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भारतीय कलाओं का स्मरण
01-Jan-2018 02:55 PM 2333     

कल देर रात टीवी पर अलग-अलग इंडियन चेनल्स पर नृत्य प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम देर रात तक देखती रही। वीकेंड भी था और ठंड भी कड़ाके की शुरू हो चुकी है। करने के लिए कुछ खास था नहीं। नृत्य मेरा दूसरा प्यार है लेखन के बाद। मेरी गुरु रितु ने मुझे बॉलीवुड डांस से निकालकर फिर से कत्थक में डाल दिया है। उनका तर्क है तुम्हें नृत्य की समझ है और तुम्हारे लिए वही ठीक है। इस उम्र में वे मेरे गुजरे सपने में फिर से जान डाल रही हैं जो वह हमेशा करती हैं सभी के लिए। सारे प्रोग्राम एक जैसे ही लग रहे थे। नृत्य के नाम पर तेज संगीत पर हवा में उछालते-कूदते पतले से, नरम रबड़ की तरह सभी प्रतियोगियों के शरीर और जजों के कमैंट्स सारे लगभग एक जैसे। मैं सोचने लगी, "लगातार तीन-चार घंटे एक जगह बैठकर इन्हें देखा जा सकता है, शायद?"
मेरे शहर शार्लोट में इंडियन कम्युनिटी के अस्सी प्रतिशत बच्चे अपने छात्र जीवन में क्लासिकल इंडियन डांस, गायन या वादन सीखते हैं, क्योंकि अभिभावक विरासत में मिली अपनी सांस्कृतिक सम्पदा के संस्कारों के बीज अपनी अगली पीढ़ी में बोना चाहते हैं। जरिया होता है भाषा, कला, सिनेमा, मंदिर (हिन्दू सेंटर जो भारतीयों के इकठ्ठा होने का सामाजिक स्थान भी है) में दी जाने वाली भारतीयता की शिक्षाएँ। लेकिन भारतीय टीवी चेनल्स पर आज भारत की अलग ही तस्वीर दिखाई देती है और हमारे बच्चे कुछ पिछड़े दिखाई देते हैं?
सुबह आज मौसम की पहली बर्फ गिरी है, छुट्टी है। घास पर नरम सफ़ेद शुद्ध बर्फ की परत और गहरी भूरी पेड़ों से गिर चुकी सूखी पत्तियों के ढेर पर छोटी-छोटी गहरी भूरी-काली सर्दियों में आने वाली चिड़ियाँ फुदक-फुदक कर पिली पड़ी घास में से पता नहीं क्या ढूंढ कर खा रही हैं। हल्की धुन पर चलता संगीत, मेरा ध्यान गया ऐसा लग रहा था मानो हर चिड़िया कोई पारम्परिक नृत्य पेश कर रही हो। मेरी कल्पनाओं में मुझे मजा आने लगा और मैं देर तक उन्हें निहार रही थी। जब थोड़ी धूप निकल आयी तो काली मोटी बिल्ली रोज की तरह उन पर झपट्टा मारने को आ गयी और कुछ कौवे, बाज भी मँडराने लगे। थोड़ी धुंध भी साफ़ हो चुकी थी। अब नन्ही चिड़ियाँ मेरी कल्पनाओं का नृत्य छोड़ डर के मारे इधर-उधर उड़ने लगीं। मुझे लगा रात के टीवी में दिखाए गये तेज संगीत का एक्शन शुरू हो गया है, "तीन बज गए और पार्टी अभी बाकी है" और यह नन्हीं क्लासिकल इंडियन डांसर चिड़ियाँ प्रकृति के नृत्य के इस दूसरे राउंड में बाहर कर दी गयी हैं हमारे बच्चों की तरह।
