ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतीय बैंकिग और अर्थ-व्यवस्था
01-Jan-2017 12:21 AM 2827     

मुझे अपने एक चीनी मित्र से पता चला कि वे अपना बैंकिंग चीन की बैंकों से करते हैं। मैंने उनसे कौतुहलवश पूछा कि आप ऐसा क्यों करते हैं? उन्होंने अपने जवाब में कोई देश-भक्ति की बात नहीं कही, कोई डींग भी नहीं हाँकी। उनका जवाब सीधा था- "व्यवसायिक तौर पर और सभी तरह से अधिक सुविधा के लिये और अपने लाभ के लिये।"
मैं विचार में डूब गया। भारत सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती? सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं। भारत की रिज़र्व बैंक रुपये-पैसे के लेन-देन पर अपने नियंत्रण लगाती है। भारत का पैसा यदि विदेश में खर्च करना हो तो सौ तरह के नियन्त्रण। फिर भी सरकार भारतीय मुद्रा की विदेश में उड़ान को रोकने में सफ़ल नहीं हो पाती। हाल यह है कि मेलबोर्न जैसे शहर में भी स्टेट बैंक की कोई शाखा नहीं है।
भारत में बैंकिंग की असुविधा का एक छोटा-सा उदाहरण दूँ - अपने विदेशी बैंक के एटीएम कार्ड, चैक बुक इत्यादि लेकर कोई प्रवासी भारतीय बैंक में जाकर कहता है कि मुझे भारत-यात्रा के लिये इतना रुपया एनआरई एकाउंट में ट्रांसफर करना है तो छूटते ही कहा जायेगा -
"नहीं, एक महिना लग जायगा, रिजर्व-बैंक से क्लियर होने में। आप अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया से ही बैंक के नाम ड्राफ़्ट ले आइये।"
जैसे कि भारत आकर कुछ नया विचार करना वर्जित हो! कम से कम विदेशी धन भारत में लाने में तो अड़चन नहीं होनी चाहिये। बैंकिंग सेवा में जब भी कहा जाता है "ऐसा" नहीं वैसा करो तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि "ऐसा" करने पर प्रतिबंध है। मान लो नया एनआरई एकाउंट खुलवाना है तो एटीएम की पिन आने में डेढ़ महीना लग जायगा। भारत छोड़ने के बाद एटीएम का पिन आ जायेगा! वाह! कोई ग्राहक पिन भूल जाय तो फिर से वही कवायद! तो चलो लगे हाथों यह भी जान लें कि ऑस्ट्रेलिया में पिन मिलने में क्या औपचारिकता होती है? सात दिन के अंदर-अंदर दो लिफाफे अलग-अलग दिन को आपको घर के पते पर मिल जायेंगे। एक में कार्ड होगा दूसरे में पिन नंबर। एक ही लिफाफा गलत हाथों में पड़ने की संभावना अधिक होती है दोनों की अपेक्षा। इसलिये यह सावधानी आवश्यक होती है। पिन भूल गये? कोई बात नहीं। बैंक की किसी भी शाखा में जाइये। परिचय के रूप में ड्राइवर-लाइसेंस आदि कुछ दिखाइये और पिन नंबर गुप्त रूप से बदल दीजिये।
असुविधा झेलते हुये प्रवासियों से भी हर भारतीय-बैंक डिपोज़िट की कोरी अपील करती रहती है। इससे अच्छा है कि भारत सरकार अन्य देशों से सीख ले कर बैंक के ग्राहकों को प्रवासी देश से भी ज्यादा सुविधा दे ताकि ग्राहक स्वयं आकृष्ट हों। कोई प्रवासी निष्किय खाता भारत में बंद करवाना चाहता है तो कुछ भी दबाव डाल कर मैनेजर अन्य सुझाव दे देगा। इसके विपरीत यहाँ ग्राहक के हक में सुझाव देने के बाद भी मैनेजर या अफ़सर जानना चाहता है कि ग्राहक आखिर चाहता क्या है?
बैंकिंग के लिये कोई भी मांग प्रवासी क्यों रखें? वे अपने लिये सुविधा क्यों मांगें जबकि वे देखते हैं कि भारत में रहने वाले नागरिक कैसे छोटी-सी जरूरत के लिये लम्बी-लम्बी कतार बनाते हैं? यह कतार बैंक की कई शाखाओं में देखी जा सकती है। भला हो एटीएम का, कुछ तो सुविधा मिली। आज विमुद्रीकरण के कारण होने वाली कतार को जाने दीजिये। वैसे भी पैसा ग्राहक का लेकिन छोटे-मोटे कामों के लिये लम्बी कतार में खड़े होना और महीने दो महिने का इंतजार करना शर्त बन गई है। लालफीते चले गये, कागज की फाइलें चली गई पर लाल फीताशाही ज्यों की त्यों बनी हुई है!
