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भाषा का विश्वरूप और हमारा सॉफ्टवेयर
01-Oct-2017 12:26 PM 2226     

भारत में एक दार्शनिक पद्धति यह भी है कि पूरा विश्व शब्द रूप है। हमारे ज्ञानियों और भक्तिकाल के कवियों ने सदियों तक शब्द साधना की है तथा शब्द को पूरी सृष्टि के केन्द्र में जगह दी है। वे अपने अंतज्र्ञान से यह समझ सके कि अगर शब्द नहीं तो यह विश्व भी नहीं।
आमतौर पर हम यह अनुभव करते हैं कि विश्व में एक भी ऐसी वस्तु नहीं, व्यक्ति नहीं और प्राणी नहीं जो किसी नाम से न जाना जाता हो। अगर हम इन जीवन के विविध प्रकारों के ऊपर से नाम हटा दें तो यह विश्व कैसे पहचाना जायेगा। भारत के मनीषियों ने यह अच्छी तरह समझ लिया कि यह पूरा विश्व नाम रूप मय है। इसमें रूप पैदा होते हैं और उन्हें जानने के लिये हमें उनका नाम रखना पड़ता है। उदाहरण के लिये हिंदी भाषा को ही ले लीजिये। अगर हम हिंदी भाषा को हिंदी न कहें तो क्या वह हिंदी भाषा रह जायेगी। क्योंकि एक कोई भाषा है जिसका नाम हिंदी है। ऐसे ही एक कोई भाषा है जिसका नाम तमिल है, एक कोई भाषा है, जिसका नाम कश्मीरी है, एक कोई भाषा है जिसका नाम जर्मन है, अंग्रेजी है, फ्रेंच आदि-आदि।
हम शताब्दियों से अनुभव करते आये हैं कि संसार की अनेक भाषाओं और बोलियों के शब्द आपस में एक दूसरी भाषाओं में घुलते-मिलते रहे हैं। अंग्रेजी के कई शब्द जैसे रेलगाड़ी, प्लेटफार्म, बस स्टैंड आदि हिंदी में आ गये हैं और हिंदी के हो गये हैं। अंग्रेजी में लोफर शब्द का जो अर्थ होता है, हिंदी में भी वही होता है। इस तरह की खोज चाहें तो भाषा का व्यवसाय करने वाले लोग करते रह सकते हैं। हम स्वयं हिंदी के बारे में विचार करते हैं तो संस्कृत भाषा तो उसकी माँ है ही, उसे पाँव पर खड़ा करने के लिये अवधी, बृज, भोजपुरी, मैथिली, बुंदेली, राजस्थानी आदि अनेक बोलियों ने बहुत प्यार से दुलारा है। इसी कारण हिंदी अपने पाँव पर खड़ी हो सकी और उसका एक नाम खड़ी बोली ही पड़ गया, क्योंकि वो सचमुच खड़ी हो गई। भाषाएँ कभी भी घुटने के बल नहीं रेंगती रहतीं और न वे लम्बे समय तक हँकलाती हैं। उनके जीवन में एक दिन ऐसा आता ही है कि वे अपने पाँव पर खड़ी हो जाती हैं।
हमारी हिंदी केवल भारत में ही अपने पैरों पर खड़ी नहीं हुई है। वह चलकर अनेक देशों की वाणी के रूप में भी पहचानी जा रही है। वहाँ अनेक हिंदी भाषी हैं जो हिंदी के बिना अपना काम नहीं चला पाते, भले ही वे उस देश की भाषा भी सीख गये हों।
वैसे तो बीसवीं शताब्दी में भी भाषायी सॉफ्टवेयर की शुरूआत हो चुकी थी और जाहिर है कि एक वैश्विक जुवान के रूप में उसने अपनी जड़ें सबसे पहले अंग्रेजी में ही जमायी। अंग्रेजी के साथ रोमन लिपि का भी विकास हुआ जो यह आश्वासन देती है कि आप अंग्रेजी के अक्षरों का इस्तेमाल करते हुए संसार की सारी भाषाओं में लिख सकते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा खतरा यह पैदा हुआ कि पूरे संसार की लिपि अंग्रेजी बन जायेगी और सारी भाषाएँ अपनी लिपियों को भूल जायेंगी। भारत में भी यही समस्या आज भी बनी हुई है।
