कवियों के "तार सप्तक" की योजना बना रहे थे। अज्ञेय के सम्पादन में यह पहला कवि-चयन 1944 में प्रकाशित हुआ जिसमें अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, भारतभूषण अग्रवाल, रामविलास शर्मा, गिरिजाकुमार माथुर, प्रभाकर माचवे और नेमिचन्द्र जैन कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए ।
नेमिचन्द्र जैन के कवि-एकान्त में झाँकने पर वहाँ निराला, बच्चन और मुक्तिबोध की आहटें सुनायी देती हैं। जरा सुनिए इन आहटों को --
उड़ चला अकेला
तोड़ प्रीति-बन्ध विहग उड़ चला अकेला।
भूले सब स्नेह-गान
छोड़ तरु-तीर मोह
उड़ा विकल खग अजान श्वेत पंख फैला।
नेमि जी का यह छंद-बंध पढ़कर निराला जी की वह प्रसिध्द कविता याद आने लगती है --
मैं अकेला
देखता हूँ, आ रही
मेरे दिवस की सांध्य बेला।
जानता हूँ, नदी झरने,
जो मुझे थे पार करने,
कर चुका हूँ, हँस रहा यह देख,
कोई नहीं भेला।
अब नेमि जी की बच्चन प्रेरित कविता की छोटी-सी झाँकी भी कर लें --
थी छलक गयी मन की मदिरा पल में होते ही दृष्टि परस
आशा के सतरंगे सावन जब पल भर जी में पड़े बरस
जब जीवन के सूखे मरु में झर पड़े अचानक बकुल फूल
भर गया नयन को आह अचानक मन में सम्मोहन का रस
कवि नेमिचन्द्र जैन का रचा यह छन्द बरबस हरिवंशराय बच्चन की उस प्रसिध्द कविता की याद दिलाता है -- इस पार, प्रिये, मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा। बच्चन गाते हैं --
यह चाँद उदित होकर नभ में
कुछ ताप मिटाता जीवन का
लहरा-लहरा यह शाखाएँ कुछ शोक भुला देतीं मन का
कल मुरझाने वाली कलियाँ हँसकर कहती हैं, मगन रहो
बुलबुल तरु की फुनगी पर से संदेश सुनाती यौवन का
तुम देकर मदिरा के प्याले मेरा मन बहला देती हो
उस पार मुझे बहलाने का उपचार न जाने क्या होगा
इस पार, प्रिये, तुम हो, मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा।
"पाया पत्र तुम्हारा" शीर्षक से मुक्तिबोध और नेमि जी के बीच पत्र-व्यवहार की एक पुस्तक छपी है। इसी संदर्भ में उनकी एक और कविता याद आ रही है जो निश्चय ही उन्होंने कवि मुक्तिबोध के प्रति रची होगी। बहुत ही आत्मीय कविता है। उसका प्रारंभिक अंश जरा ध्यान देकर पढ़िए --
पाया पत्र तुम्हारा
आज न जाने कितने दिन के बाद
अचानक गूँज उठी है
आश्वासन की प्रतिध्वनि से प्राणों की कारा
अपने ही अंतर की प्राचीरों का बंदी
घुटते-घुटते
और पा गया
आशा की आलोक किरण का एक सहारा।
निश्चय ही नेमिचन्द्र जैन को मुक्तिबोध की कविता में आशा की आलोक किरण दिखायी पड़ रही थी और अंतर की प्राचीरों में घुटते-घुटते एक काव्य सहारे की उम्मीद भी जाग रही थी। यह कविता मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प में ही रची गयी है। नेमिचन्द्र जैन की एक और कविता का प्रारंभिक अंश देखिये जिसमें वे काव्य-विलम्बित लक्ष्य को पाने के लिए शायद मुक्तिबोध को उन्हीं के शिल्प में आवाज दे रहे हैं --
मार्गदर्शक, बोल दो --
हो रही हैं पुतलियाँ धुँधली
अनवरत देखने के यत्न से
इस गहनता को चीरकर अपना विलम्बित लक्ष्य
जो कि मानो व्यंग्य से
उपहास से
निर्भय सरकता जा रहा है
दूर
दूरतर
अनुल्लंघ्य अभेद तम में-से
अचानक काँपती आती
डरी, धीमी
किसी आवाज-सा ही
दूरतम ...
