ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारत की राज भाषा का संदर्भ
01-Sep-2017 10:43 AM 3635     

स्वतंत्रता के बाद प्रश्न उठा कि हमारे देश की एक राजभाषा क्या हो? स्वाभाविक है कि बहुभाषी देश के लिये किसी एक ऐसी भाषा का चयन करना था जो सर्वसम्मति से स्वीकार हो, ग्राह्य हो और राजकाज करना संभव हो। गहन विचार-विमर्श के पश्चात हिन्दी को चुना गया, क्योंकि यह भारत में बहुमत में बोली जाती है तथा इसमें आर्थिक, धार्मिक तथा राजनैतिक संचार माध्यम बनने की क्षमता है। 14 सितम्बर 1949 को संविधान की धारा 343(1) भारतीय के अन्तर्गत हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाने की उद्घोषणा हुई। 1950 में भारत के संविधान ने देवनागरी लिपि में हिन्दी को भारत की अधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करने की घोषणा की।
 लेेकिन हिन्दी को राजभाषा बनाने की राह इस बहुभाषी, बहुक्षेत्रीय देश में सरल न थी। लगभग 50 वर्ष पूर्व तमिलनाडु में इस निर्णय का इतना भीषण विरोध हुआ था कि देश हिल गया। इस विरोध प्रदर्शन ने हिंसात्मक रूप ले लिया। अनेक जानें गईं। यह लहर तमिलनाडु ही नहीं अन्य अहिंदी भाषी प्रदेशों में भी फैली। हिंदी के विरोध ने तमिल आदि प्रदेशों में अंग्रेजी को बढ़ावा दिया और अंत में इस विरोध को रोकने के लिये त्रिभाषा फार्मूला निकाला गया तथा अंग्रेजी कोे सहायक भाषा बनाया गया। अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड जैसे कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में आज भी अंग्रेजी आधिकारिक भाषा है। किन प्रयोजनों के लिये केवल हिंदी को प्रयोग किया जाना है किन के लिये हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं को प्रयोग किया जाना आवश्यक है यह राजभाषा अधिनियम 1968 एवं राजभाषा नियम 1976 और उनके अंतर्गत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किये गयेे निदेशों द्वारा निर्धारित किया गया।
परन्तु किसी भाषा को राजभाषा बनाने और देश की जनता द्वारा उसे सहज रूप से स्वीकारा जाना दो भिन्न स्थितियां हैं। आज का सच तो यह है कि अंग्रेजी भाषा हिन्दी विरोधियों को स्वीकार है पर भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिन्दी के प्रति विरोध की भावना है। भारत में लगभग 461 भाषाएं बोली जाती हैं, जिसमें से 22 को आधिकारिक भाषा माना गया है और हिन्दी भाषी सर्वाधिक हैं, यह आधार था हिन्दी को राज भाषा बनाने का। परन्तु अन्य अहिन्दी भाषी प्रदेशों को यह तर्क स्वीकार नही है।
अनेक अहिन्दी भाषी प्रदेशों में विशेषकर तमिलनाडु में वर्षों पूर्व उठी विरोध की लहर को थमने में समय लगा, लोगों की हिन्दी के प्रति घृणा की भावना कम होने लगी। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री देवेगौड़ा, तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि तथा जयललिता ने हिन्दी को बढ़ावा देने का प्रयास किया।