जब हम यूनिकोड शब्द का इस्तेमाल करते हैं तो सहज ही उसे बोलते हुए यूनिफॉर्म की याद आती है। यूनिफॉर्म का मतलब ही यह होता है कि कोई व्यक्ति अपनी कितनी ही विशिष्टता रखता हो पर वह यूनिफॉर्म पहने तो सबके साथ एक जैसा दिखेगा। उदाहरण के लिये पुलिसवालों की भाषायें अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन वे यूनिफॉर्म में पुलिस वाले ही कहलायेंगे।
हिंदी में यूनिकोड का खतरा भी यही है कि भारत की दूसरी भाषाएँ जो प्रमुखतः पंद्रह-सोलह से अधिक हैं और उनमें कुछ तो हिंदी से भी पुरानी हैं, हिंदी समेत उन सबको यूनिकोड के नाम पर अंग्रेजी का यूनिफॉर्म पहनाया जा रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि आप अंग्रेजी की यूनीफॉर्म पहन के भारतीय बने रह सकते हैं। भाषा आपकी है पर उसे कमांड अंग्रेजी में देना होगा। ढाई सौ साल पहले भारत में यही हुआ था। भारत भारतीयों का था लेकिन उन्हें अंग्रेजी कमांडेंट सम्भालते थे और यह सिर्फ भारत में ही नहीं, इंग्लैंड ने दुनिया में अनेक उपनिवेश बनाये, उन सभी का यही हाल हुआ।
क्या कारण है कि आज संसार में भाषायी अध्ययन करने वाली संस्थाएँ ये रिपोर्ट दे चुकी हैं कि हजारों बोलियाँ विश्व में मर चुकी हैं, जो कभी भाषा के निर्माण में सहायक रहीं हैं। कभी-कभी तो ऐसी खबर भी आती है कि किसी बोली का आखिरी बोलने वाला भी अभी कल ही मरा है। हर समझदार व्यक्ति यह जान सकता है कि यूनिफॉर्मेटी विश्व को विश्व नहीं रहने देगी। विश्व हमेशा अपने बहुरंगी भाषा समाजों के जीने-मरने से चलता है। लोग भले ही मरते रहते हों, पर उनकी भाषाओं को बोलते रहने वाले समाजों को बचे रहना जरूरी है। आज हम अनुभव करते रहे हैं कि समाज खतरे में है तो भाषा भी खतरे में है।
यूँ देखा जाये तो यूनिकोड पाकर हिंदी में सोशल मीडिया बड़ा सक्रिय है। लोग आपस में बात कर रहे हैं और दुर्भाग्य से अफवाहें भी फैला रहे हैं। लेकिन उनसे पूछा जाना चाहिये कि आपके मीडिया का नाम तो सोशल है पर आपका समाज कहाँ है?
पूरे सोशल मीडिया के कारनामे देखकर यह अनुभव होता है कि इसे बरतने वाला हर व्यक्ति अकेला है। उसके पास उसका समाज नहीं है। आश्चर्य होता है कि समाज विहीन मीडिया का नाम पता नहीं किन मूर्खों ने सोशल मीडिया रख दिया है।
दूसरी बात, दुनिया के दूसरे देशों में हिंदी पढ़ाने को लेकर पाठ्यक्रमों की उलझन की चर्चा की जाती है। हर देश में अलग-अलग तरह के लोग अपनी-अपनी हिंदी पढ़ाते रहते हैं, लेकिन हमें यह विचार करना चाहिये कि हिंदी एक पूर्ण व्याकरण सम्मत भाषा है। तो उसकी प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई व्याकरण सम्मत और अभिव्यक्ति सम्मत होनी चाहिये। फिर हिंदी सीख लेने के बाद कोई चाहे तो तुलसीदास की कविता पढ़े और कोई चाहे तो देवानंद की फिल्मों का गाना गाये। इससे हिंदी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन अगर हिंदी को हिंदी की तरह नहीं सिखाया गया तो उस सीखने वाले पर न तो तुलसीदास की कविता असर करेगी और न देवानंद की फिल्मों का गाना। वो एक ऐसा हिंदी पाठक होगा जिसे हम फिल्मी गाने के सहारे यह कहेंगे कि - बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, ऐसे मनमौजी को मुश्किल है समझाना।

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