ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
भारतवंशियों के दंश और पीड़ा को समझना होगा
CATEGORY : बातचीत 01-Nov-2016 12:00 AM 2677
भारतवंशियों के दंश और पीड़ा को समझना होगा

भारतवंशी संस्कृति की अध्येता साहित्यकार प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी से आत्माराम शर्मा की बातचीत

हिंदी यूनिवर्स फाउंडेशन, नीदरलैंड की अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार प्रो. डॉ. पुष्पिता अवस्थी का जन्म कानपुर में हुआ। राजघाट, वाराणसी के प्रतिष्ठित जे. कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन में आपकी शिक्षा हुई। 1984 से 2001 तक आप वसंत कॉलेज फ़ॉर विमैन के हिन्दी विभाग की अध्यक्ष रहीं। सूरीनाम में आयोजित सातवें विश्व हिन्दी सम्मेलन का आपने सफलतापूर्वक संयोजन किया। इनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं - कविता-संग्रह : शब्दों में रहती है वह, भोजपत्र, अक्षत, ईश्वराशीष, हृदय की हथेली, अंतध्र्वनि, देववृक्ष, शैल प्रतिमाओं से, तुम हो मुझमें तथा गर्भ की उतरन। सूरीनाम देश पर हिंदी में प्रथम उपन्यास : छिन्नमूल। कहानी संग्रह : गोखरू, तथा जन्म। विभिन्न साहित्यिक विभूतियों पर आपने डॉक्यूमेंटरी फिल्मों का निर्माण किया। दुनियाभर के भारतवंशियों व अमर इंडियन जनजातियों पर आपकी अध्ययन व विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्धि है। जापान, मॉरिशस, अमेरिका, इंग्लैंड सहित अनेक यूरोपीय और कैरिबियन देशों में काव्य-पाठ किया। प्रस्तुत है दुनियाभर में बसे भारतवंशियों तथा उनके बहुचर्चित उपन्यास "छिन्नमूल" के बारे में हुई विस्तृत बातचीत के सम्पादित अंश :


हिन्दी साहित्य में प्रवासी का वर्गभेद प्रसिद्धि पाने की एक नयी श्रेणी मानी जा रही है। इसी क्रम में हिन्दी की संगोष्ठियों में अंतर्राष्ट्रीय शब्द लगाकर आत्ममुग्धता से प्रचारित करने का चलन बढ़ा है?
प्रवासी साहित्य और रचनाकारों के नाम तो यहां, वहां, जहां-तहां-परोसे और उछाले जाते हैं लेकिन प्रवासी साहित्य के नाम पर क्या और किस तरह लिखा जा रहा है इस पर चाहकर भी गंभीर चर्चा नहीं हो पा रही है। क्योंकि चर्चाएं प्रायोजित हो रही हैं और उनके लक्ष्य भी दूसरे हैं। भू-मंडलीकरण के स्वप्निल आग्रह के इस भीषण दौर में वैश्विक हो जाने का नशा हरेक पर सवार है। "प्रवासी" और "अंतर्राष्ट्रीय" शब्द साहित्य के बाजारवाद के लिये नवागत है इसलिए प्रमादी आकर्षण है। इसके वजूद की ताकत अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है। इसे ऐसे समझें कि जब उत्तर भारत का कोई नागरिक दक्षिण भारत में जाकर वहां के अनुभव पर लिखता है तो उसे प्रवासी साहित्य के रूप में क्यों नहीं महत्व मिलता है? और वह इस रूप में क्यों नहीं प्रचारित होता है? जबकि उस पर यदि गंभीरता से विचार-विमर्श हो तो देश के द्वि-पाट होने की दूरी मिटेगी। संस्कृतियों में तादात्म्य स्थापित होगा। सिर्फ उत्तर भारत में इडली-दोसा बन जाने या दक्षिण भारत में पूरी-कचौड़ी बन जाने से ही प्रवासी संस्कृति का विनिमय नहीं हो जाता है। अपने देश के भीतर लिखे जा रहे प्रवासी साहित्य की प्रवासी साहित्य के प्रचारकों को इसकी चिन्ता नहीं दिखायी देती है। इतना ही नहीं- बांग्लादेश, नेपाल, अरब देशों, ईरान-ईराक, इजराइल - मेरा मतलब है कि भारत के पड़ोसी देशों और मुस्लिम देशों में भी प्रवासी भारतीयों द्वारा साहित्य लिखा जा रहा है पर वह भी प्रवासी साहित्यकारों के चिन्तन में उस तरह शामिल नहीं है। इस उपेक्षा को देखते हुए कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि जैसे वह विदेश ही न हो। क्यों, सिर्फ इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा और यूरोप के कुछ देशों के साहित्यकारों और साहित्य को ही प्रवासी साहित्य के रूप में समझा-विचारा जाता है। क्या विश्व में सिर्फ यही देश है जहां प्रवासी भारतीय रहते हैं? और प्रवासी साहित्य लिखा जा रहा है?