परन्तु संभवतः राजनीतिज्ञों को यह रास न आया और आज अपने निज स्वार्थों के चलते उन्होंने जनता की भावना को पुनः भड़का दिया परिणामतः तमिलनाडु कर्नाटक आदि में पुनः हिन्दी के प्रति विरोध की लहर तीव्रता से उठ रही है। अभी कुछ दिनों पूर्व बेंगलुरु में महात्मा गांधी मेट्रो स्टेशन पर हिन्दी में लिखे नामों को मिटा दिया गया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि वो हिन्दी के विरोध में नही हैं पर उसे उन पर लागू करने के विरोध में हैं, हिन्दी वैकल्पिक अधिकारिक 3 भाषाओं में से एक है। स्टालिन ने हिन्दी लागू करने का विरोध करने की धमकी दी है। बंगाल में भी अभी सीबीएसई में हिन्दी आवश्यक विषय कर दिया गया तब विरोध में स्वर उठने लगेे। हिन्दी लागू करने पर जेएनयू विश्वविद्यालय में हिन्दी में शोध प्रबन्ध देने के निर्देशों का छात्रों ने विरोध किया। असम में अंग्रेजी आवश्यक है पर हिन्दी वैकल्पिक विषय है। केरल, पंजाब, गुजरात आदि में हिन्दी को लेकर कोई विरोध नही है, वहां हिन्दी और अंग्रेजी दोनों विषय स्कूलों में आवश्यक हैं। अन्य उत्तर की ओर अधिकांश हिन्दी भाषी प्रदेश ही हैं।
बात मात्र अहिन्दी क्षेत्रों तक सीमित होती तब भी गनीमत थी पर अब तो हिन्दी भाषा के अन्तर्गत आने वाली क्षेत्रीय भाषाएं भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी आदि भी सिर उठाने लगी हैं। वह भी हिन्दी से अलग स्वयं के अलग अस्तित्व की मांग करने लगी हैं जो निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। इन स्थितियों के लिये सर्वाधिक उत्तरदायी राजनीतिज्ञ हैं, जिन्हें जनता की क्षेत्रीयता से लगाव की भावनाओं को भड़का कर अपनी रोटी सेंकनी होती है। जो निश्चय ही मात्र हिन्दी के लिये नहीं वरन देश की शान्ति एकता और विकास के लिये भी अशुभ है।
परन्तु मात्र राजनीतिज्ञों को दोषरोपण देकर भाषाविद् अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकते। चूक भाषाविदों से भी हुई है, क्योंकि भाषा व्यक्ति के संस्कार संस्कृति और यहां तक कि उसके व्यक्तित्व का हिस्सा होती है। अतः अपनी भाषा से प्यार होना, उसमें संप्रेषण करना न केवल सुविधाजनक है वरन उसका मूलभूत अधिकार भी है। आवश्यकता है हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं के समन्वय की, एक-दूसरे के साहित्य के अनुवाद की, एक-दूसरे के शब्दों को अपनाने की।
यदि गंभीरता से सोचा जाए तो भारतीय भाषाओं को उद्भव लगभग समान प्राचीन भाषाओं से हुआ है। उनकी संस्कृति समान रही है। अतः उन्हें एक-दूसरे की भाषा को अपनाना और समझना अधिक सरल होना चाहिये और विरोध कम। परन्तु कुछ लोगों के निहित निज हितों के कारण ही स्थिति यह है कि अपनी ही सहोदरी भाषाओं से विरोध है और विदेशी भाषा सहजता से स्वीकार्य है। आज भी अंग्रेजी की बैसाखी के बिना संघ का कार्य संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त संविधान में प्रावधान कर देने अथवा उसके संकल्पों को कागजों पर दोहरा देने से कोई भाषा अपना अस्तित्व नहीं प्राप्त कर पाती, उसके लिये सर्वाधिक आवश्यक है उस भाषा की लोकप्रियता और जन मानस में उसके प्रति सम्मान।