विमुद्रीकरण का नाम आया तो चलो काले धन पर चर्चा हो जाय। भारत की इस अर्थ-व्यवस्था को देख कर कहना पड़ता है-
खिसकते हैं नोट, अर्थ-व्यवस्था बदल रही/जाल का हर चक्र अपने, यन्त्र को ही छल रहा/पखेरु ने पंख खुद उलझा दिये हैं किस तरह/तिमिर ने किरणों के पग उलझा दिये हैं किस तरह।
क्या कारण है कि यहाँ ऑस्ट्रेलिया में मकान खरीदते समय पैसा पूरा चैक में लिया और दिया जाता है? कहने की आवश्यकता नहीं कि कारण सिर्फ एक है। सिस्टम या यहाँ की व्यवस्था। यहाँ सामान्य नागरिक को व्यवहार में किसी काम के लिये ऊपरी पैसा या रिश्वत देने या लेने का काम नहीं पड़ता। क्योंकि यदि आप रिश्वत लेंगे या टैक्स बचाने के लिये काले धन का लेन-देन करेंगे तो आप पकड़ लिये जायेंगे। गलत काम करने में व्यवस्था का डर होना चाहिये और साथ ही सही काम में निडरता। आपको यह विश्वास भी होना चाहिये कि सही काम करने से व्यर्थ में कोई अफ़सर तंग नहीं करेगा। क्या कारण है कि भारत में काला धन इकठ्ठा करने वाला व्यापारी यहाँ आकर अचानक ईमानदार हो जाता है? कारण वही, व्यवस्था । मैं नहीं मानता कि भारतवासियों के खून में बेईमानी और भ्रष्टाचार है या कि हमारे डीएनए में खोट है। यह सब बकवास मुहावरे हैं। व्यक्ति उतनी ही बेइमानी करता है जितनी कि व्यवस्था उसे इज़ाजत देती है। इंसान तो हर जगह एक जैसे होते हैं। मेरे पास इसका प्रमाण है। ऑस्ट्रेलिया ने जब से जीएसटी का कर लगाया है एक नई बात सामने उभरी है। घर में छोटी-मोटी मरम्मत करवाकर आपने यहाँ बिल मांगा तो उसमें जीएसटी को जोड़ कर अतिरिक्त पैसा देना पड़ेगा। तो यहाँ भी ग्राहक चाहे वह गोरा हो या काला बिना बिल के अपने लिये जीएसटी बचा लेता है। इसकी कोई पकड़ नहीं है। फिर खून में ईमानदारी होने का क्या सवाल है? सिस्टम अगर दूध के कुएँ में पानी डालने की इज़ाजत देता है तो अगले दिन कुआँ तो पानी का ही मिलेगा न!
ट्रावेल-एक्स्चैंज के बाहर मैं नियोन साइन के बोर्ड पर ऑस्ट्रेलियन डॉलर की विनिमय-दर देखता हूँ। पौंड, अमेरिकन डॉलर, चीनी, सिंगापुर आदि सभी देशों की विनिमय-दर चमकती हैं पर भारतीय रुपये की दर वहाँ पर देखने के लिये तरस जाता हूँ। यदि विनिमय पर प्रतिबंध न हो तो ग्राहक अपनी सुविधा के लिये अधिकतम विनिमय करना चाहेगा। भारत जाने वाला यात्री सुविधा के लिये थोड़ा भारतीय रुपया ले ले तो यह एक्स्चैंज के लिये कोई खास व्यापार नहीं बनता। रुपया तो रुपया है। एनआरओ याने भारत में कमाया और एनआरई याने विदेश में कमाया रुपया। इस भेदभाव से सरकार रुपये के पलायन को कितना रोक पाती है यह तो विशेषज्ञ जानें पर इससे व्यापार और विनिमय की साँस फूलने लगती है।
भारत में विमुद्रीकरण के तुरन्त बाद ऑस्ट्रेलिया में भी 100 के डॉलर के विमुद्रीकरण की चर्चा होने लगी। पर काला धन इस विचार के मूल में नहीं है। यहाँ पर 53 प्र.श. विनिमय प्लास्टिक कॉर्ड या मोबाइल के जरिये होता है। सरकार चाहती है कि यह प्रतिशत और बढ़े। अत: पांच वर्ष की अवधि में 100 डॉलर के नोट का प्रचलन समाप्त कर देने पर विचार कर रही है। इसके विरूद्ध भारत में केवल 2 प्र.श. विनिमय केश-रहित होता है। पर यह कारण बाद में सोचा गया है।
यदि वास्तव में सरकार ने काले धन के विरुद्ध कमर कस ली है तो इस मापदंड से जनता और सरकार सफलता की जांच चालू रखे। 1. पुराने नोट में से कितना काला धन वापस नहीं आया? 2. एफडीआई या विदेशी निवेश में कितना इज़ाफा हुआ? 3. रुपये का मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार में कितना बढ़ा? इस प्रयास में नेताओं ने, व्यापारियों ने व कुछ मजदूर, किसान, कर्मचारियों ने भी असफल बनाने में सहयोग दिया है। सरकार की कार्यान्वित करने में भूल को क्षम्य माना जा सकता है - यदि अब भी स्वर्ण-आभूषण और अचल संपत्ति के रूप में व्याप्त काले धन को उजागर करवाने में सजगता दिखाये और केशलेस विनिमय को बढ़ावा दे पाये। यह सारा घटनाक्रम नाटक है या हकीकत? इसका फैसला मूल इरादे से होता है। इरादा पक्का हो तो अर्थशास्त्री सलाहकारों से विचार-विनिमय हो सकता है और गलतियों को सुधारा जा सकता है। अन्यथा बकौल शेक्सपीयर इस नाटक के पात्र पीछे रह जायेंगे और अभिनय आगे बढ़ता जायगा।

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