विश्व-व्यवसाय में जिस तरह से "बहुराष्ट्रीय" शब्द का उपयोग होता है। वैश्विक साहित्य के संदर्भ में इसी तरह से अंतर्राष्ट्रीय शब्द प्रचारित है। विश्वविद्यालयी स्तर के सम्मेलनों के लिये भी यूजीसी ने भी कुछ नियम बनाये हैं कि संस्थाओं को अपने यहां अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने अनिवार्य हैं इसलिए भी वे इस तरह के सम्मेलन रचाते रहते हैं लेकिन दुर्भाग्य से इसमें भी वही लोग पहुंच पाते हैं जो संपर्क समीकरण में पारंगत होते हैं। ऐसे में यूजीसी का सपना कुछ सीमा तक धरा रह जाता है क्योंकि वह इस तरह के सम्मेलनों के माध्यम से चाहता है कि भारत के विश्वविद्यालयों के वहां के चिन्तकों और प्रोफेसरों की ख्याति विदेशों तक पहुंचे। पर ऐसा नहीं हो पाता है, लोग भारत के साधनारत स्वाभिमानी प्रोफेसरों के नाम तो दूर, विश्व विद्यालयों के नाम तक को नहीं जान पाते हैं, जबकि हर विश्वविद्यालय से लाखों की संख्या में विद्यार्थी मास्टर और पी.एचडी. की डिग्री लेकर विदेशी कंपनियों में दस्तक देते हैं। उच्चांक होने पर भी विश्वविद्यालय की विशेष पहचान न होने की असफलता के बाद फिर वे अपनी काबलियत के आधार पर ही सफलता का रास्ता तलाशते हैं। यह दुखद और चिंतनीय है।
सच्चे अर्थों में भारतवंशी साहित्यकार किसे कहेंगी?
दुनिया के भारतवंशी बहुल देशों- फीजी, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, युगांडा, केनिया, गयाना, सूरीनाम, ट्रिनीडाड, फ्रेंचगयाना देशों और इधर की दो पीढ़ियां जो इंग्लैंड, अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और कैरीबियाई देशों में जन्म लेकर अपना जीवनयापन करते हुये लेखन कर रही हैं। असल में इनके पुरखे 1834 से लेकर 1916 ईसवी के बीच डच,ि ब्रटिश, फ्रेंच कोलानाइजरों द्वारा कुली, किसान, मजदूरों के रूप में विश्व के कोने-अतरों और अविकसित देश-द्वीपों में मानव मशीन के रूप में स्थापित किये गये, जहां उन्होंने अपने को पेरते हुये गन्ना की खेती और व्हाइट गोल्ड की समृद्धि से इन्हें सम्पन्न किया। यूरोप को यूरोप बनाने में हमारे भारतवंशियों की अहम् भूमिका है। उनके संघर्ष की दारुणगाथा का इतिहास है। जिसकी परछाई तब से लेकर अब तक की पीढ़ियों में दिखायी देती हैं। पीड़ा की दास्तान पीढ़ियों की आत्मा में बसी रहती है। विश्व में बसी हुई ऐसी पांच पीढ़ियों के द्वारा कविता, दोहा, लोकगीत, नाटक, किस्से, कहानी और उपन्यास के रूप में जो लिखा जा रहा है वह ही भारतवंशी साहित्य है। जिसमें हिन्दुस्तान बनाम भारतीय संस्कृति के राग की धुन सुनायी देती है। पीढ़ियों से विदेशों में रहते हुए घर, जमीन, जायदाद, व्यवसाय की सुदृढ़ नींव रखने के बावजूद वह अपने को भारतीय संस्कृति में पगा हुआ ही मानते हैं। अभी भी अपने पुरखों के संघर्ष की याद में उनका कलेजा सिहर उठता है। पीड़ित प्रताड़ित तन-मन के आर्तनाद और चीत्कार की व्यथा-कथा ही इनके साहित्य में स्पंदित रहती है। विदेशी और पाश्चात्य संस्कृति से अनाकर्षण के किस्से और भारतीय संस्कृति के मोह से रचे हुए साहित्य को रचने वाला साहित्यकार ही भारतवंशी साहित्यकार हैं सच्चे अर्थों में।
प्रवासी और भारतवंशी साहित्य के वर्गभेद को आप किस नजर से देखती हैं?