नेमिचन्द्र जैन के इस कविता समय के बीच में 1936 का साल भी है जब प्रगतिशील लेखक संघ बना था और एक आयातित राजनीतिक विचारधारा केवल हिंदी ही नहीं, भारतीय भाषाओं के लेखकों पर डोरे डालकर उन्हें पार्टी का लेखक बनाने की मंशा पाले हुए थी। तार सप्तक के कवि नेमिचन्द्र जैन का मन इस विचारधारा से मिल गया। मुखर तो नहीं पर उनका मौन समर्थन इस विचारधारा को आजीवन मिलता रहा। प्रगतिशील लेखक संघ से पहले हिंदी कवियों की दुनिया में ध्रुवीय विभाजन नहीं था। प्रत्येक कवि अपने मुहावरे की विशिष्टताओं के कारण पहचाना जाता रहा। पर इस लेखक संगठन ने दो ध्रुवीय विभाजन किया -- जो हमारी पालिटिक्स से सहमत और हमारा पार्टनर है, वही लेखक है। जो सहमत नहीं, उसे प्रतिक्रियावादी-दक्षिणपंथी करार देकर लेखकों की जमात से बाहर का मान लिया जायेगा।
इस लेखक संगठन से जुड़े आलोचकों ने कबीर को तुलसीदास से अलग किया। किसी ने निराला को पंत से अलगाया। मुक्तिबोध ने खुद को माक्र्सवादी मानते हुए जयशंकर प्रसाद को सामन्तवादी कहा। फिर माक्र्सवादी आलोचकों ने मुक्तिबोध को अज्ञेय से अलग किया। जबकि अज्ञेय तार सप्तक में किसी को किसी से नहीं अलगा रहे थे। वे तो यही कह रहे थे कि सब राहों के अन्वेषी हैं। बच्चन-प्रभावित नेमिचन्द्र जैन को भी सप्तक का एक सुर माना गया जब वे कविता के उस तिराहे पर खड़े थे जिससे छायावाद, स्वच्छंदतावाद और प्रगतिवाद की राहें निकलती थीं और उनसे उम्मीद की गयी कि वे नयी राहों के अन्वेषी बनेंगे। पर उन्होंने कुछ समय बाद कविता की राह ही छोड़ दी। उन्हें नाट्य और साहित्य-समीक्षा भा गयी। हो सकता है वे कविता की नयी राहों के अन्वेषण में अपने आपको असमर्थ पा रहे हों। वे आज के अनेक प्रगतिशाल कवियों की तरह जबरन कविता लिखते चले जाने में अपना समय क्यों गँवाते। उन्होंने सीधे जीवन-नाट्य को ही चुन लिया जिससे कविता के अनेक बहुरूप स्रोत फूटते हैं।
वे प्रगतिवाद के मौन समर्थक हो गये। इसका प्रमाण उनकी साहित्य समीक्षाओं में आसानी से मिल जाता है। वे साहित्य की उस दो ध्रुवीय साहित्यिक राजनीति में उलझे जान पड़ते हैं जो मुक्तिबोध को सामने रखकर अज्ञेय का तिरस्कार करती है। लेकिन उनमें यह बुनियादी ईमानदारी आखिर तक बनी रही कि वे माक्र्सवादी-समाजवादी विचारधाराओं के संकीर्णतामूलक पक्ष को जानते-पहचानते रहे हैं। हो सकता है वे इन लोगों को आगाह भी करते रहे हों, तभी तो वे अज्ञेय के वैचारिक निबंधों की पुस्तक "हिन्दी साहित्य ः एक आधुनिक परिदृश्य" की समीक्षा करते हुए अज्ञेय को यह उलाहना देते हैं कि -- वे इन विचारधाराओं का नकारात्मक पक्ष ही देखते हैं। तो अज्ञेय क्या करें, नकारात्मक पक्ष को दरकिनार करके प्रगतिशील लेखक संघ में भर्ती हो जायें।