एक सीधा सवाल मेरे जहन में गूँजा, क्या हमें भारत से दूर विदेश में रहकर अपने बच्चों में अपनी भाषा, अपनी जड़ें, अपनी कला, अपनी संस्कृति, अपनी विरासत को आगे बढ़ाने की जो कोशिश है, जो जूनून है, जिसके लिए हम यहाँ वर्षों का समय, पैसा, शक्ति-साधन, कई वर्षों की मेहनत, प्रतिबद्धता के साथ लगे हुए हैं उसे बंद कर देनी चाहिए? जबकि भारत में भी उसकी क़द्र कम हो रही है, तस्वीर बदल रही है? इस मेहनत का क्या फायदा होने वाला है? तत, तत, थुन-थुन की जगह मादक, अश्लील, उत्तेजक नृत्यों की भरमार है, जो कि सिर्फ एक्रोबेट्स की कला रह गयी है? या कोई बीच का रास्ता भी है? मैं इस तथ्य से वाकिफ हूँ। परिवर्तन समय की पहचान है और वह निश्चित आवश्यक है। शायद भारत में जो तस्वीर बदल रही है वो समय की माँग है, लेकिन जब बदलाव की गति बहुत तेज हो तो वह बदलाव किसी भी देश या समाज में असंतुलन लाता है।
मैंने मेरे सवालों के जवाब जानने के लिए शार्लोट शहर के नृत्य के सभी गुरु महारथियों, जिनका जीवन यहाँ भारतीय कला और संस्कृति के लिए समर्पित है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिनकी पहचान है उन्हें संपर्क किया और अपने सवाल रखे। उन सभी के अनुभवों के आधार पर उनके जवाब भी मुझे मिल गए। उन सभी के विचार लगभग एक समान ही थे और सम्बंधित चिंता भी।
नृत्य मेरी जीविका का साधन नहीं है और ना ही नृत्य मेरे लिए किसी के मनोरंजन का माध्यम मात्र है। ना ही नृत्य मेरा चाल-चलन, मेरे लिए परम्पराओं का निर्वाह या मेरी संस्कृति, सभ्यता का मात्र मुखौटा है। नृत्य मात्र विरासत में मिली मुझे सौगात भी नहीं है। मैं किसी पद, गरिमा या अवॉर्ड के लिए नृत्य की सेवा नहीं करती। नृत्य मेरी साधना, आराधना, भक्ति से भी बढ़कर मेरा जूनून है जो मुझे मेरे ईश्वर से जोड़ता है। मैंने कई साल से हिन्दू सेन्टर में सारे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेना छोड़ दिया है, फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया में कई साल से मेरी भागीदारी नहीं है, क्योंकि उनकी माँग अब बॉलीवुड डांस की ज्यादा हो गयी है। फिर भी मेरी नृत्य शिक्षा में अपने बच्चों को डालने के लिए लोग एक साल से अधिक लम्बे समय तक इंतजार करते हैं। मैं बाकायदा अभिभावकों का इंटरव्यू लेती हूँ, उसके बाद बच्चे को अपना शिष्य बनाती हूँ या किसी दूसरी नृत्य शिक्षिका के पास भेज देती हूँ। फिर भी मेरे वार्षिक नृत्य कार्यक्रम में हजारों की उपस्थिति दर्ज होती है, टिकिट्स दो महीनों पहले बुक हो जाती हैं।
मैं शुद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्य सिखाती हूँ और मेरी प्रस्तुति भी शुद्ध शास्त्रीय और लोक नृत्यों में होती है। मैं अपने शिष्यों को अपनी नृत्य शिक्षा के द्वारा भारतीय सभ्यता और संस्कृति की शिक्षा देती हूँ। यह शब्द हैं डॉ. महा गिंगरीच के, जो शार्लोट, अमेरिका में भरतनाट्यम की गुरु हैं और सीपीसीसी कम्युनिटी कॉलेज की एडमिन असिस्टेंस टू वाइज प्रेजिडेंट हैं। पिछले पैंतीस वर्षों से अमेरिका के शहर शार्लोट को अपनी कला