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भारत के छोटे-बड़े राजदूत विदेशी हिंदी छात्र और राजभाषा हिंदी
01-Sep-2017 10:08 AM 3388     

विदेश में हिंदी की स्थिति कैसी है? और इधर उत्तरी यूरोप की हिंदी के हाल को देखकर कौन-सी खासियतें हैं? विदेश में हिंदी के मामले में वार्ताओं की कोई कमी नहीं है। मेरे अंदर में आवाज़ें एक जैसी नहीं, अलग-अलग किस्म की आवाज़ें गूँज रही हैं।
एक तो यह है कि यूरोप के दर्जनों विश्वविद्यालयों में ऐसे संस्थान और विभाग हैं जहाँ इंडोलॉजी के नाम से भारतीय भाषाएं पढ़ाई जाती हैं। पेरिस के "कॉलेज दे फ्रांस" में सन् 1814 में स्थापित किये गए प्राध्यापक पीठ से लेकर 19वीं सदी के दौरान में यूरोप के विभिन्न राष्ट्रों में पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर तक भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक इतिहास का अध्ययन-अध्यापन आज तक चलता रहा। ऐसा नहीं कि यहाँ के कुछ लोग अपनी ज़ुबान को छोड़कर संस्कृत या हिंदी या दूसरी कोई भाषा बोलने लगे और अपने बच्चों को पढ़ाने लगे। पर दूसरी तीसरी चौथी भाषा के रूप में कुछ लोगों की दिलचस्पी भारतीय भाषाओं की तरफ़ जाने लगी और यहाँ के अकादमिक जीवन में इंडोलॉजी के लिए एक छोटी-सी जगह बनी रही।
यानी भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों के अध्ययन-अध्यापन की परंपरा इधर अब दो सौ साल की है। पढ़ाई भाषा और साहित्य पर आधारित है। पहले संस्कृत पहले स्थान पर होती थी, पर फ्रांस के प्रसिद्ध हिंदुस्तानी के जानकार Garcin de Tacy (1794-1878) के ज़माने से आधुनिक भाषाओं और साहित्य पर भी कुछ हद तक ध्यान दिया गया था। आज़ादी के बाद और खासकर पिछले तीन दशकों में इधर के समाज और फैकल्टीज की तरफ से समकालीन भारत में दिलचस्पी बढ़ती रही और इस मामले में कुलपतियों की तरफ से और अकादमिक समितियों की तरफ से पढ़ाई आगे बढ़ाने की मांग पहले से ज़्यादा सशक्त होती रही।
भारत में जब भी मैं इधर की इस तरह की परंपरा पर बात कर रहा हूँ तो लोग चकित है - यहाँ तक कि विश्वास भी नहीं होता। पर मैं हमेशा कहता हूँ कि जिस तरह से लोग चीनी, रूसी, स्पेनिश या दूसरे किस्म की भाषाएं सीखते हैं, उसी तरह से संस्कृत, बंगाली, उर्दू या हिंदी क्यों नहीं सीखी जाएं?
इसके साथ हम हिंदी राजभाषा या राष्ट्रभाषा की तक़दीर तक पहुँच रहे हैं। पूरी दुनिया में लोग हिंदी सीखने के लिए क्यों नहीं आगे आएं - जिस तरह से चीनी, जापानी, रूसी या दूसरी भाषाएं सीखने के लिए दौड़ते भागते हैं?
कुछ छात्र तो ज़रूर हैं और होते रहेंगे, पर पिछले कुछ साल से इनकी संख्या पूरे यूरोप में कम होती जा रही है। संस्कृत में भी पहले से बहुत कम छात्र आते हैं। जहाँ तक मेरी याद है जब मैं खुद बॉन विश्वविद्यालय (जर्मनी) में पढ़ता था तब हम ऐसे 12 छात्र संस्कृत में एक साल के बाद इम्तेहान लेने आए थे। उस वक़्त से अब तीस साल से ज़्यादा गुज़रे हैं। उसी बॉन विश्वविद्यालय में आजकल संस्कृत के प्रथम वर्ष के छात्र मुश्किल से 2-3 ही होंगे। इधर उप्साला विश्वविद्यालय में भी यही हाल है। हिंदी में मुश्किल से 4-5 छात्र दूसरे वर्ष तक जा रहे हैं। ऐसा क्यों?
