ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भाषा की ज़रूरत है क्या?
01-Sep-2017 03:30 PM 2073     

जिस तरह से अधिकतम मुनाफा कमाने और अपनी, बढ़ी या बाज़ार द्वारा बढ़ाई जा रही, इच्छाओं के कारण आदमी ऐसे भाग रहा है जैसे कि उसके पीछे शिकारी कुत्ते पड़े हुए हैं। गरीब से लेकर समृद्धतम देश के निवासियों को भी सारा दिन जीवनयापन मात्र के लिए खपा देना पड़ता है। उसे पत्नी, बच्चों, माता-पिता और मित्रों ही नहीं, अपने आप तक के लिए समय नहीं है कि अपनी बढ़ती उम्र, घटती शक्ति और सिकुड़ती मानसिक दुनिया में कहीं अपने निजी और सुकून के पल खोज सके। और यही कारण है कि व्यक्ति की जिजीविषा ख़त्म होती जा रही है और कोई एक वीडियो गेम और सामान्य सी घटना व्यक्ति को आत्महत्या जैसे अतिवादी कदम तक ले जाते हैं।
जीवन का मूल्य बहुत कम हो गया है। ये घटे हुए मूल्य किसी विचार, आदर्श, करुणा और परोपकार से नहीं जुड़ते। विचारों के बल को भुला दिया गया है और उसे व्यर्थ का प्रलाप सिद्ध किया जा रहा है।
जब मनुष्य, उसके सरोकार और संवाद इतने क्षीण और सीमित हो गए हैं तो फिर भाषा का स्वरूप और उसकी भंगिमाएँ तथा व्यंजनाओं का बदलना भी तय है। आज सभी देशों और समाजों में भाषा का स्वरूप और उसका स्थान बहुत सीमित होता जा रहा है। पहले जहाँ बाज़ार में भी एक संवाद की संभावना बन जाया करती थी वहाँ तथाकथित विकसित देशों में दुकानों का यह हाल है कि आपके जाने से दरवाजा अपने आप खुल जाएगा, सामान लीजिए, काउंटर पर सामान रखिए, मशीन से बिल बन जाएगा, कार्ड से भुगतान कीजिए, कार्ट में सामान डालिए और बाहर खड़ी अपनी कार में रखिए और घर आ जाइए। किसी आदमी के दर्शन और उससे थोड़े हाय-हैलो की संभावना तक भी ख़त्म।
आप सोचते हों कि मज़ा है, मुफ्त में सामान उठा लाओ। नहीं, यदि आपने भुगतान किए बिना बाहर निकलने की कोशिश को सायरन बज जाएगा।
हो सकता है कोई ऐसा समय भी शीघ्र ही आ जाए जब उन दुकानों में सामान के रेट अधिक देने पड़ें जिसमें कोई मनुष्य आपसे दो बातें भी कर ले या हाय-हैलो कर ले क्योंकि उस स्थिति में मालिक काउंटर वाले आदमी को पेमेंट कर रहा है। आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कई देशों में ऐसे लोग घंटे के हिसाब से रखे जा रहे हैं जो आपको श्मशान में या घर पर शोक संतप्तता की स्थिति में कुछ पलों के लिए सिर रखकर रोने के लिए अपना कन्धा उपलब्ध करवा दें।
सोचिए, हम भाषा का कितना उपयोग करते हैं? हमें भाषा की कितनी आवश्यकता है? क्या भाषा का उपयोग करने के लिए अर्थव्यवस्था द्वारा हमारे पास समय छोड़ा भी गया है? आज आप बच्चे या बड़े से किसी भी वस्तु, घटना या विषय के बारे में कुछ भी पूछिए उसके पास दो-चार विस्मयादि बोधक शब्दों के अतिरिक्त कुछ नहीं है। वाव, एक्सीलेंट, वंडरफुल, फैंटास्टिक आदि। क्या, क्यों अच्छा लगा? इसकी कोई व्यंजना नहीं।
क्या हम कभी सोचते हैं कि जिन बच्चों को बोर्ड की परीक्षाओं में भाषा में सौ में से सौ नंबर मिलते हैं वे भी भाषा और अभिव्यक्ति के मामले में कितने दरिद्र हैं? भाषा में भी आजकल सही-गलत, मल्टिपल च्वाइस जैसे प्रश्न आते हैं। जिनसे न तो परीक्षार्थी की अभिव्यक्ति का विकास होता है और न ही उसकी वैचारिकता को दिशा मिलती है। जहाँ कहीं निबंध जैसा कोई प्रश्न आता है वहाँ भी अध्यापक महोदय उसे किसी कुंजी में किसी की लिखी-लिखाई सामग्री उपलब्ध करवा देते हैं।