से भारतीय संस्कृति के रंग में रंग चुकी हैं। यह उनके अथक प्रयास और मेहनत का ही नतीजा है कि शार्लोट शहर बहुत छोटा होते हुए भी भारतीय सांस्कृतिक कला का एक केंद्र बन चुका है। नृत्य कला लोगों की रगों में बसकर आम जीवन की रोजमर्रा की जीवन शैली का अंग बन चुका है। सभी प्रकार के शास्त्रीय नृत्य, गायन, लोक नृत्य, बॉलीवुड नृत्य आदि कई कलाओं में यह शहर अग्रणी है, यहाँ कई सांस्कृतिक कार्यक्रम और जलसे होते हैं।
डॉ. महा की वार्षिक प्रस्तुति में जब स्टेज पर जीवंत ड्रम की थाप, गिटार की झनझनाहट और लेटिन डांस का थिरकता संगीत और उस पर क्लासिकल लेटिन डांस प्रस्तुत करते कलाकार और उसी थाप पर सजीव फ्यूज़न प्रस्तुति में भरतनाट्यम के लिबास में नाचती डॉ. महा उस दैविक माहौल में किसी देवी-सी प्रतीत होती हैं। उधर दूसरी नृत्य गुरु राधिका घाघरा-चोली पहने उस नृत्य के जमे अखाड़े में अपने लेटिन डांस पार्टनर के साथ उतर आती हैं और दर्शक किसी मोहपाश में बँधकर पलकें झपकना भी भूल जाते हैं। उस दर्शक दीर्घा में कौन गोरा, कौन काला और कौन हिंदी, तमिल, तेलगु, मलयाली, कन्नड़, मराठी,सिंधी, पंजाबी, बंगाली किसी भी भाषा को बोलता हो, मक्का-मदीना जाता हो या हरिद्वार जाकर अस्थि विसर्जन करता हो, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता; भान भी नहीं रहता। उस जीवंत प्रस्तुति को देखकर नवरंग, झनक-झनक पायल बाजे, नाचे मयूरी, गाईड सिनेमा का पीरियड याद आ जाता है। साथ ही अफ्रीकन ड्रम पर थिरकते कलाकार साठ के दशक का हेलन के फ्लेमिंगो डांस, अफ्रीका के हुलाहु और छत्तीसगढ़ के आदिवासी नृत्य की याद करवाते हैं।
कला कला होती है चाहे कोई भी डांस फॉर्म हो, नृत्य की एक ही भाषा है, उस परम आनंद को महसूस करने की जब आप अपने आप को भूलकर हृदय, आत्मा से पूरी तरह उस ईश्वर को, उस परम आनंद को महसूस करते हैं। "हमें दोनों ही सभ्यताओं के अच्छे पक्ष अपनाने चाहिये।" यह शब्द हैं गुरु राधिका के जो यामिनी कृष्णमूर्ति की शिष्या हैं। दूरदर्शन पर उमा शर्मा और पंडित बिरजू महाराज के साथ नृत्य प्रस्तुति दिया करती थीं और आज अमेरिका में नृत्य सेवा में जीवन समर्पित कर भारतीय नृत्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात कर चुकी हैं। गुरु राधिका हर नृत्य शैली का स्वागत खुले दिल से करती हैं परन्तु अपनी विरासत की जड़ें बहुत गहरे उनमें जमीं हुई हैं और यही उनकी विशुद्ध गर्वित पहचान हैं, जो भीड़ में भी उन्हें अलग पहचान दिलवाती है।
