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भाषायी समाधान की साझी तकनीकि युक्ति
01-Dec-2017 11:01 AM 2759     

वर्तमान काल में विदेश में बसे भारतीय मूल के निवासियों की संख्या दो करोड़ के आसपास है। प्रस्तुत लेख उनके भाषा संबंधित विमर्श के लिये है। खासकर लेखन के लिये भारतीय भाषाओं व लिपियों को कम्प्यूटर के माध्यम में प्रस्थापित करने की सरल-सी युक्ति बतलाने के लिये ही यह लेखन सरोकार है। लेकिन मैं इसे उलटे तरीके से लिखने वाली हूँ अर्थात् पहले चर्चा उस युक्ति की और बाद में उसकी आवश्यकता या कालसंगति की। इसके पीछे यह भी मान्यता रखती हूँ कि इस लेख के सभी विदेशी पाठक कम्प्यूटर लेखन कला से पूर्ण परिचित हैं।
तो सरल-सा उपाय है कि पहले तो गूगल सर्च आदि से भारतीय वर्णमाला अर्थात् व्यंजनमाला "कखगघङ" और स्वरमाला "अआइईउऊ" को डाउनलोड करके उसे दो चार बार दोहराकर पुनःपरिचित हो लें। फिर कम्प्यूटर के सेटिंग व कण्ट्रोल पैनल में जाकर रीजन एण्ड लँग्वेज के पर्याय पर लेंग्वेज को खोजकर क्लिक करें। तो एक आइकॉन पूछेगा कि अॅड लेंग्वेज करना है क्या? उसके मेनू में जहाँ हिंदी (या मराठी या संस्कृत) का ऑप्शन है उसे सिलेक्ट करने से वह लेंग्वेज अॅड हो जाती है और नीचे टूलबार की पट्टी में एक नया आइकॉन दिखता है En। यह आपको इंग्लिश या हिंदी में से चुनाव करने की सुविधा देता है।
अब कोई डॉक फाइल खोलकर फिर आइकॉन En के जरिये हिंदी का चुनाव करिये। इस तरह आपने सीखने के पूरे साधन जुटा लिये (समय 2 से 5 मिनट)।
अब दो क्रियाएँ हैं - समझना और प्रॅक्टिस करना।
समझना अर्थात की-बोर्ड पर अक्षरों की पोजीशन को ऐसे देखना कि उसके वर्णमाला अनुसारी होने की और इसी कारण उसे याद रखने की सुविधा समझ में आ जाये।
चित्र को देखकर और की-बोर्ड पर प्रत्यक्ष प्रॅक्टिस करके हम समझ लेते हैं कि "कखगघ" पास-पास हैं (ख और घ के लिये शिफ्ट-की के साथ प्रयोग करना है)। फिर "चछजझ" पास-पास हैं। इसी प्रकार "टठडढ, तथदध" और "पफबभ" भी पास-पास हैं। ये सारे अक्षर दाहिनी उँगलियों से लिखे जाने हैं। बाईं ओर की पाँच कुंजियों से मात्राएँ लगती हैं या फिर मूल स्वर लिखे जाते हैं। सुविधा के लिये इनका क्रम "ओऔएऐअआइईउऊ" रखा गया है। इतने अक्षरों की तथा उनमें मात्रा लगाने के तरीके की पहचान दो-तीन बार की-बोर्ड पर प्रॅक्टिस से ही हो जाती है। उसके बाद बाकी अक्षरों की कुञ्जियों को (की-पोजीशन को) याद रखना कोई बड़ी बात नहीं है। तो इस वर्णमाला-अनुसारी की-बोर्ड का बनाने वालों ने नाम रखा है "इनस्क्रिप्ट"। लेकिन मुझे उसे "भारती" कहना अधिक सयुक्तिक लगता है, खैर।
प्रॅक्टिस के लिये लगातार 2-3 दिन 10 मिनट की प्रॅक्टिस काफी है।
अब आते हैं इसकी आवश्यकता पर। लेकिन उससे पहले जरा विदेश में बसे भारतीयों का स्टेट्स रिपोर्ट देखते हैं।
साठ-सत्तर के दशक में बाहर गये हुए भारतीय अस्सी-नब्बे के दशक में गये हुए तथा 2001 के बाद गये हुए - इस प्रकार तीन कालखण्ड बनते हैं। इनमें से पहले दौर वालों की तीसरी पीढ़ी तथा दूसरे दौर वालों की दूसरी पीढ़ी युवावस्था में है। तीसरे दौर में अमरीका की अपेक्षा यूरोपीय देश तथा एशियाई देशों में जाने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है। इस प्रकार अब भारतवासी विश्व के अलग-अलग देशों में अच्छे संख्याबल के साथ हैं।