विचार हो तो भाषा की आवश्यकता पड़े। आज तो जीविकोपार्जन के लिए रटाई वाली शिक्षा का एक छोटा-सा पक्ष है। डिग्री ली, नौकरी पकड़ी और कोल्हू के बैल का सफ़र शुरू। यही स्थिति सब जगह होती जा रही है।
शिकारी और जंगल के हिंस्र पशु जानते हैं कि किसी का शिकार करने के लिए उसे उसके झुण्ड से अलग करना बहुत ज़रूरी होता है। जब व्यक्ति को विचार शून्य, असामाजिक और अकेला बनाना हो तो सबसे पहले उसकी भाषा छीनी जाती है। इसीलिए अमरीका में लाए गए गुलामों को सबसे पहले अलग-अलग रखा जाता था और उनसे उनका नाम छीना जाता था, उसे अपने मालिक का दिया नाम जीना पड़ता था, उसीकी भाषा बोलनी पड़ती थी। अपने देश परिवार और साथियों से अलग किए जा चुके व्यक्ति की मनःस्थिति और पीड़ा की कल्पना कीजिए। उनके बारे में उनके मालिकों का कहना हुआ करता था- हमें किसी बंदूक से अधिक डर इन गुलामों के अपनी भाषा में गाए जाने वाले गीतों से लगता है।
प्रवासी भारतीयों में अपनी भाषा और पहचान के लिए सच्चा संघर्ष गिरमिटिया मजदूरों ने किया। उनके लिए अपनी भाषा शक्ति का एक अजस्र स्रोत और सुरक्षा के लिए सबसे सुरक्षित शरणस्थली थी। उच्च अध्ययन, पर्यटन और धर्म प्रचार आदि के लिए विदेश जाने वाले लोगों का कोई संघर्ष नहीं है। संघर्ष है तो मॉरीशस, गुयाना, सूरीनाम, फीजी में गए मजदूरों का है और सच्चे अर्थों में हिंदी के लिए बलिदान उन्होंने ही दिए हैं। यह उनकी ज़रूरत थी। आज विदेश में जाने वालों के लिए भाषा का कोई संकट नहीं है। उन्होंने अंग्रेजी या अन्य भाषा अपने निजी लाभ के लिए सीखी है। विदेश जाकर अपने जीवन की एक साध और एक उपलब्धि हासिल की है। यदि कोई लाभ हो तो यह वर्ग आज भी कोई भी भाषा सीखने के लिए जी-जान लगाने के लिए तैयार है।
आज भारत में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों का खुलना और उनके लिए पेट काटकर बच्चों को भेजना अभिभावक का कोई अंग्रेजी प्रेम नहीं बल्कि रोटी-रोजी का सवाल है। आजकल बड़े-बड़े शहरों में चीनी भाषा भी सिखाई जा रही है। कई खर्चीले विद्यालयों में रोजगार की संभावनाओं के रूप में अन्य योरोपीय भाषाएँ भी पढ़ाई जा रही हैं। भारत में कई तथाकथित बड़े हिंदीभाषी घरों में अंग्रेजी बोली जाती है और उनके बच्चे विद्यालय में भी हिंदी के स्थान पर कोई अन्य विदेशी भाषा ही पढ़ रहे हैं।  ऐसे में संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं को सीखने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। यदि कोई फिर भी भाषा (मातृभाषा, हिंदी, संस्कृत आदि) की बात करता है तो उसके अन्यार्थ ही अधिक हैं।
विदेशों में गई भारतीयों की तीसरी पीढ़ी अपनी भाषा, संस्कृति और व्यंजना भूल चुकी है। सबसे ज्यादा चिंता बुढ़ापे में आकर उन भारतीयों को होती है जो अपने पोते-पोतियों से ढंग से संवाद नहीं कर पाते। जो लोग अपने बड़े परिवारों के साथ विदेशों में रहते हैं और आपस में जुड़े हैं, संवाद-संपर्क बनाए हुए हैं उनकी भाषा और संस्कृति बची हुई है।
