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भारत की विदेश नीति और भारतवंशी
01-Jan-2016 12:00 AM 1872     

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत की विदेश नीति के सोये हुए समुद्र में नई लहरें पैदा कर दी हैं। अपने डेढ़ साल के कार्यकाल में सैंतीस देशों की यात्राएं करके उन्होंने साबित कर दिया है कि वे चुपचाप बैठे रहने वाले प्रधानमंत्री नहीं हैं। वे दुनिया भर में भारत की छवि चमकाने में लगे हुए हैं। वे चाहते हैं कि दुनिया के बाज़ार में भारत एक मजबूत ब्रौंड बनकर उभरे। दुनिया को भारत की विशेषताओं का पता चले। यह काम आसान नहीं है। छवि रातोंरात में नहीं बनती। उसे बनने में वक़्त लगता है। मोदी जानते हैं कि एक अकेली सरकार यह काम नहीं कर सकती। विदेश नीति को सही दिशा देने और भारत की छवि सुधारने में यदि किसी की सबसे बड़ी भूमिका हो सकती है तो वो हैं दुनिया भर में फैले भारतवंशी। ऐसा नहीं कि मोदी को प्रधानमंत्री बनने के बाद इस सत्य का एहसास हुआ हो। वह पहले से जानते थे कि विदेशों में बसे भारतवंशी भारत के लिए कितनी बड़ी ताकत बन सकते हैं। वर्ष 2002 में हुए गुजरात दंगों की वजह से दुनिया भर में उनकी बड़ी किरकिरी हुई थी। अमेरिका में बसे भारतवंशियों के निमंत्रण पर वर्ष 2005 में मोदी अमेरिका जाना चाहते थे। लेकिन अमेरिकी सरकार ने उन्हें वीजा तक नहीं दिया। वर्ष 2013 में मोदी को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये अमेरिका-कनाडा में बसे भारतवंशियों को संबोधित करना पड़ा था। मोदी पर अमेरिका का यह प्रतिबन्ध वर्ष 2014 में उनके प्रधानमंत्री बनने तक जारी रहा। इसलिए मोदी से ज्यादा भारतवंशियों की ताकत को कौन जानता है। वि?ा भर में आज भारतवंशियों की कुल आबादी दो करोड़ 85 लाख है। इनमें एक तरफ डेढ़-दो सौ साल पहले गए भारतीय मूल के लोग हैं तो दूसरी ओर प्रवासी भारतीय हैं, जो आजादी के बाद रोजगार की तलाश में विदेश गए। अर्थात मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम और ट्रिनिडाड जैसे देशों में रह रहे भारतवंशी अब वहीं के निवासी हो गए हैं। उनकी पांच-छः पीढियां निकल गयी हैं। उन देशों को खड़ा करने में उनकी महती भूमिका रही है। अमेरिका-यूरोप के देशों में सौ साल से अधिक समय से रह रहे लोगों को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका या और देशों से कालान्तर में यूरोप-अमेरिका पहुंचे भारतीय मूल के लोगों को भी इसी श्रेणी में रखना होगा। मॉरिशस, फिजी, सूरीनाम और ट्रिनिडाड में तो उनकी आबादी 40-50 प्रतिशत तक है। इन देशों में भारतीय मूल के लोगों की आबादी एक करोड़ 71 लाख है तो प्रवासी बन कर विदेशों में गए भारतीयों की आबादी एक करोड़ 14 लाख है। दुनिया के कुल 206 देशों में भारतवंशी फैले हुए हैं। हाल के वर्षों में भारत से रोजगार और शिक्षा के लिए विदेश जाने वालों की संख्या में बहुत तेजी से इजाफा हुआ है। आज कोई ढाई लाख छात्र हर साल विदेश पढ़ने जा रहे हैं। इनमें से सवा लाख अकेले अमेरिका जाते हैं। व्यापार और पर्यटन के लिए हर साल कोई डेढ़ करोड़ भारतीय विदेश जा रहे हैं। यानी आज अंतर्राष्ट्रीय आवागमन कहीं अधिक हो गया है। जाहिर है इनमें से हर व्यक्ति भारत का एक ब्रौंड एम्बेसडर है। मोदी इस सत्य से भलीभांति वाकिफ हैं, लिहाजा उन्होंने इस आबादी को अपनी विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण घटक बनाया। कुछ समय पहले तक भारतवंशियों की स्थिति ख़ास अच्छी नहीं थी। नेहरू के जमाने में उनकी तरफ ख़ास ध्यान नहीं दिया गया। नेहरू भारतवंशियों को देश की अंदरूनी