यहाँ भारत के विभिन्न हिस्सों से आयी कई नृत्य शिक्षिकाएँ हैं। भारतीय कम्युनिटी के बच्चे विभिन्न माध्यमों से भारतीय नृत्य कला की सेवा करते हैं, कोई भी त्यौहार, उत्सव, स्कूलों के सांस्कृतिक कार्यक्रम, यूनिवर्सिटीस के कार्यक्रम, 15 अगस्त, 26 जनवरी, गाँधी जयंती, फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया, कोई भी इंटरनेशनल फेस्टिवल यहाँ तक की चीन का ड्रेगन फेस्टिवल, भारतीय नृत्य कला का डंका सभी और बजता है। अब वो ज़माने गए जब साड़ी, बिंदी, चूड़ी, कढ़ी का मतलब समझाना पड़ता था। अब तो यह हाल यह है कि स्कूलों के मेनू में भी भारतीय व्यंजन शामिल किये जाते हैं। ग्रोसरी स्टोर्स में भारतीय व्यंजनों की बहार है; पनीर, घी, नान रोटी, समोसा भी अमेरिकन के खानपान में शामिल हो चुका है और भारतीय परिधान की दुकानों में अमरीकी ग्राहकों की संख्या बढ़ने लगी है। ॐ का उच्चारण कर योग और ध्यान अमेरिकी जानने लगे हैं।
कई साल भारत के बाहर रहकर मैंने यह महसूस किया है अमेरिका की अपनी कोई सभ्यता, संस्कृति या विरासत है ही नहीं, यह देश कई संस्कृतियों, सभ्यताओं का मिला-जुला रूप है। यहाँ के लोगों में संस्कृति की भूख है। वे बड़ी आसानी से हर किसी की कला, सभ्यता, संस्कृति, खानपान जो भी अच्छा है अपना लेते हैं। दूसरी ओर भारत की प्राचीन कला सम्पदा, संस्कृति और सभ्यता हजारों साल पुरानी मूल्यवान धरोहर है, भारत हजारों सालों से कला का क्षेत्र हो या ज्ञान-विज्ञान का, शिक्षा का या मानव मनोविज्ञान का, गणित हो या भाषा का हर क्षेत्र में अग्रणी रहा है, हर क्षेत्र में संसार को सिखाने और प्रतिनिधित्व के लिए भारत के पास अथाह भण्डार है।
फिर क्यों आज हमारी सोच, हमारी कल्पनाएँ, हमारी उड़ान अपनी कला भूल दूसरों से कला की भीख मांग रही है? क्या हमारा अपने आप से भरोसा उठ चुका है? क्यों नहीं अपनी कला के साथ दूसरे की कला का भी सम्मान हो?
कभी सोचा है भारत से निकली प्राचीन रथ यात्रा की परंपरा का विश्व पर क्या असर है? भारत में मनाये जाने वाले त्यौहार, महोत्सवों, जुलूस, मेले, सामूहिक नृत्य, अखाड़ा कला, मल्लयुद्ध कई-कई कलायें जिनकी गिनती बड़ी है, उन सांस्कृतिक धरोहरों का विश्व की संस्कृति पर कैसी छाप है? सदियों से कई सभ्यताओं ने उसे कैसे अपनाया है?
अंत में, एक बार दिवाली के नाम पर भारतीय कम्युनिटी की हर साल मनाई जाने वाली दिवाली पार्टी पर परिवार की तीन पीढ़ियाँ एक साथ शामिल हुईं। स्वागत द्वार पर लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियों के साथ दिये, रंगोली सजी हुई थी और भीतर वहाँ शराब-मांसाहारी खाने और शबाब का भरपूर इंतजाम था। स्ट्रिप डांसर्स ना के बराबर कपड़ों में कमर मटका-मटका कर बेली डांस कर रही थीं और कई भारतीय डॉलर घुमा-घुमाकर उन डांसर्स पर फेंक रहे थे।
इस तमाशे का विरोध किसी ने नहीं किया। यह एक सामाजिक पारिवारिक दीवाली पार्टी थी। लेकिन इस आयोजन से दीवाली का उद्देश्य कहाँ पूरा हुआ, यही विचारणीय प्रश्न है?
लॉस वेगास में कभी जाकर मजा कर आना एक बात है, लेकिन लॉस वेगास के कल्चर को रोजमर्रा के जीवन जीने की शैली तो नहीं बनाया जा सकता है न?

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