सामान्यतः जिस प्रकार यहाँ रहते हुए कोई विदेशी भाषा (अंग्रेजी) बच्चों को सिखाना कठिन होता है वैसे ही  बाहर रहते हुए बच्चों को भारतीय भाषाएँ सीखने के लिए वातावरण दे पाना संभव नहीं होता इसलिए वहाँ भारतीय भाषा, जिसके नाम पर हम हिंदी का ही नाम लेते हैं, सिखाना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए विदेशों में हिंदी की वही स्थिति रहती है जो यहाँ गाँवों के तथाकथित अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में अंग्रेजी की होती है। जब पढ़ने सुनने में आता है कि दुनिया के इतने विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है तो हम गौरवान्वित हो जाते हैं लेकिन अपने बच्चों पर संस्कृत-हिंदी या अन्य भारतीय भाषा और उसके साहित्य का बोझ डालकर उनके कैरियर की संभावनाओं को धूमिल नहीं करना चाहते।
भारत एक बढ़ता बाज़ार है इसलिए जिस प्रकार नेता कहीं वोट के लिए, कोई ट्यूरिस्ट गाइड ट्यूरिस्टों से कमाने के लिए, कोई सेल्स मैन अपना माल बेचने के लिए किसी भाषा को हथियार के तौर पर अपनाता है वैसे ही सभी देशों और समाजों में सामाजिकता, भाषा, पहनावा आदि हथियार हो गए हैं। आजकल भाषा सीखना-सिखाना वैसा नहीं रहा जैसे बहुत से योरोपियन विद्वानों ने भारत आकर संस्कृत और हिंदी सीखी और उसमें मौलिक काम किया। कुछ क्षेत्रों में तो यहाँ तक कहा जा सकता है कि उन्होंने यहाँ के तथाकथित हिंदी और संस्कृत प्रेमियों से अधिक काम किया।
विदेशों में हिंदी पढ़ने वालों की हिंदी का भारतीयता से कोई संबंध नहीं और न ही उनके पाठ्यक्रम में भारतीयता से जुड़ने की बाध्यता है। वहाँ भी हिंदी से कोई व्यावसायिक लाभ कमाने वाली बात ही है। वहाँ के विद्यार्थी हिंदी के कुछ वाक्य बोल लेते हैं लेकिन उसका कोई सांस्कृतिक या वैचारिक महत्त्व नहीं है। उससे किसी प्रकार की भारतीयता की रक्षा का भी संबंध नहीं है। उनको भी अपने पेट की पड़ी है।
श्रेष्ठ मानवीय गुणों का लोप पहले भाषा में हुआ या जीवन में, कहा नहीं जा सकता लेकिन यह तय है साहित्य में गुँथे हुए मूल्यों से हमारा जीवन बहुत भिन्न हो गया है। इसलिए संवाद की भंगिमाएँ, व्यंजनाएँ बदल गई हैं।  भाषा से लोकोक्ति और मुहावरे गायब हो गए हैं क्योंकि जिस जीवन से ये बनते हैं वह जीवन ही बाज़ार द्वारा अब अप्रासंगिक बना दिया गया है।
भगवत रावत के शब्दों में कहूँ तो :
आजकल हर कोई, कहीं न कहीं जाने लगा है
हर एक को पकड़ना है चुपके से कोई ट्रेन
किसी को न हो कानों कान ख़बर
इस तरह पहुँचना है वहीं उड़कर
अकेले ही अकेले होना है अख़बार की ख़बर में
कि सूची में पहुँचना है, नीचे से सबसे ऊपर
किसी मैदान में घुड़दौड़ का होना है
पहला और आख़िरी सवार
इतनी अजीब घड़ी है
हर एक को कहीं न कहीं जाने की हड़बड़ी है
कोई कहीं से आ नहीं रहा
रोते हुए बच्चे तक के लिए रुक कर
कहीं कोई कुछ गा नहीं रहा
विचार हों, संवेदना हो, संवाद हो तो भाषा की ज़रूरत महसूस होती है। और जब ज़रूरत हो तो भाषा अपने आप रच जाती है। जीवन में भाषा की ज़रूरत पैदा करें। अन्यथा धंधा ही करना है तो उसकी तो एक यूनिवर्सल भाषा पहले से बनी हुई है।
बात 1978-79 की है। जयपुर में था। उन दिनों विदेशी पर्यटकों में गाँजे की चिलम बहुत लोकप्रिय थी। जयपुर के मिर्ज़ा इस्माइल रोड़ पर हिंदी दैनिक "राष्ट्रदूत" का कार्यालय है जिसमें मैं एक साप्ताहिक कॉलम लिखा करता था। इसके सिलसिले में सप्ताह में एक दिन वहाँ जाता था। वहाँ मुख्य सड़क पर बरगद का एक पेड़ हुआ करता था। मैं उसके चबूतरे पर बैठे, मैले से कपड़े पहने एक व्यक्ति को अक्सर देखा करता था। एक दिन देखा- उसने अपनी जेब से चिलम निकालकर किसी विदेशी पर्यटक को दिखाई और दूसरे हाथ की दो अंगुलियाँ खड़ी कर दीं। हो गया संवाद, पट गया सौदा।

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