भारत वस्तुत: भारतवंशियों में बचा है। भारत से बाहर निकलकर भी वे भारतीय संस्कृति, धर्म-कर्म और हिन्दी भाषा को बचाये हुए हैं। विदेशों में पीढ़ियों से रहते हुए भी वे स्वदेश बचाये हुए हैं, क्योंकि वह उनके संस्कारों के रक्त में, जीवन की आचरण-संहिता में बसा हुआ है। खान-पान, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहारों में उनका जीवन रसा-पगा है। वे विदेशों में हिन्दू-मुसलमान के रूप में बंटकर नहीं बल्कि भारतीय होकर साथ रहते हैं। भारत से बाहर वे पहले हिन्दुस्तानी हैं। उनके साहित्य में भारतवंशी गुण-धर्म और अस्मिता का अस्तित्व दिखाई देता है। भारतवंशी साहित्य में भारतीय संस्कृति दर्शन और भारतीयता के प्रति आत्मीयता की लगन दिखायी देती हैं। वे फ्रांस, हॉलैंड, अमेरिका, कैरीबियाई देशों में रहते हुए भी हिन्दुस्तानी बोली-बानी में संवाद करते हैं, उन्हें यूरोपीय देशों के नागरिकों के बगल में खड़े होकर अपनी हिन्दी या हिन्दुस्तानी जबान में बात करते हुए शर्म नहीं महसूस होती है। क्योंकि जैसे नीदरलैंड के नागरिक के लिये डच उसकी अपनी मातृभाषा है। फ्रांस के लिये फ्रेंच वैसे ही उसके लिये हिन्दी उसकी महतारी भाषा है। वह उसे महतारी भाषा के रूप में सीखते हैं और विदेश में बसे हुये भी और कोई भी पढ़ाई करने वाले (तकनीकी, बिजनेस, विज्ञान, डॉाक्टरी) भी हिन्दी भाषा अवश्य सीखते हैं। हिन्दी उनके धर्म, कर्म, जन्म और जीवन की भाषा है।
जबकि प्रवासी नागरिक और साहित्य की एकदम भिन्न स्थिति है। वह बिलकुल इसके विपरीत ध्रुव पर है। प्रथमत: तो वे भारत में पैदा हुए हैं। उनके घर, परिवार, रिश्ते-नातेदारी सब भारत में यथावत शेष और सुरक्षित हैं। वे पढ़ने, व्यवसाय या नौकरी के लिए विदेश जाते हैं और वहां के मोह से ग्रस्त होकर वहीं बस जाते हैं। इसलिए अपनी जड़ों से कटने और बिछुड़ने का दर्द उनके यहां इतना भीषण नहीं होता हैं। वे अपनी इच्छा और जुनून से विदेश जाते हैं और बसते हैं जबकि भारतवंशी वहां जबरदस्ती और विवशता का शिकार होकर ले जाये गये थे।
प्रवासी साहित्यकार का जीवन भारतीय और हिन्दी संस्कृति को एक सीमा तक जी चुका होता है। उसके लिये साहित्य लिखना न तो उस तरह दुसाध्य है और न ही मुश्किल। जबकि भारतवंशी को भारतीयता और हिन्दुस्तानी समाज और संस्कृति का देशकाल अपनी पीढ़ियों के लिये भी रचाना होता है और अपने सृजन धर्म के लिये भी उसे हिन्दी सिरे से सीखनी होती है और साहित्य उत्कर्ष के लेखन तक अपने रचनाकर्म में हिंदी भाषा साधनी पड़ती है।
प्रवासी साहित्यकार खुद को विदेशी साहित्यकार कहलाने में गौरवान्वित अनुभव करता है। जबकि विदेशों में पीढ़ियों से बसे हुए भारतवंशी रचनाकार अपने को हिन्दुस्तानी और भारतीय कहलाने के लिये ललकता रहता है। भारतवंशी साहित्यकार के साहित्य में भारतीय संस्कृति, दर्शन और प्राचीन धर्म के प्रति लगाव दिखाई देता है। जबकि प्रवासी साहित्यकार के साहित्य में विदेशी जीवन संस्कृति के वर्चस्व की झलक मिलती है। इस तरह प्रवासी भारतीय साहित्यकार अपनी रचनाओं में भारतीय होकर भी विदेशी दिखता है तो भारतवंशी साहित्यकार अपने साहित्य में पीढ़ियों से विदेशी होकर भी स्वदेशी, भारतीय और हिन्दुस्तानी लगता है। और यह वर्गभेद एक चौंकाने और विस्मित तथा स्तब्ध कर देने वाला विसंगतिपूर्ण वर्गभेद है।
सोशल मीडिया पर जिस तरह हिन्दी-सम्वाद बढ़ रहा है, उसे किस नजर से देखती हैं?
हिन्दी-सम्वाद जहां भी मुझे दिखाई और सुनायी देते हैं। प्रसन्नता होती है। क्योंकि इससे हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रसार के आसार नजर आते हैं।
किताबें पाठकों तक नहीं पहुंच रही है या पाठकों ने किताबों को भुला दिया है?