पहले दौर में गये लोगों ने बाहरी व्यवहारों के लिये पूरी तरह से पाश्चात्य रिवाजों को अपनाकर भी घर के अंदर अपनी संस्कृति, अपने त्यौहार आदि कायम रखे थे। विदेशों के हिंदुस्तानी मंदिर, हिंदुस्तानी संस्थाओं में प्रायः ये ही संस्थापक रहे। दूसरे दौर में वे लोग गये जो कई मायनों में अपने आपको हर प्रकार की भारतीयता से दूर रखना चाहते थे और वे पूरी तरह से जेंटलमैन बनने में जुट गये। तीसरी दौर में वे जा रहे हैं जो प्रायः उच्च पदस्थ होकर गये हैं। कम्प्यूटर जैसी आधुनिक तकनीक उनके लिये अति सरल है। इनके माँ-पिता ने इन्हें भारतीय भाषा इत्यादि से अलग रखकर अंगरेजियत में ढाल दिया था, क्योंकि अच्छी विदेशी कमाई का यही गणित था। इनकी दूसरी पीढ़ी अभी बाल्यावस्था में है। लेकिन उनका भी तेजी से अंगरेजीकरण हो रहा है।
तो अब कुल मिलाकर इन विदेशी भारतीयों की संख्या में, प्रतिष्ठा में और समृद्धि में वह वृद्धि हुई है जहाँ उन्हें सामाजिक मनोदशा की अभिव्यक्ति में पहचान मिल रही है। उनका एक प्रेशर ग्रुप सा बन सकता है, बन चुका है। ये आज भी व्यक्तिगत समृद्धि के लिये पश्चिमी भाषा, संस्कृति, रीतिरिवाज आदि को ही आवश्यक मानते हैं लेकिन इनकी कुल संख्या का दस प्रतिशत हिस्सा अब यह भी चाहता है कि वह दुबारा अपनी भारतीयता को पहचाने, उससे जुड़े। इसके दो-तीन सरल उपाय बन गये हैं। एक तो भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रवासी भारतीय दिवस तथा उनकी अपनी-अपनी भाषाओं में निकाली जाने वाली पत्र-पत्रिकाएँ हैं। दूसरा है भारतीय संगीत व संस्कृति। चाहे वह शास्त्रीय संगीत हो या फिर बॉलीवुड-ट्रॉलीवुड से सीखी जाये। तीसरा सरल तरीका है कि जिन विदेशी गुरुओं ने तीस-चालीस वर्ष पूर्व भारतीय अध्यात्म को सीखा और अपनी नई शब्दावली में ढालकर अपने नाम से प्रस्तुत किया उनसे अध्यात्म-दर्शन सीखें।
ये सारे सरल तरीके हैं जिनके लिये उन्हें अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने की आवश्यकता नहीं है। वह कम्फर्ट जोन है अंगरेजी भाषा। इसीलिये भारतीय संस्कृति, परम्परा और सनातन शास्त्रों की महत्ता जानकर या उनकी ओर आकृष्ट होकर भी उसकी अभिव्यक्ति के लिये अब भी अंगरेजी का आश्रय लिया जाता है। घर में बच्चों के साथ बोलचाल में भले ही कहीं-कहीं अपनी-अपनी भारतीय भाषा में बोला जाता हो, परन्तु लेखन में अपनी भाषा का पूरा ही अभाव है। एक दृश्य जो बहुतायत से देखा जाता है वह ये कि वहाँ बसे युवाओं के माता-पिता जब मिलने जाते हैं तब वे माता-पिता अपने बेटे-बेटियों से तो अपनी भाषा में बात करते हैं, लेकिन नाती-पोतों के साथ अंगरेजी से छुटकारा नहीं है।
यह स्थिति है विदेशों में बसे लगभग दो करोड़ भारतीयों की। इनमें से यदि बीस हजार भी मानते हों कि हमें वापस अपनी भारतीयता से जुड़ना चाहिये, तो भी अपनी भाषा से वापस जुड़ने की इच्छा रखने वाले दो हजार ही निकलेंगे। और उनके मन में भी एक शंका अवश्य होगी कि जब गूगल-इंडिका-इनपुट जैसे टूल्स की सहायता से रोमन में स्पेलिंग करते हुए भी कम्प्यूटर उनकी लिखावट को भारतीय लिपि में दिखा सकता है तो फिर अलग से यह वर्णमाला अनुसारी की-बोर्ड क्यों सीखा जाय?
