ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भया कबीर उदास
01-Jun-2016 12:00 AM 2190     

कबीर भारत की वो आत्मा है जिसने रूढ़ियों और कर्मकाडों से मुक्ति की कल्पना की। कबीर वो पहचान है जिन्होंने जाति-वर्ग की दीवार गिराने का जोखिम उठाया। अपनी सरलता, साधु स्वभाव तथा संत प्रवृत्ति के कारण आज विदे¶ाों में भी उनका समादर हो रहा है।
आज़ का समाज भौतिकवाद की चादर ओढ़ कर सो रहा है ऐसे में कबीर की ¶िाक्षा उसके अस्वित्व को झकझोरने के लिए काफी है। उनके दोहे और साखियों का ज्ञान आज़ के जीवन में भी उतना ही खरा उतरता है जितना उनके युग में था। अपनी परम्परा और संस्कृति से मुँह मोड़ने के कारण विदे¶ाों में रहने वाले भारतीय प¶िचमी सभ्यता की भौतिकवादी दौड़ में अनायास ही ¶ाामिल हो जाते हैं।
भारत में दैनंदिन आव¶यकताओं की पूर्ति तक के लिये जहाँ संघर्ष करना पड़ता है, वहीं अमेरिका जैसे भौतिकता से सम्पन्न दे¶ा में आकर भारतीय लगभग चकाचौंध की द¶ाा को प्राप्त हो जाता है। अमेरिका में व्यक्ति स्वतंत्रता है, बहुतेरे साधन हैं अतः मेहनत करनेवालों को सफलता आसानी से मिल जाती है। अभाव दूर करते-करते हर व्यक्ति एक अंधी दौड़ में ¶ाामिल हो जाता है। दुनियाभर की सुख-सुविधाएँ जुटाते-जुटाते वह कब अपने परिवार और संबंधियों से दूर चला जाता है कि उसे पता भी नहीं चलता।  मन में अ¶ाांति और अकेलापन उसे घेर लेता है। ऐसे में वह ध्यान, साधना, योग की ¶ारण में जाता है और वहां भी उसे ¶ाांति नहीं मिलती।
अमेरिका की भागदौड़ भरी जिंदगी में इतनी तेजी से समय गुजरता है कि जैसे जीवन के असली मायनों का अंदाज ही नहीं हो पाता। तब कबीर याद आते हैं कि "रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय। हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय।'
अमेरिका में सुख साधनों की कमी नहीं है एक वक्त की रोटी से लेकर अपना विमान खरीदने तक का सपना पूरा करना मु¶िकल तो है पर असम्भव नहीं है ऐसी सम्पन्नता हासिल करके समाज में अभिमान से सर उठाकर चलने वाले के लिये कबीर कह गये - रावन सरीखा चलि गया , लंका का सिकदार। जब लंका का राजा रावण भी अभिमान करके नष्ट हो गया तो एक साधारण मनुष्य के जीवन का अस्तित्व कितनी देर का है।

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