पुस्तकें पाठकों के लिये ही होती है। लेखक के बाद वही उसके वास्तविक वारिस हैं। जितना यह सच है कि किताबें पाठकों तक पहुंचना चाहती हैं उतना ही यह भी सच है कि पाठक पुस्तकों तक पहुंचना चाहते हैं। भारत के पुस्तक मेलों में यह सच्चाई व्यापक रूप से उजागर होती है। ऑनलाइन पुस्तकों के आर्डर भी इसका उदाहरण है। विदेशों में पुस्तक छपने के साथ ही वैश्विक स्तर पर प्रकाशकों द्वारा ऑनलाइन प्रचार होता है। प्रकाशित होने के साथ ही वह एक साथ प्रकाशकों की दुकानों पर उपलब्ध रहती है। विदेशों में पुस्तकों के खरीददार दूसरे देशों और शहरों के प्रकाशक और एजेंसियां होती हैं। जो वस्तुत: पुस्तकों की विक्रेता होती हैं। जहां उस इलाके के सामान्य पाठक खरीद सकते हैं। इसके साथ-साथ विदेशों में विशेषकर यूरोपीय देशों में गांव से लेकर महानगरों के अनेक स्थलों पर लगने वाले बाजारों में कई पुरानी पुस्तकों की दुकानें भी लगती हैं। जहां 15 यूरो से ऊपर की किताबें 2 से 5 यूरो में उपलब्ध हो जाती हैं। इसमें पाठक अपनी पढ़ी हुई किताबें बेंच देते हैं और उस राशि को जोड़कर दूसरी किताबें खरीद लेते हैं जो उन्होंने नहीं पढ़ी हैं और पढ़ना चाहते हैं। कोपेनहेगन डेनमार्क के एअरपोर्ट पर मैंने देखा- कई किताबें ऐसी रखी थीं जिसे लोगों ने पढ़कर वहीं दूसरों के पढ़ने के लिये छोड़ दिया था। इसके अलावा विदेशों में बगीचे की दुकानों में फलों, फूलों और रसोई की किताबें बिकती हुई मिल जायेंगी। इसी तरह अन्य विभागों और क्षेत्रों में भी किताबों का प्रभुत्व है और वह सामान्य जीवन में रस्मो-रिवाज की तरह रची-बसी हुई है। मित्रों, बच्चों और प्रेमियों को उपहार स्वरूप पुस्तकें भेंट करने का चलन चरम पर है। क्योंकि वह स्थायी उपहार है। इसलिए स्पष्ट है कि पाठकों ने किताबों को नहीं भुलाया है।
दरअसल, किताबों और पाठकों के बीच में प्रकाशक है जिसने अपने पाठकों की जरूरत को भुला दिया है। प्रकाशक को सिर्फ अपनी जरूरतें याद रहती हैं इसलिए उसने प्रकाशन को व्यापार में बदल दिया है। प्रकाशन तंत्र व्यवसाय और कमाने के धंधे में तब्दील हो गया है। लेकिन, व्यवसाय पाठकों के साथ नहीं हो सकता है। व्यवसाय को सिद्ध करने वाले माध्यमों ने प्रकाशकों की नियति पर अधिकार कर लिया है। और इससे ही प्रकाशन संचालित होता है इसलिए किताबें पाठकों तक नहीं पहुंच पा रही है।
हिन्दी के प्रकाशकों ने सरकारी खरीद के षड़यंत्र को बढ़ावा दिया है?
पूर्णरूपेण सहमत हूं। मात्र कुछ छुटभैये प्रकाशकों को छोड़कर, पर यह उनकी मजबूरी है क्योंकि वहां तक उनकी पहुंच नहीं है।
हिन्दी लेखक रायल्टी को लेकर प्रकाशक को कटघरेे में खड़े करता है तो प्रकाशक किताब न बिकने का रोना रोता है।
हिन्दी का लेखक विश्व का सबसे दयनीय और विवश लेखक है। उसे अपने लेखन की प्राय: नहीं के बराबर रायल्टी मिलती है उसमें भी कुछ ही भाग्यशाली लेखक हैं इसलिए यदि कोई लेखक रायल्टी के लिये प्रकाशक को कटघरे में खड़ा करता है तो उचित ही करता है लेकिन यह भी कंगाली में आटा गीला करने की तरह है। क्योंकि प्रकाशक से रायल्टी हासिल कर लेना टेढ़ी खीर है। अस्सी-चौरासी के बीच की बात है- जनवादी लेखक संघ के वार्षिक अधिवेशन के मंच से कवि नागार्जुन ने अपनी कृतियों की रायल्टी की गुहारें लगायी थी। पर बाद में प्रो. चन्द्रबली सिंह (अध्यक्ष-जनवादी लेखक संघ) से पता चला कि उसका कुछ नहीं हुआ।