हिन्दी विश्व की पांच सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषाओं में से एक है। हमारे देश में 44 प्रतिशत लोग हिन्दी भाषी हैं तथा 77 प्रतिशत लोग हिन्दी समझ सकते हैं और भारत के मात्र पांच प्रतिशत लोग अंग्रेजी बोल और समझ पाते हैं, परन्तु फिर भी हिन्दी को कम पढ़े लिखे लोगों की भाषा माना जाता है। अंग्रेजी आज भी आकांक्षा की भाषा है तथा हिन्दी उन लोगों के लिये है जिनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं है। अभी भी अनेक प्रतिष्ठित परीक्षाओं में अंग्रेजी का बोलबाला है जो औपनिवेशिक मानसिकता की परिचायक है। अंग्रेजी शक्ति की भाषा है तथा हिन्दी की नियति कमोबेश अन्य भारतीय भाषाओं जैसी ही है।
अंग्रेजी को एक विदेशी और अतिरिक्त भाषा के रूप में सीखना तो समझ में आता है पर हिन्दी को हेय दृष्टि से देखना उसे बोलने और पढ़ने में हीनता का अनुभव करना तथा अंग्रेजी को ही अपने भविष्य की उन्नति का सोपान मानना निश्चय ही हिन्दी के लिये घातक है। इसका उत्तर दायित्व किसी एक का नहीं है। सच तो यह है कि हिंदी के विकास के लिये नारेबाजी अधिक और निष्ठापूर्ण प्रयास कम हो रहे हैं।
हिन्दी को पूर्णतः राजभाषा के रूप में स्वीकार करवाने के लिये अभी भी धैर्य की आवश्यकता है। आपसी वैमनस्य में अपनी प्रादेशिक भाषा के अतिरिक्त लोग अंग्रेजी तो सीख लेते हैं पर हिन्दी के प्रति दुराव रखते हैं। यह मात्र अहिन्दी भाषी लोगों पर आरोप नही है वरन हिन्दी भाषी भी अंग्रेजी सीखने में तो गौरव अनुभव करते हैं परन्तु किसी अन्य प्रदेश की भाषा के प्रति अनुदार हैं। यदि हिन्दी को प्रचलित करना है, देश की राजभाषा के साथ साथ राष्ट्रभाषा बनाना है तो उदार होना पड़ेगा। हिन्दी में अन्य प्रदेश की भाषाओं के शब्दों को सम्मिलित कर उसे लोकप्रिय और सर्वग्राह्य बनाना होगा। हिन्दी के शब्दकोश को और समृद्ध बनाना वांछित है, जिसमें अन्य भारतीय भाषाओं जैसे तमिल, तेलुगु, बांग्ला, कन्नड़, मराठी आदि शब्दों का समावेश हो, यही भाषा का विकास है और किसी के अस्तित्व में बने रहने की पहली शर्त ही उसका समयानुसार विकास होता है। कहना न होगा कि हिन्दी को अपनी सामथ्र्य बढ़ानी होगी। हिन्दी को साहित्य विज्ञान इतिहास तथा पाठ्यक्रमों की पुस्तकों आदि सभी क्षेत्रों में अधिक से अधिक अनुवादों की आवश्यकता है। हमारे संविधान में हिंदी के विकास प्रसार की गति बढ़ाने का संकल्प तो है पर परिणाम संतोषजनक नहीं।
हिन्दी की सामग्री इंटरनेट पर 94 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जो हिन्दी के लिये निश्चय ही यह उज्जवल भविष्य का संकेत है। वर्ष 2000 में हिन्दी का पहला वेब पोर्टल आया था जो निरन्तर गतिमान है। विरोध के बाद भी वेब पोर्टल पर हिन्दी में आधिकारिक आदेश पारित होने लगे हैं। अभी चेन्नई के एसआरएम विश्वविद्यालय में प्रति वर्ष की भंाति हुए हिन्दी सम्मेलन में क्षेत्रीय छात्रों एवं शिक्षकों ने जिस उत्साह से भाग लिया वह राजनीति के गलियारों में उठ रही हुंकार को नकार रहा था। परन्तु हिन्दी राजभाषा के रूप में तभी सही अर्थों में स्थापित होगी जब समस्त भारतवासी राजनीति, क्षेत्रवाद से ऊपर उठ कर उदारता और गर्व से हिन्दुस्तानी हिन्दी अपनाएंगे और हिन्दी को मात्र भाषा नहीं, मातृभाषा का स्थान देंगे।

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