मुझे लगता है कि एक तरफ तो हिंदुस्तान पिछले तीस साल में बहुत हद तक ज़्यादा नज़दीक आने लगा है। इंटरनेट पर बहुत सारी और रंगीली तस्वीरें सामने आती हैं। पर्यटकों की संख्या हर साल में बढ़ती जा रही है। बड़े-बूढ़े और नौजवान - हर किस्म और हर उम्र के लोग छुट्टियों में  हिंदुस्तान जाते हैं। हमारा युग भूमंडलीकरण का कहा जाता है। भारत अब दूर नहीं रहा। छुट्टियां मनाने के लिए सब मिलाकर भारत में बहुत अच्छी जगहें हैं। और यूरोप की आबादी, यात्रा करना दूसरे किस्म का खाना खाना और दूसरे किस्म के लोगों से मिलना पसंद करती है।  
यह तो बहुत अच्छा है कि लोग स्वप्रेरणा से पर्यटन के लिए भारत पहुँचते हैं पर सवाल यह है कि क्या मामूली पर्यटक अपनी यात्रा से वापस लौटकर भारत के बारे में ज़्यादा जागरूक बना है या नहीं। क्या यात्री भारत से वापस आकर अपनी यात्रा के उद्देश्य में ज़्यादा ज्ञान प्राप्त करने के लिए दिलचस्पी रखते हैं? कुछ तो ज़रूर रखते होंगे। लेकिन उल्लेख करना होगा कि यह दिलचस्पी ऐसी नहीं है कि बड़ी संख्या में हिंदी पढ़ने के लिए लोग दौड़ पड़ते हों।
पर एक बात तो सही है। पूरे यूरोप के लगभग हर छोटे-मोटे शहर में आजकल हिंदुस्तानी खाना आसानी से मिल जाता है, योग की क्लासेज होती हैं, बॉलीवुड फ़िल्में दिखती हैं और नयी पीढ़ी में होली के नाम से साल में कई बार रंग खेलने की आदत बनती हैं। हालाँकि यह उल्लेख करना ज्यादा उचित होगा कि भारत में होली के त्यौहार और पश्चिमी होली के त्यौहार में काफ़ी अंतर रहता है। एक तरह से कहा जा सकता है कि इधर के नौजवान पूरी दुनिया की परम्पराओं से जो पसंद है वह एक तरह से अपना लेते हैं और इसको लेकर अपनी खिचड़ी पकाते हैं। पर खैर, हो सकता है कि मैं बस इसी उम्र में पहुँच रहा हूँ जिसमें इंसान नयी पीढ़ी की शिकायत करना पसंद करता है।  
एक बात तो निश्चित रूप से कह सकता हूँ। हिंदी के छात्रों की संख्या कम है, पर जो छात्र आते हैं, वे मेहनत ज़रूर करते हैं, दिलचस्पी लेते हैं और दो-तीन साल में अच्छी हिंदी सीख लेते हैं। कहानियां-उपन्यास पढ़ते हैं, दिन-दिन इंटरनेट में हिंदुस्तान की खबरें खोलते रहते हैं, फ़िल्में देखते हैं और चाहे या न चाहे एक तरह से इधर के समाज में हर एक अपनी ही जगह पर भारत के राजदूत बनते हैं। विदेशियों का ऐसा तबका बना है जिसकी ज़िन्दगी और पहचान हिंदुस्तान से जुड़ी है और जुड़ी रहेगी। इस तरह के हज़ारों भारत के छोटे-बड़े राजदूत पूरी दुनिया में फैलकर बैठे हैं।

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