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भारतवंशियों की आधुनिक पीढ़ी
01-Jan-2018 03:09 PM 1734     

हम जब भी इंग्लैण्ड में हिंदी के विषय में बात करते हैं तो हम भावनात्मक हो जाते हैं और अपनी तर्कशक्ति को ताक पर रख देते हैं। हम यह सोच कर नाराज़गी ज़रूर ज़ाहिर करते हैं कि युनाईटेड किंगडम में कभी जीसीएससी में हिंदी एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी। आज स्कूलों में हिंदी कहीं नहीं दिखाई देती। हिंदी मंदिरों और निजी शिक्षकों के घरों तक सीमित हो गई है।
आज वस्तुस्थिति यह है कि एक भाषा के रूप में इंग्लैण्ड में हिंदी का वर्तमान बहुत संतोषजनक नहीं है और इसके भविष्य के लिए भी बिना अति आशावादी बने हमें केवल कर्म करना सीखना होगा। अतीत में हिंदी इंग्लैण्ड में स्कूलों में एक एच्छिक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती थी, लेकिन हिंदी स्कूलों से ग़ायब हो गई क्योंकि उन स्कूलों में हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थी मिल नहीं पा रहे थे।
आजकल इंग्लैण्ड में बहुत-सी ग़ैर-सरकारी संस्थाएं हिंदी भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के कामों में जुटी हैं। देशभर में हिंदी ज्ञान प्रतियोगिताएं करवाई जा रही हैं, कहानी कार्यशालाएं की जा रही हैं, हिंदी में कम्पयूटर में कामकाज पर ध्यान दिया जा रहा है। लेकिन बिना किसी विश्वविद्यालय से पंजीकृत हुए बिना यह गतिविधियां आधिकारिक स्वरूप नहीं पा सकती हैं।
हमें भावनाओं को तज कर इस ओर ध्यान देना होगा कि आखिर ऐसा हुआ क्यों। जब हम भारत से इंग्लैण्ड आए प्रवासियों पर नजर डालें तो पाएंगे कि भारत से इंग्लैण्ड आने वालों में सबसे अधिक संख्या गुजरात एवं पंजाब प्रदेशों से है। पंजाब से आने वालों में भी सिख धर्म के अनुयाईयों की संख्या कहीं अधिक है, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं पंजाबी है। इसके अतिरिक्त तमिल, बंगाली एवं महाराष्ट्रियन भी काफ़ी संख्या में यहां प्रवासी बनकर आए। इन सभी के लिए हिंदी बोलचाल की भाषा तो थी, लेकिन कहीं भी लिखने-पढ़ने वाली भाषा नहीं थी। इसलिए जब पहली पीढ़ी के प्रवासियों ने पाया कि उन्हें विलायत में सबसे अधिक समस्या उन्हें अंग्रेजी न आने से हो रही है तो उन्होंने अपनी आगामी पीढ़ी से घर में तो अपनी मातृभाषा में बातचीत जारी रखी लेकिन बाहर दुनिया से संघर्ष करने के लिए उन्हें अंग्रेज़ी सीखने के लिए बढ़ावा दिया। यानि इंग्लैण्ड आने वाले अधिकतर भारतीय मूल के परिवारों के लिए हिंदी मात्र एक बोली थी जिसके माध्यम से वे दूसरे राज्य के रहने वालों से बातचीत कर सकते थे यानि संपर्क भाषा। और संपर्क भाषा भी निम्न मध्य वर्ग के लोगों के लिए। मध्य वर्ग या फिर उच्च मध्य वर्ग की संपर्क भाषा अंग्रेजी ही थी। हमें याद रखना होगा कि यह भी प्रवासियों की पहली पीढ़ी तक ही सीमित था। उसके बाद की पीढ़ियों की अपनी एक जबान बन चुकी थी - अंग्रेज़ी।