लेकिन प्रकाशक जो किताब न बिकने का रोना रोते हैं वह सिर्फ घड़ियाली आंसू हैं। पिछले पच्चीस वर्षों के प्रकाशकों की समृद्धि और जीवन-स्तर का आकलन करें तो सब स्पष्ट हो जायेगा। सच्चाई, मुझसे या किसी लेखक से जानने की जरूरत नहीं है। खुली आँखों देखें तो दूध-का-दूध, पानी-का-पानी स्वयं अलग-थलक दिखेगा।
लेकिन विदेशी भाषा के लेखकों के साथ ऐसा नहीं है। यदि उनकी पाण्डुलिपि को प्रकाशन के संपादक मंडल द्वारा स्वीकृति मिल जाती है तो सर्वप्रथम वह अपने और लेखक के बीच कान्ट्रेक्ट बनाता है। रायल्टी देता है और अन्य संस्करणों की बिक्री के आधार पर लेखक के एकाउंट में रायल्टी देता रहता है और उसे ई-मेल से समय-समय से हिसाब सूचित करता रहता है। विविध कार्यक्रमों में आमंत्रित करते हैं। गेट-टु-गेदर आयोजित करते हैं। इस तरह प्रकाशक लेखकों और पाठकों के बीच एक तरह की निकटता का माहौल बनाते हैं जिससे प्रकाशक और लेखक दोनों की छवि बनती है। नीदरलैंड में एक "लिबरिस" नाम का प्रकाशक है जिसकी अम्स्टर्डम के हवाई-अड्डे तक में विशाल दुकान है और वह हर वर्ष पचास हजार यूरो का लिबरिस पुरस्कार देता है जो सच्चे अर्थों में योग्य लेखक को ही प्रदान किया जाता है। गत दस वर्षों से मैं इस पुरस्कार की साक्षी हूं।
आपके कथा-साहित्य और उपन्यास में भारतवंशियों के दर्द और दंश का बखूबी चित्रण होता है। इतिहास में द्वन्द्व और आधुनिक संदर्भ का संतुलन करना पड़ता है अथवा इसे सृजन की सहज प्रक्रिया का हिस्सा माना जाये?
भारतवंशियों के दर्द और दंश दोनों को मैंने अपनी चेतना की रगों में महसूस किया है। सूरीनाम, गयाना और ट्रिनीडाड देशों के भारतवंशियों की चार पीढ़ियों के जीवन से मेरा बहुत गहराई से गुजरना हुआ है। उनकी जीवन-संस्कृति को मैंने अपने को लगाकर महसूस किया है। इसलिए उस वर्णन में आप दस्तावेजी जीवंतता अनुभव करेंगे।
इतिहास का द्वन्द्व और आधुनिक संदर्भ में संतुलन किसी भी कृति की मूल पूंजी और विभूति होती है। आधुनिक संदर्भों को जो लेखक जितनी तन्मयता से आत्मसात कर लेता है उतनी ही दत्तचित्तता और जीवंतता के साथ वह इतिहास के ऐतिहासिक द्वन्द्व को अपनी कृति में विन्यस्त करने में सफल रहता है। और यह सब बहुत ही स्वत: ढंग से लेखन के अपने प्रवाह में घटित होता है। इस धारा के प्रवाह का भगीरथ स्वयं लेखक होता है और कृति ही उसकी भागीरथी हो जाती है। मेरे लेखन में समय का ऐतिहासिक द्वन्द्व और आधुनिक संदर्भ अपने यथार्थ रूप में उद्घाटित हैं। सच्चाई को सच की तरह ही कहा जा सकता है और तभी वह सर्वमान्य और सार्वकालिक हो पाती है।
छिन्नमूल उपन्यास में कोई सुचिंतित कथाक्रम न होने पर भी घटनाएं और ब्यौरे इतने सुगठित हैं कि पठनीयता प्रभावित नहीं होती है- क्या कहेंगी?
