ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बिना सम्मान समता का मूल्य नहीं
CATEGORY : नजरिया 01-Mar-2016 12:00 AM 604
बिना सम्मान समता का मूल्य नहीं

हमारा यह समय अन्याय चीजों के लिए जाना जायेगा। मसलन बाजार के घर के कोनों तक में घुस आने के लिए, बुद्धि के तिरस्कार के लिए पुस्तकों की अवमानना के लिये, बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों के स्थापित होने के लिए, परम्परा के अवमूल्यन के लिए आदि-आदि। इन सब पर अलग से बहुत कुछ लिखा गया है और समय रहते बहुत कुछ लिखा जाता रहेगा। पर इनके अलावा मुझे हमारा समय कृतघ्नता के लिए विशेष जान पड़ता है। मेरी समझ में भारत के इतिहास में ऐसा समय कभी नहीं आया जब हम एक-दूसरे के कर्म के प्रति इतने अधिक कृतघ्न हुए हैं। संस्कृत और हिन्दी में कृतघ्न का उल्टा कृतज्ञ होता है। यह बहुत ही सुंदर शब्द है। अगर आपस में इसे तोड़ें, आपके हाथ "कृत' और "ज्ञ' लगेंगे। "कृत' का आशय कर्म से है और "ज्ञ' का जानने से। जब आप किसी के कर्म के अर्थ को जानने लगते हैं, आप उसके प्रति कृतज्ञ होते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जब हम किसी के भी कर्म को समझने लगते हैं, हम उसके प्रति सम्मान से भर जाते हैं। इसे ही कृतज्ञता कहा जाता है। कृतघ्नता इसका ठीक उल्टा है। इसलिए इसका यह अर्थ हुआ कि जब हम किसी के कर्म को ठीक से समझ नहीं पाते, हम उसके प्रति सम्मान नहीं जुटा पाते। उसकी और उसके कर्म की अवमानना करते हैं। यह कितने आश्चर्य की बात है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था की जो जिम्मेदारी थी, वह उसने नहीं निभायी। किसी भी संस्कृति में शिक्षा व्यवस्था का यह दायित्व होता है कि वह उस संस्कृति के सदस्यों में अपने समाज में होने वाले अन्यान्य कर्मों के प्रति जिज्ञासा और समझ उत्पन्न करे। उदाहरण के लिए जब कोई छात्र संगीत की शिक्षा ग्रहण करता है, वह संगीतकार हो पाये या न हो पाये पर अगर उसे अच्छा शिक्षक मिला है और वह एक बेहतर शिक्षा व्यवस्था का अंग रहा है तो वह अपने चारों ओर व्यवह्मत होते संगीत के प्रति कृतज्ञता महसूस करेगा और इस तरह वह सहज ही उस संगीत को उत्पन्न करने वाले संगीतकारों का भी पर्याप्त सम्मान कर सकेगा। इसके उलट अगर उसे इस तरह शिक्षा दी जाती है कि वह संगीत के प्रति कृतज्ञता अनुभव न कर पाये, तो निश्चय ही वह अपने जीवन में आने वाले लगभग सभी संगीतकारों का उपहास करेगा। ऐसा ही कुछ वनस्पति शास्त्र के छात्र के साथ भी होगा। जिस छात्र ने वनस्पति शास्त्र को गहराई से समझा है, वह अपने चारों ओर फैली वनस्पतियों में प्रकृति की अद्वितीय सक्रियता को किसी हद तक समझकर उसके प्रति नतमस्तक होगा। अगर उसकी शिक्षा उसे इस योग्य नहीं बना पाती, उसका वनस्पति शास्त्र पढ़ना निष्फल हो जाता है। उपभोगतावादी संस्कृति में अपने चारों ओर से हो रहे मानवीय और गैर मानवीय कर्मों को समझने के स्थान पर उनका उपयोगभर कर लेने की प्रवृत्ति प्रबल होती है। हम कोई सुंदर उपन्यास पढ़कर उसके लेखक के प्रति कृतज्ञता का अनुभव करने के स्थान पर उस उपन्यास से कुछ वाक्यों को चुराकर अपने किसी काम में लाने का प्रयास करते रहते हैं। संभवत: यह इसलिए है कि किसी भी कर्म को समझने के लिए जिस धीरज की आवश्यकता होती है वह हमारे समय में उपलब्ध नहीं है। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो बिना किसी कारण भाग चला जा रहा है। यह भागमभाग लोगों का चुनाव नहीं है। हमें ऐसी परिस्थितियों में ढकेल दिया गया है कि हम रुककर कुछ समझने का प्रयास करने के स्थान पर भागते चले जाने में लगे रहते हैं।