हिंदी बोलने वाले परिवारों में भी बच्चों को यही कहा जाता था, "अरे हिंदी सीख लो। कल को भारत जाओगे, तो दादी और नानी से कैसे बात करोगे।" जो लोग अपने बच्चों को यह समझाया करते थे, आज वही दादा-दादी और नाना-नानी बन चुके हैं। और उन सबको अंग्रेज़ी आती है। इसलिए उनके लिए आज के बच्चों को दादी और नानी के हवाले देकर हिंदी सीखने के लिए कहना भी संभव नहीं।
पहली पीढ़ी के प्रवासियों के पास न कोई ज़रिया था और न ही हिम्मत कि वे हिंदी के लिए समय निकाल पाते। शायद उन्हें इसकी आवश्यकता भी नहीं थी। उस समय न तो कोई हिंदी का रेडियो स्टेशन था और न ही किसी अंग्रेज़ी के रेडियो अथवा टेलिविज़न सेन्टर से ही कोई हिंदी के कार्यक्रम प्रसारित होते थे।
अस्सी के दशक में विडियो रिकॉर्डर की लोकप्रियता और हिंदी फ़िल्मों की कानूनी और ग़ैर-कानूनी वीडियो केसेटों ने इंग्लैण्ड में हिंदी को लोकप्रिय बनने का अचानक एक अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया। बच्चे-बड़े सभी इकठ्ठे बैठकर अमिताभ बच्चन की फ़िल्में देखा करते थे। शोले फ़िल्म के डायलॉग याद करके इंग्लैण्ड के बच्चे भारत से आने वाले अतिथियों पर अपने हिंदी ज्ञान की धाक जमाते थे। प्रवासियों की पहली पीढ़ी को भी अचानक जैसे अपने पैरों तले एक नई ज़मीन का अहसास होने लगा था।
स्कूलों में हिंदी पढ़ने की न तो किसी को आवश्यकता महसूस होती थी और न ही किसी को इस बात का ख़्याल ही आता था। हिंदीभाषी परिवारों को इस बात की प्रसन्नता थी कि उनकी संतानें कम से कम हिंदी बोलने तो लगी हैं। वहीं ग़ैर हिंदीभाषी परिवारों के लिए हिंदी फ़िल्में भारत से जुड़ने के एक साधन के रूप में उभरकर आई थीं।
इंग्लैण्ड में भारत से जुड़ाव के लिए हिंदी फ़िल्मों के अतिरिक्त भारतीय क्रिकेट का भी खासा योगदान रहा। ख़ासतौर पर कपिल देव की टीम द्वारा 1984 में क्रिकेट के विश्व कप विजेता के रूप में उभरकर आने से भी यहां के बच्चों का भारत के प्रति अधिक सकारात्मक रुख पैदा हुआ। यही वह समय भी था जब बीबीसी ने रामायण और महाभारत जैसे विशुद्ध भारतीय टेलिविज़न सीरियल अपने चैनल पर दिखाने शुरू किये। भारतीय परिवारों के पास आज भी उन सीरियलों की रिकॉर्ड की गई वीडियो कैसेट मिल जाएंगी। भारतीय मूल के परिवारों में हिंदी का माहौल पैदा करने में इन दो महत्वपूर्ण सीरियलों का योगदान कभी नहीं भुलाया जा सकता।
ज़ी. टीवी का आगमन इंग्लैण्ड में हिंदी के लिए एक महत्वपूर्ण घटना माना जा सकता है। अब उन घरों की दीवारें भी हिंदी सुन सकती थीं जहां पहली, दूसरी या तीसरी पीढ़ी या तो अपनी मातृभाषा में बातचीत करती थीं या फिर अंग्रेजी में। भारत में भी हिंदी फ़िल्में मुख्यधारा की फ़िल्में मानी जाती हैं तो अन्य भाषाओं की फ़िल्में केवल क्षेत्रीय सीमाओं में बँधकर रह जाती हैं। फिर मराठी, गुजराती, पंजाबी, हरियाणवी, आदि भाषाओं की आम फ़िल्मों का स्तर भी कुछ विशेष अच्छा नहीं होता। इसलिए भी ज़ी. टीवी के लिए यह एक महत्वपूर्ण पल था और उनके सामने कोई प्रतियोगी भी नहीं था। लेकिन एक बात देखी गई कि भारतीय मूल के ब्रिटिश बच्चे बॉलीवुड की फ़िल्मों में तो रुचि रखते हैं वहीं टेलीविजन सीरियल क्योंकि लम्बे खिंचते जाते हैं, यहां के बच्चे उनसे कतराते हैं।