उपन्यास में घटनाएं और ब्यौरे सुगठित हैं तो कहीं-न-कहीं वह सुचिंतित कथाक्रम का ही परिणाम है लेकिन इस उपन्यास "छिन्नमूल" का कथाक्रम उन पारम्परिक अर्थों में कथानक नहीं है जहां नायक या नायिका के इर्द-गिर्द घटनाओं का वात्याचक्र घुमड़ता रहता है।
इस उपन्यास का नायक सूरीनाम देश है और उसके प्रमुखत: नायक हिन्दुस्तानी नागरिकों का छिन्नमूल होने का संत्रासयुक्त दंश, संघर्ष ही नायकत्व को प्राप्त किये हुए हैं। सम्पूर्ण कथाचक्र हिन्दुस्तानियों की अपनी मातृभूमि हिन्दुस्तान (भारत) से उखड़ने और उजड़ने के बाद वे स्वयं को अपनी मातृभूमि से ही उच्छिन्न हुआ नहीं अनुभव करते हैं बल्कि अपनी पीढ़ियों के जीवन में सांस्कृतिक परिवर्तन को देखकर ऐसा महसूस करते हैं कि वे अपनी मातृभूमि और मातृसंस्कृति के मूल से भी जैसे कि विछिन्न हो गये हैं। दूसरे देश के सांस्कृतिक परिवेश के रसायन में पड़ा हुआ जीवन वस्तुत: अपने अस्तित्व के सत्व को बचाने में असफल ही रहता है और इस असफलता की पीड़ा बहुत मारक होती है जिसमें तन-मन तो दूर आत्मा तक बिलख उठती है। छिन्नमूल होने की पीड़ा बहुत भयानक है। इसे भुक्तभोगी ही महसूस कर सकता है।
"छिन्नमूल" होने की यातना को अपने कथाक्रम में समेटे हुए यह एक संवेदनशील कलेवर में लिपटा हुआ उपन्यास है। इसलिए कई पात्र अपने समाज और संस्कृति के प्रतिनिधि बनकर उपन्यास विकास में अपनी भूमिका दर्ज करते हुये "छिन्नमूल" की सार्थकता को पूरी कसक के साथ प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि इसकी पठनीयता अंत तक रोचक बनी रहती है।
उपन्यास में भारतवंशियों के बारे में इतनी शिद्दत के साथ और इतने अधिकार के साथ लिखा गया है कि वह उस वक्त, उस स्थान का दस्तावेज ही प्रतीत होता है। कैसे इसे संभव किया?
लेखक को अपने समय, समाज और संस्कृति के प्रति पारदर्शी और ईमानदार होना चाहिए। कोई भी घटना, जिस तरह से समाज और संस्कृति के समय के भीतर घटित होती है उतना ही वह लेखक द्वारा रचित साहित्य के समय में भी दर्ज होती है। इसलिए उसे भी उतनी ही तीव्रता और सत्यता के साथ लेखन में घटित होना चाहिए। समाज को, संस्कृति को साहित्य के समय में घटित करवाने वाला लेखक एक चौकन्ना माध्यम होता है। समाज, संस्कृति और परिवेश सब कुछ लेखक के चित्त और चेतना के भीतर से गुजरकर भाषा के माध्यम से सबका, सबके लिये हो पाता है। मैंने भारतवंशियों की पीढ़ियों के बीच, उनके सामाजिक संघर्ष और उनके सांस्कृतिक उत्सवों के बीच वर्षों तलक अपना समय गुजारा है। उनकी विकास यात्रा की साक्षी रही हूं। उनके जीवन के संघर्ष, सुख और दु:ख दूसरों के लिये किस्से हो सकते हैं पर मेरे लिए वह हकीकत है क्योंकि वे मेरे अनुभव का हिस्सा है। उनकी बिलखती सांसें, फफकते आंसू, हथेलियों की नमी, मेरी स्मृतियों में अविस्मरणीय ढंग से सुरक्षित हैं। उनकी पीड़ा की दस्तानें मेरी चेतना की पर्तों में लिखी हुई हैं। इसलिए उनमें दस्तावेजी सच्चाई होना स्वाभाविक है। इसके अलावा लगन और समर्पण की साधना भी तो सदियों में अपनी कारगर भूमिका निभाती है।
उपन्यास में लेखन से जुड़ी तमाम वर्जनाओं को सिरे से नकारा है और यौन से जुड़े विषयों पर भी बिन्दास लिखा गया है। पढ़कर लगता है कि यह आसान नहीं है। उपन्यास की यह भी एक खूबी है, हिन्दी का पाठक इस पर कैसी प्रतिक्रिया देगा?