कृतज्ञता एक ऐसा मानवीय मूल्य है जिसके सहारे समाज के विभिन्न सम्प्रदाय आपस में जुड़े रहते हैं। मैं एक उदाहरण देता हूँ। अगर मैं किसी बढ़ई के काम को अच्छी तरह समझकर उसके प्रति कृतज्ञ महसूस करता हूँ, वह बढ़ई इस भावना से अपने भीतर न सिर्फ ऊर्जा महसूस करेगा बल्कि उसमें अपने कर्म के प्रति आत्म सजगता बढ़ेगी और वह आगे चलकर और बेहतर कार्य करने का प्रयास करेगा। यही कुछ किसी लेखक के साथ भी होगा। अगर एक पाठक किसी उपन्यास या कविता को डूबकर पढ़ेगा और फिर उसे गहरायी से समझेगा, वह सहज ही उसके लेखक या कवि के प्रति गहरी कृतज्ञता के बोध से भर जायेगा। पाठक की यह कृतज्ञता कवि या लेखक को आगे काम करने की ऊर्जा प्रदान करेगी और इससे संस्कृति को समृद्धि प्राप्त होगी। मैं समझता हूं कि कृतज्ञता का यही बोध हर घर में होना चाहिए और इसी के सहारे घरों में समृद्धि और सुख आता है। अगर घर के बड़े बुजुर्ग घर के युवाओं के कर्मों के प्रति सम्मान से भरे होते हैं और अगर घर के युवा घर के बुजुर्गों के प्रति, घर का वातावरण ही बदल जाता है। यह तभी हो सकता है जब घर के विभिन्न सदस्य एक-दूसरे के कर्मों को छोटा करने के स्थान पर उन्हें समझने की और फिर समझ के आधार पर एक-दूसरे के प्रति कृतज्ञ होने की कोशिश करें।
आज तक कोई भी मानवीय समुदाय सिर्फ शक्ति के आधार पर जुड़ा नहीं रह सका है। अगर वह जुड़ा रहा है तो इसके पीछे उस मानव समुदाय के विभिन्न सदस्यों के एक-दूसरे को समझने के प्रयत्नों की प्रमुख भूमिका रही है। हम एक-दूसरे को समझकर ही, एक-दूसरे के कृत्यों को समझकर ही उनके प्रति कृतज्ञ हो सकते हैं और तभी हमारे मन में एक-दूसरे के प्रति वह सम्मान उत्पन्न हो सकता है जिसके आधार पर हम एक-दूसरे से जुड़े रह सकते हैं।
मैं यह मानता हूं कि 19वीं शताब्दी के बाद से भारत में विभिन्न सम्प्रदायों का (जिन्हें जातियों के नाम से भी जाना जाता है) एक-दूसरे के प्रति असहिष्णु होने का मुख्य कारण एक-दूसरे के कर्म के प्रति कृतज्ञ न हो पाना है। यही कारण है कि विभिन्न सम्प्रदाय अपनी आंतरिक शिक्षा व्यवस्थाओं के खंडित हो जाने के कारण एक-दूसरे के कर्म की विशिष्टता को समझने के योग्य नहीं बचे। या कम से कम उनमें यह योग्यता धीरे-धीरे कम होती चली गयी। इसका परिणाम यह हुआ कि भारत में रहने वाले हजारों सम्प्रदाय एक-दूसरे के कृतज्ञता के बंधन में बंधे नहीं रहे। हमारे पाठक शायद यह जानते हों कि हाल के कुछ अध्ययनों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आज भी भारत में चार हजार से कुछ कम सम्प्रदाय रह रहे हैं। हमारा यह देश इतनी बड़ी संख्या में सम्प्रदायों में शताब्दियों से रहता चला आ रहा है और अगर वे सारे सम्प्रदाय एक-दूसरे के साथ कई बार घोर असहमति के बाद भी साथ-साथ रहते चले आ रहे हैं, तो इसका कारण इनका एक-दूसरे के प्रति गहरा कृतज्ञता बोध है। औपनिवेशिक शिक्षा-दीक्षा और स्वतंत्र भारत में विचारहीन शिक्षा व्यवस्था के चलते इस देश के अधिकतर नागरिक इस स्थिति में ही नहीं बचे कि वे अपने ही देश की विभिन्न कारीगरियों, विभिन्न कौशलों को किसी हद तक समझ सकते। हमारे अधिसंख्य नागरिकों के लिए स्वयं हमारे देश की कारीगरियां और कौशल धीरे-धीरे समझ की वस्तु नहीं रहीं। वे हमारी समझ के दायरे से बाहर निकल गयी हैं। इसीलिए आज हममें से अधिकांश स्वयं हमारे देश में शताब्दियों से होने वाली तमाम कारीगरी को न समझ पाते हैं और न उसके प्रति कृतज्ञ हो पाते हैं और इसीलिए हम उन्हें करने वाली तमाम कारीगरों के प्रति भी सहज सम्मान का अनुभव नहीं कर पाते। हम अपने देश में लोकतंत्र अवश्य ले आए हैं और इस कारण कम से कम औपचारिक रूप से सभी नागरिक समतापूर्वक जीवन बिताने का अधिकार प्राप्त कर चुके हैं। यह याद रहे कि यह सिर्फ औपचारिक रूप से ही हुआ है, व्यवहारिक रूप से होने में इसमें कई और दशक लगेंगे। पर इस औपचारिक समता के बाद भी देश में विभिन्न सम्प्रदायों (जातियों आदि) में परस्पर कृतज्ञता-बोध खत्म होता गया है। बिना कृतज्ञता-बोध के हासिल की गयी समता, निष्प्राण समता होती है। यही हमारे आधुनिक समाज का सच बन गया है।
कृतघ्नों की भीड़ कितना ही समता-समता चिल्लाती रहे, कितना ही लोकतंत्र-लोकतंत्र चीखती रहे, इससे न सच्चा लोकतंत्र स्थापित हो सकता है और न सच्ची समता। इन दोनों के लिए भी समाज के विभिन्न सदस्यों को एक-दूसरे के कृत्यों को गहराई से समझकर उनके प्रति कृतज्ञता का अनुभव करना आवश्यक है।

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