राजनीति में शामिल नहीं करना चाहते थे। वे उन्हें यही कहते थे कि वे जहां हैं, उसी देश की तरक्की में हाथ बंटाएं। राजीव गांधी के जमाने तक लगभग यही हाल रहा। उन्होंने फिर भी भारतवंशियों की तरफ कुछ तो ध्यान दिया। भारतवंशियों को लेकर हमारी विदेश नीति में व्यापक परिवर्तन अटल बिहारी वाजपेयी के काल में आया जब प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाने लगा। बाद में विदेश मंत्रालय में उनके लिए एक विशेष विभाग बनाया गया। अमेरिका या यूरोप में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को वहाँ के लोग और सरकारें बहुत ही उपेक्षाभाव से देखती थीं। चूंकि ये लोग याचक बनकर रोजगार के लिए वहाँ जाते थे, कुछ भी कर लेते थे, अपने स्वाभिमान को दबा कर चलते थे, इसलिए वे इन्हें उसी रूप में लेते थे। अनेक बार उन्हें अपमान का कड़वा घूँट भी पीना पड़ता था। वे हमें संपेरों-बाजीगरों का देश समझते थे। भिखारी देश की तरह व्यवहार करते थे। जिसका असर प्रवासी भारतीयों पर पड़ता था। संकट के समय उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं था। वे एक अजीब-सी कुंठा से ग्रस्त रहते थे। प्रवासियों की अगली पीढ़ियां आज भी खुद को दिग्भ्रमित समझती हैं। अमेरिका में तो उन्हें एबीसीडी अर्थात अमेरिका बॉर्न कन्फ्यूज्ड देसीज कहा जाता है। वे अपनी संस्कृति-सभ्यता के लिए आखिर कहाँ देखें, किससे सहायता मांगें? उनके सामने अपनी भाषा, साहित्य, पहनावा, रहन-सहन, खान-पान की समस्या थी। वे किस बात पर गर्व करें? उनके लिए भारत ही एकमात्र आशा की किरण था, है और रहेगा। लेकिन भारत हमेशा ही खुद को पस्त और निरभिमान की हालत में पेश करता था। हमेशा दीन-हीन नजर आता था। ऐसा नहीं कि भारत में कुछ हो ही नहीं रहा हो। लेकिन देश की ब्रौंडिंग ही ऐसी थी। इसी तरह मॉरिशस, फिजी या सूरीनाम जैसे देशों में गिरमिटिया मजदूर बनकर गए भारतीयों की संतानें भी भारत की तरफ अपने पूर्वजों की भूमि की तरह से देखती थीं। उन देशों ने उन्हें एक नागरिकता तो दी थी। लेकिन स्वाभिमान की कमी थी। डेढ़ सौ साल बाद भी वे खुद को वहाँ का मूल निवासी नहीं कह सकते थे। एक अदृश्य खतरा उनके ऊपर लटकता रहता था। वर्ष 2000 में हमने देखा कि किस तरह से फिजी के भारतवंशियों के खिलाफ वहाँ के तथाकथित मूल निवासियों ने दंगे किये थे। और बड़ी संख्या में वहाँ के भारतवंशियों को भाग कर अन्य देशों में शरण लेनी पड़ी थी। तब वहाँ 49 प्रतिशत आबादी भारतवंशियों की थी। आज 40 प्रतिशत से भी कम रह गयी है। केनिया, यूगांडा, सूडान और तंजानिया में रहने वाले भारतवंशियों को भी पिछली सदी के सत्तर के दशक में वहाँ से पलायन करना पड़ा था। यूगांडा में वहाँ के नरपिशाच ईदी अमीन ने तमाम विदेशियों को 55 पाउंड देकर समुद्री जहाज में बिठा दिया था। सदियों से वहाँ बस गए लोग अपनी खेती-बाड़ी, उद्योग-व्यापार, घर-बार छोड़ कर 55 पाउंड के साथ किसी अज्ञात गंतव्य की ओर धकिया दिए गए थे। उन लोगों ने यूरोप-अमेरिका के देशों में शरण ली थी। भारत नहीं लौटे। उनके सामने दो विकल्प थे : या तो स्वदेश लौटते या किसी और देश में जाकर फिर से संघर्ष करते दो जून की रोटी के लिए। उन्होंने स्वदेश न लौट कर अज्ञात देशों में जाकर संघर्ष करना उचित समझा। क्योंकि तब देश की अपनी हालत ठीक नहीं थी। अपनी मेहनत और लगन के बल पर इन्होंने परदेश में अपना मुकाम हासिल किया। ये लोग जहां भी गए, भारतीय संस्कृति को साथ ले गए। उनकी भाषा और संस्कार भी साथ गए। रामायण-महाभारत, गंगा-यमुना और हनुमान चालीसा भी बगल में दबा कर ले गए। अपने-अपने देशों में इन्होंने अपने