मैंने प्रकृति और संस्कृति का समान दृष्टि से अवलोकन और विश्लेषण किया है। जितना ही मैं भारतवंशी बहुल देशों की प्रकृति की वर्जनामुक्त वर्जिन लैंड होने के सौंदर्य पर रीझी और मुग्ध हुई हूं उतना ही उस समाज की जीवन-संस्कृति से आकर्षित हुई हूं। इन देशों का हिन्दुस्तानी समाज अपने पुरखों की धर्म-संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज को लेकर चलता है। अन्य पर्वों और त्यौहारों के साथ वह शिवरात्रि और हनुमान जयंती तथा हर माह की गणेश चतुर्थी एवं नवरात्रि को उत्सवों की तरह मनाने में मग्न रहता। इन देशों में अभी भी तीन दिन तक विवाहोत्सव होते हैं। देहांत के बाद उनके परिवारजन तेरहवीं तक तौर-तरीकों और हवन-पूजन का निर्वाह करते हैं लेकिन जिस उन्मुक्त समाज के भीतर यह रह रहे हैं, जिनमें चायनीज, जावानीज, इन्डोनेशियन, डच, फ्रेंच, अमेरिकी, यूरोपीय और नीग्रो समुदाय के लोग शामिल हैं, वहां यह अपने परिवार और नयी पीढ़ी को अनुशासित नहीं पाते हैं। वह अपना साथी चुनने और संबंध बनाने के लिये स्वतंत्र हैं। यह उनके अपने जीवन का अधिकार है और निर्णय है। जिसे हिन्दुस्तानी समाज ने भी स्वीकार रखा है।
यूरोपीय देशों में लोग अपना साथी स्वयं चुनते हैं, उनसे संतानें होती हैं। परिवार बनता है। संबंधों में घर आकार  लेता है लेकिन इसके बाद यदि स्त्री किसी अन्य पुरुष को चाहने लगती है तो वह अपने पति से बताकर अलग हो जाती है और दूसरे पुरुष के साथ रहने लगती है। इस पर घर, परिवार, बच्चे समाज और कानून कोई आड़े नहीं आता है और न ही उस स्त्री-पुरुष या उसके बच्चों को कोई हिकारत की निगाह से देखता है। जन्मदिन और क्रिसमस समारोहों में स्त्री अपने पहले पुरुष और बच्चों के बीच अपने वर्तमान साथी के साथ नि:संकोच शामिल होते है।
इस समाज में संबंधों को लेकर छल-कपट और दोगलापन नहीं है। एक पुरुष, एक ही समय में कई स्त्रियों (कार्यालय में या रिश्तेदारी द्वारा) से संबंध नहीं रखता है और न ही ऐसा स्त्रियां ही करती हैं। इसलिए इधर के बीस-पच्चीस वर्षों में कोई महिला-संगठन नहीं उभरे हैं और न ही इन देशों में कोई महिला-दिवस जैसा आयोजन ही होता है। हालांकि कुछ प्रवासी भारतीय आत्ममुग्ध महिलाओं द्वारा यह दिवस आयोजित करना शुरू किया गया है। पर इन देशों को अब इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। स्त्री को पहनने-घूमने की पूरी आजादी है। किसी समारोह या उत्सवों के अवसरों पर वाइन का ग्लास या सिगरेट वहां पर उपस्थित पुरुषों द्वारा पहले स्त्री को आफर किया जाता है। पुरुष अपनी स्त्री को इतने खुलेपन और आग्रह के साथ गेदरिंग में ले जाता है कि वह सर्वाधिक सुंदर, सेक्सी और आकर्षक दिखें। इसके साथ-साथ इन समाज में समलैंगिक संबंधों को समाज और कानून द्वारा पूर्ण स्वीकृति और सम्मान है। यहां का समाज वर्ण, जाति, वर्ग, लिंग, धर्म और संस्कृति भेदभाव से परे हैं।
संस्कृति की वे गाँठे जो स्त्री-पुरुष के संबंधों में बाधक हैं इन देशों ने उन्हें खोल दिया है या फिर काटकर उन्हें अपने से अलग कर दिया है। इन देशों में देह भूख से अधिक जीवन और प्रेम हूक है और यहां सब इसी के लिये समर्पित है। यही कारण है कि इन देशों में किसी भी देश, जाति धर्म और संस्कृति के स्त्री को पुरुष या पुरुष को स्त्री भा जाता है तो फिर वे उसे अपना प्राय: जीवन-साथी बना लेते हैं और जीवन-साथी के सहचरत्व के सुख में वे फिर उसकी जाति, धर्म और संस्कृति के अलग होने का बेसुरा राग नहीं अलापते हैं।
मेरे ख्याल से, जिस तरह से और जो मैंने लिखा है, पाठकों को उसी रूप में उसकी सत्यता की नैसर्गिकता को स्वीकारते हुए उसका पाठकीय और संजीवन सुख उठाना चाहिए। अब देखिए भारत में देह और संस्कृतिगत इतनी वर्जनाएं हैं कि दिल्ली और बम्बई की लोकल बसों में स्त्रियों को अपनी देह को पुरुषों के स्पर्श से बचाने के लिये कुहनियां चलानी पड़ती है यह वे स्वत: सीख जाती हैं। आटो में स्त्री के बगल में बैठा हुआ पुरुष-स्त्री की जांघों और देह का क्षणिक स्पर्श भोगने के लिये अपनी जाँघें ही विस्तारित करता जायेगा जबकि वह भी स्त्री की तरह अपने को समेट और सिकोड़कर बैठ सकता है, पर नहीं। सार्वजनिक जगहों, कार्यालयों, दुकानों में स्त्री के दुपट्टा लेने के बावजूद प्राय: पुरुषों की निगाहें स्त्री के गर्दन के निचले हिस्से पर ही ठहरी रहती हैं। पर विदेशों में स्त्री के प्रति ऐसा घिनौना नजरिया नहीं है। वर्जनाएं और रोक यहां होनी चाहिए पर इस पर किसी का वश नहीं चलता है।
आपके लेखन में भारतवंशी अपने समग्र संदर्भ के साथ उपस्थित होते हैं फिर वे चाहे मॉरीशस हों, सूरीनाम हो या फिर नीदरलैंड के। उनके सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिदृश्य को आप इतनी करीबी से कैसे महसूस कर पाती हैं?