नेमिचन्द्र जैन अपनी साहित्यिक ईमानदारी के कारण ही नामवर सिंह के कविता के नये प्रतिमानों पर विचार करते हुए यह तो कह ही देते हैं कि भाई साब, माक्र्सवादी रुझान के बीच आपकी रूपवादी आलोचना दृष्टि की खिड़कियाँ भी खुली हुई हैं। नेमि जी यह भी लगे हाथ जोड़ देते हैं कि नामवर सिंह, इस अंतर्विरोध को हल कर सकेंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता। वे वेबाक कहते हैं कि पक्षधर आलोचक महाशय की पक्षधरता कम से कम किसी विशिष्ट जीवन दृष्टि के स्तर पर तो नहीं है, बल्कि उसका अभाव ही कुछ आशंकाजनक लगता है ।
इस लेख का समाहार पूर्वग्रह पत्रिका के दसवें अंक में प्रकाशित कवि शमशेर बहादुर सिंह के एक साक्षात्कार से करना चाहता हूँ जिसे नेमिचन्द्र जैन और कवि आलोचक मलयज ने किया है -- शमशेर से कविता पर सवाल किये जा रहे हैं और सूक्ष्मतम काव्य-संवेदनाओं के कवि शमशेर, जिन्हें आधुनिक कवियों में कवियों का कवि ठीक ही कहा गया है, कवियों और कविताओं की गहराईयों में उतरकर कुछ कह रहे हैं। इसी बातचीत में न जाने किस मति-भंग के कारण दोनों कवि-आलोचक उनसे यह प्रश्न पूछ बैठते हैं कि कौन बड़ा कवि है। अज्ञेय, बच्चन, मुक्तिबोध और नरेन्द्र शर्मा में-से कौन बड़ा है। यह बातचीत बड़ी देर तक चलती रहती है और शमशेर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि सब अपनी अपनी जगह पर बड़े हैं, किसी न किसी में कुछ भाषा और क्राफ्ट की कमियाँ भी हैं। अज्ञेय तो फाइनेस्ट क्राफ्ट्समेन हैं। बड़े कवि तो बच्चन हैं।
प्रश्नकर्ता आलोचकगण लगे हाथ यह भी जोड़ते हैं कि शमशेर जी आप भी तो हैं और वे विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि मुझे छोड़िए, मैं तो बहुत छोटा हूँ। तब प्रश्नकत्र्ता आलोचकगण क्या कहते हैं, जरा शब्दशः सुनिए। वे कहते हैं कि -- आपका फैसला तो हम लोग कर लेंगे। बाकी इन चारों के बारे में बताइये। इन चारों में-से किस कारण से आप बच्चन को बड़ा कवि मानते हैं। अब आप कवि शमशेर का संक्षेप में जवाब सुनिए। वे कहते हैं कि -- सब अपनी-अपनी सीढ़ियों से चढ़कर गये हैं। जिस फोर्स को मैं बच्चन में देखता हूँ, वह एक व्यक्ति की अनुभूति का फोर्स है और उस अनुभूति में अपने को होम कर देने तक बच्चन गये हैं। नरेन्द्र शर्मा भी कमोवेश इन्हीं सीढ़ियों से चढ़कर गये हैं। मुक्तिबोध ने अपने व्यक्ति को और उस व्यक्ति को समाज से मिलाकर फिर उस सारे बड़े व्यक्ति में अपने आपको होम किया है। अज्ञेय के यहाँ भाषा का महत्व है। उनका सागर संगीत सुनिए, कितनी सधी हुई कविता है। शिल्पी का जादू है उसके अंदर और उसी में गहरी अनुभूति भी बसी हुई है। कवि शमशेर का यह उत्तर पाकर आप किसे बड़ा कहेंगे या उस रचनाशीलता का आदर करेंगे जो अनेक मार्गों से हम तक आती है। नेमि जी से जब भी मुझे बात करने का अवसर मिला तो पाया कि उनके मन में भी यही बात रहती थी। पर न जाने क्यों वे शमशेर जी से यह सवाल पूछ बैठे कि -- कौन बड़ा है।
नेमिजी ने ही एक बार मुझसे कहा था कि जहाँ सब एकमत हो जाते हैं, वहाँ जीवन का क्या अर्थ रह जाता है। साहित्य बहुरंगी है तभी तो जीवन और उसकी अनुभूतियों के कितने रूप हम कविताओं-कहानियों, उपन्यासों और नाटकों में देख पाते हैं।

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