देवी-देवताओं को स्थापित किया। आखिर ये अपने पितरों की भूमि की ओर न देखें तो किसकी ओर देखें। मोदी प्रधानमंत्री बनते ही भूटान गए, नेपाल गए। वहाँ उनका अप्रत्याशित स्वागत हुआ। उनके भाषणों से लगा ही नहीं कि वे किसी पराये देश में हों। वहाँ के लोगों ने भी उन्हें उसी रूप में लिया। वे बंगलादेश और श्रीलंका भी गए। वे पाकिस्तान भी जाना चाहते थे। वहाँ की जनता को भी उसी तरह से संबोधित करना चाहते थे। लेकिन तब ऐसा नहीं हो पाया। पड़ोसियों के बीच भारत की स्थिति अचानक "बिग ब्रादर' की बजाय बड़े भाई की हो गयी। जो पड़ोस हमेशा हमारे प्रति हिंसक भावों से भरा रहता था, वह अचानक मित्रवत हो गया। उसके बाद न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर, सिडनी के अल्फोंज एरेना, लन्दन के वेम्बले स्टेडियम में उन्होंने जिस तरह से हजारों की संख्या में भारतवंशियों को संबोधित किया, वह अभूतपूर्व था। मेडिसन स्क्वायर के अन्दर और बाहर लगभग 40 हजार की भीड़ को जब वे संबोधित कर रहे थे, चार प्रान्तों के गवर्नर और 40 सेनेटर मंच के आसपास खड़े रहे। अमेरिकी भारतवंशियों के लिए यह अभूतपूर्व गौरव का क्षण था। एक मित्र ने मेडिसन स्क्वायर से सन्देश भेजा, भारत को पहला वि?ा नेता मिल गया है। मोदी साल भर बाद फिर से अमेरिका गए तो उन्होंने कैलीफोर्निया में भारतवंशियों की और भी बड़ी सभा को संबोधित किया। उन्होंने फेसबुक में टाउनहाल सभा की। आत्मवि?ाास से लबरेज नए जमाने के प्रवासी युवाओं को संबोधित किया। उन्होंने कनाडा, मॉरिशस, हेनोवर-जर्मनी, मास्को, सिंगापुर, टोकियो और क्वालालंपुर में भी भारतवंशियों को संबोधित किया। वे जहां भी जाते, भारत के नवनिर्माण में भारतवंशियों के योगदान का आह्वान करते। वे "ब्रोन ड्रेन' की जगह "ब्रोन गेन' की बात कहते। अमेरिका की सभा में उन्होंने कहा कि 19वीं सदी यूरोप की थी, बीसवीं अमेरिका के नाम रही तो इक्कीसवीं सदी एशिया की है। इस तरह उन्होंने युवा भारतवंशियों में नए उत्साह का संचार किया। उन्होंने कहा कि अमेरिका में जब अलग-अलग देशों से आये लोग उसकी तरक्की के भागीदार बन सकते हैं तो दुनिया के 206 देशों में फैले भारतवंशी क्यों अपने एक देश की तरक्की के यज्ञ में अपनी आहुति नहीं दे सकते! वे भारत की तरक्की और आगे बढ़ने की कहानी बयान करते। भारत के साथ उनके अटूट रिश्तों की याद दिलाते। यहाँ तक कि भारत की अब तक की दुरवस्था के लिए जिम्मेदार राजनेताओं को कोसना भी नहीं भूलते। वे हर सभा में आतंकवाद के विरुद्ध भारत की आवाज बुलंद करते। नए भारत के निर्माण के लिए अपनी योजनाओं की जानकारी देना न भूलते। साथ ही उनसे आग्रह करते कि वे जहां भी रहें भारत को न भूलें और भारत के ब्रौंड एम्बेसडर की तरह से काम करें। अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा में मोदी ने कहा कि, वे भारतवंशियों को भारत की विकास यात्रा का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहते हैं। उन्होंने पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मंचों को अपनी चुनाव सभाओं की तरह स्वदेशी मतदाताओं के लिए इस्तेमाल किया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अपने हित में इतना अच्छा इस्तेमाल पहले कभी नहीं हुआ। निस्संदेह मोदी सरकार ने भारतवंशियों के लिए अनेक रियायती घोषणाएं की हैं, लेकिन भारतवंशियो से जो परोक्ष लाभ देश को दीर्घावधि में होगा, उसकी तुलना में ये रियायतें बहुत कम हैं। पूरा वि?ाास है कि भारतवंशियों को लेकर मोदी की मेहनत एक दिन जरूर रंग लाएगी।

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