हिंदी की मूलभूत समस्या यह भी है कि भारत में ही उसको उसका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। विदेशों में अब तक हुए सभी विश्व हिंदी सम्मेलनों में एकमत से यह प्रस्ताव पारित किया जाता रहा है कि "हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए।" किसी भी भाषा के साथ इससे बड़ा मज़ाक हो ही नहीं सकता जो भाषा किसी देश की संसद की भाषा बनने के काबिल भी नहीं मानी जाती, उसे संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा क्यों और किसके लिए बनाया जाए। जब कोई भूतलिंगम या श्रीनिवासन संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व करेगा तो उसे स्वयं ही हिंदी भाषा समझ नहीं आएगी। तो फिर यह नाटक किसके लिए कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनाया जाए। उसे वहां सुनेगा कौन? जब भारतीय मूल के लोग अपने बच्चों को भारत यात्रा पर लेकर जाते हैं तो बच्चे यह देख कर हैरान हो जाते हैं कि भारत में उनके समव्यस्क हिंदी बोलना छोटेपन का द्योतक मानते हैं। वहां का युवावर्ग इंग्लैण्ड के युवाओं से अधिक अंग्रेज़ीदां है।
यह पूछना एक फ़ैशन सा भी बन गया है कि यदि जापान और जर्मनी बिना अंग्रेज़ी के आर्थिक ऊंचाईयों तक पहुंच सकते हैं, तो फिर भारत में हिंदी की इतनी दुर्दशा क्यों। भारत एक विशाल देश है जिसकी एक भाषा कभी भी नहीं रही। हिंदी कभी भी भारत में राजकाज की भाषा नहीं रही है। यह कभी संस्कृत थी तो कभी फ़ारसी तो कभी उर्दू। और आज यह स्थान अंग्रेज़ी के हिस्से में है। इसलिए यह प्रश्न एक प्रकार से बेमानी सा हो जाता है। जो भाषा कभी भी पूरे भारत की भाषा नहीं रही, वो भला जापानी या जर्मनी भाषा का मुक़ाबला किस प्रकार कर सकती है। कहीं-कहीं ग़लतफ़हमी यह भी है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है। वास्तविकता यह है कि हिंदी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया था और जब तक हिंदी पूरी तरह से कामकाज के काबिल नहीं बन जाती राजकाज का काम अंग्रेज़ी में भी किया जाएगा। यह "अंग्रेज़ी में भी" आजतक "अंग्रेजी में ही" बना हुआ है। भारत सरकार पचपन वर्षों में भी हिंदी को इतना सक्षम नहीं बना पाई है कि राजकाज का काम हिंदी में किया जा सके। "अंग्रेज़ी में भी" के स्थान पर सरकारी काम काज "हिंदी में भी" करवाया जाता है।
एक उदाहरण अपने घर से भी देना चाहूंगा। मेरी गुजराती पत्नी मेरे छोटे पुत्र से (जिसका जन्म लंदन में ही हुआ था) गुजराती में बात करती है। मेरा पुत्र उसे हिंदी में जवाब देता है लेकिन मेरी ओर देखते ही अंग्रेजी में बात करने लगता है। है न ख़ासी दिलचस्प स्थिति!

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