तो इसका उत्तर है भारतीय भाषाओं में फोनेटिक्स का सही उपयोग। छोटे बच्चे को इंग्लिश स्पेलिंग सीखते हुए यह समझना बड़ा मुश्किल होता है कि CUT को "कट" क्यों पढ़ा जाता है और "कलर" का स्पेलिंग Calar क्यों नहीं है? Mar Gaya को आप क्या पढ़ेंगे - मर गया या मार गया? लेकिन भारतीय भाषा-लेखन में यह समस्या नहीं है। वह उच्चारण पर, फोनेटिक्स पर आधारित है।
इसी उच्चारण सुविधा के कारण भारतीय पद्धति से भाषा लिखना सरल है, विश्व की किसी भी अन्य भाषा की अपेक्षा।
इस भारतीय तरीके की विशेषता यह है कि आप लिखने के लिये कोई भी भारतीय भाषा चुनें - हिंदी, मराठी, बंगाली, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, गुजराती। हर बार की-बोर्ड के अक्षरों का स्थान वही है जो पूर्व में प्रदर्शित चित्र में है। इसलिये आपको अपनी हिंदी बात किसी बंगाली मित्र को लिखकर दिखानी है तो एड लँग्वेज में बंगाली को एड कर लें और हिंदी की तरह लिखते चले जायें - चाहे आपको बंगाली लिपि लिखनी-पढ़नी आती हो या न आती हो। और अब तो एक अच्छा कन्वर्जन टूल उपलब्ध है।
http://www.virtualvinodh.com/aksharamukha
इसकी सहायता से आप कोई भी हिंदी पन्ना तेलुगु, गुरुमुखी, मलयालम में बदल सकते हैं या उन लिपियों से हिंदी में। विदेश में बसे भारतीयों को भावना के स्तर पर एकत्रित करने का यह भी एक अच्छा उपाय है कि एक-दूसरे की भाषा को अपनी लिपी में पढ़ा जाय।
वर्तमान में विण्डोज व लीनक्स दोनों ऑपरेटिंग सिस्टम में एड लँग्वेज की सहायता से सारी भारतीय भाषाओं को एड कर अपनी मनचाही लिपि में कोई भी भारतीय लेखन सरलता से किया जा सकता है। अगली पीढ़ी को भारत की वर्णमाला और लिपि सिखाना भी एक कर्तव्य या मैं कहूँ तो भारत-धर्म है। विदेशों में बसे जो भी भारतीय मानते हैं कि भारतीय संस्कृति, भाषा, लिपि इत्यादि का संरक्षण होना चाहिये, उन्हें इस यज्ञ में अपनी कर्माहुती देने के लिये यह सरल-सा तरीका अवश्य अपनाना चाहिये। और यदि किसी को इसमें कोई तकनीकी परेशानी आये तो निःसंकोच मुझे ईमेल कर सकते हैं।

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