मेरे लेखन में भारतवंशी अपने समग्र संदर्भ के साथ उपस्थित हैं। यह बात आपने बहुत पते की नोटिस की है। मेरी एक शोधात्मक पुस्तक है भारतवंशी भाषा एवं संस्कृति की किताबघर से प्रकाशित इस पुस्तक के अनुसंधानात्मक आलेखों में भी आप पायेंगे कि मॉरीशस, सूरीनाम और नीदरलैंड सहित भारतवंशी बहुल देशों से भाषा और संस्कृति के स्तर पर मेरा वर्षों से सघन रिश्ता रहा है। इन देशों के कवि, लेखकों, लोकगीत गायकों और नाटककारों से घना परिचय रहा है। भारतीय दूतावास और सांस्कृतिक केंद्रों पर इनके कई कार्यक्रम आयोजित किये हैं। इनके गांव, घर और परिवार में भारत की बेटी बनकर संबंध बनाये रखे हुए हैं। तीज-त्यौहारों, विवाह समारोहों, धार्मिक अनुष्ठानें, आर्य समाजी और सनातन धर्म के अनेक वार्षिक और वैश्विक सम्मेलनों में हिस्सेदारी है किसी भी समाज में धँसने और उन सबको अपने भीतर धँसाने के यही सब तरीके हो सकते हैं। इन सबके कारण इन सभी देशों के परिवारों के बुजुर्गों और बच्चों तक के मन का हिस्सा हो चुकी हूं वे अपने पिता मां की तरह हमारी आज भी प्रतीक्षा करते हैं। यही कारण है कि इनके सामाजिक, आर्थिक और नैतिक परिदृश्य को मैं इतने करीब से महसूस कर सकी हूं। और अपने साहित्य में पूरी शिद्दत से उकेर सकी हूं।
उपन्यास में मध्य आयवर्गीय भारतवंशी आबादी की व्यथा-कथा तो है मगर धनकुबेर बने हुये उच्च वर्ग और विपन्नता के लिये अभिशप्त वर्ग की कथा-व्यथा के प्रति लेखकीय चुप्पी चौंकाती है।
जिस चुप्पी का आप उल्लेख कर रहे हैं ऐसी चौंकाने वाली चुप्पी तो नहीं है। हां, उनका वैसा विस्तार नहीं है। अभिशप्त निर्धन वर्ग के कई पात्र हैं- जैसे पीनास उसकी बहन, सुष्मिता के कार्यालय और पड़ोस के कुछ पात्र हैं उसी तरह से वहां के धनकुबेर और राजनीतिज्ञों के भी कुछ चरित्र उद्घाटित हैं। स्कूल, भवन बनवाने के क्रम में शिक्षा मंत्रालय से लेकर सनातन धर्म के ठेकेदारों के चरित्र को उघाड़कर रख दिया है। सूरीनाम के हिन्दुस्तानी समाज के शोषण से खड़े हुए यह ही वहां के धनकुबेर और उच्चवर्ग के लोग हैं। वस्तुत: "छिन्नमूल" के कलेवर भीतर जो कुछ और जितना कुछ जिस तरह से संयोजित होना चाहिए वह अपनी लय और गति के साथ कथावस्तु में विन्यस्त हैं। सिर्फ उसको महसूस करने और गुनने की जरूरत है। पढ़ने और महसूस करने की गति यदि सौ कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से होगी तो जरूर कुछ छूटा हुआ महसूस होगा लेकिन यदि दस कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से अर्थात साइकिल सवारी की गति से उपन्यास के भीतर के चर्तुव्यास को महसूस करते हुए पढ़ा जायेगा तो "छिन्नमूल" सम्पूर्ण से आगे का उपन्यास सिद्ध होगा वैसे इसे समय ही सिद्ध करेगा और प्रसिद्ध भी करेगा।
सूरीनाम के हिन्दुस्तानियों के छिन्नमूल होने की दास्तान का यह करुण, संवेदनशील और जीवंत दस्तावेज है। जो हिन्दी भाषा का ही पहला उपन्यास नहीं है। वरन् डच और सरनामी हिन्दी के बाद किसी भी अन्य भाषा में इतने विस्तार और डीटेल के साथ लिखा गया हिन्दी का पहला उपन्यास है जिसमें एक ओर यदि सूरीनाम का अविच्छिन्न प्राकृतिक सौंदर्य चित्रित है तो दूसरी ओर सांस्कृतिक संघर्ष की यातना की कराह भी वर्णित है।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 10.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^