ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
जागृति खबरदार!
01-May-2019 06:12 PM 227     

जागृति दरवाजे पर पीठ टिका कर खड़ी थी। उसके बाएं हाथ में स्टील का एक चमचा था और दायें हाथ में मीट काटने वाला चाकू और वह एकदम सीधा कहीं घूर रही थी। वह एक हिंदू देवी की तरह तैयार खड़ी थी, घरेलू हथियारों से लैस और मार्शल-आर्ट का अभ्यास सा करती हुई। उसकी बाहें टुकड़े-टुकड़े करने के लिए तैनात थीं : बेहतर था कि उसकी पहुँच से दूर रहा जाए। लेकिन यह लंबी गर्मियों का कोई ततैया नहीं था जिसने जागृति का ध्यान आकर्षित किया था। वह ट्रॉपिकल फलों के तमिल-चार्ट घूर रही थी जो रसोई घर की बड़ी ओक-मेज पर पड़ा हुआ था। उसने फलों की आकृतियों का अध्ययन किया और उनके स्वाद की अपने जीवन के नक़्शे के रूप कल्पना की। कच्चा आम जो वह थी, गूज़बैरी और लीची जो वह होने वाली थी और पीले रंग का धब्बेदार पहाड़ी केलों का गुच्छा, जो वह बन जायेगी। फलों का, शरीर के आकार की उसकी धारणा के साथ कोई लेना-देना नहीं था। वास्तव में वह अपने आकर्षण से अच्छी तरह परिचित थी और लंबे समय से छोटी प्रतीक्षित ख़ुराक ख़ुद को देने के लिए अधिक वांछनीय महसूस कर रही थी।
जागृति, जिसके नाम का मतलब "जागरूकता" अथवा "जागरण" था, सोच रही थी कि आज वह किस हाल में है। उसके नारीत्व की कलियाँ स्वयं की खोज की खतरनाक यात्रा के बाद खिली थीं। यह मज़ेदार बात है कि जब वह भारत में थी, काफ़ी अंग्रेज टाइप थी, जहाँ वह पैदा हुई, पढ़ी और काम किया। यही कारण है जिसने, "आगे की पढ़ाई" के लिए इंग्लैंड के लिए आने के लिए उसे प्रेरित किया था, जैसा कि भारत में लोग कहते हैं। क्या आगे की पढ़ाई से आत्म-निर्वासन की तरफ एक क़दम था या समय के साथ खेल अधिक था?
उसने किसी भी चुने हुए व्यक्ति से शादी न करने का फ़ैसला किया था जिसे, जैसा वह कहती थी - मवेशी बाज़ार से लाया गया हो। वह हंसी से दोहरी हो गई थी जब उसने ऐसे आदमी की कहानी सुनाई जिसका फ़र्ज़ी नाम उसने "ललित प्रस्ताव" रखा था। बहुत से ललित प्रस्तावों में से उसकी सबसे पसंदीदा कहानी उसे उस गंजे आदमी से मिली थी जो आकर्षक लग सकता था यदि वह अपने बिजनेस-मैनेजमेंट कोर्स के द्वारा नहीं बनाया गया होता।
यह सन् 1980 था। वह मद्रास में जागृति के पारिवारिक घर में आया था, जिसे तब चेन्नई के रूप में जाना जाता था। यह दिसंबर का एक उमस भरा दिन था। हालांकि दोपहर में 3.30 पर समुद्री-हवा चला करती, उस वर्ष मद्रास में मनाली तेल-रिफ़ाइनरी से गैस लीक हुई थी तो हवा घातक रसायन की मीठी गंध से सुगंधित होती थी। जागृति के लिए यह एक शगुन की तरह था। उसके माता-पिता क्रमश: अध्ययन और प्रार्थना-कक्ष में थे; उसके पिता कॉरपोरेशन-बैंक के लिए अंग्रेजी में एक पत्र लिख रहे थे और उसकी माँ हिंदू देवताओं के मंदिर में तेलुगू में भजन गा रही थी।
जागृति अपने शयन-कक्ष में सुरुचिपूर्ण पर साधारण, ब्लॉक-पिं्रट की सब्जियों के रंगों से रंगी नीली रेशमी साड़ी में उदास बैठी थी। तभी कुछ रिश्तेदारों - सही मायने में बड़े कजिन्स के साथ - "प्रस्ताव" पधारा। वह जागृति के पिता से मिला और बोला कि वह जितनी जल्दी हो सके "लड़की" को देखना चाहता है क्योंकि इसके बाद उसके और भी तीन अपॉइंटमेंट्स हैं।
जागृति गुस्से में थी। "लड़की" हाँ क्यों नहीं, वह बड़बड़ाई। यह बीसवी सदी का अंत है, प्रधानमंत्री के रूप में हमारे पास इंदिरा गाँधी हैं - और यह "लड़की" देखने आ रहे हैं? किस सदी से टपका है; क्या यह बैलगाड़ी में तो यहाँ नहीं आया है? और अप्पोइंमेंट्स, क्या कहने हैं जनाब के? क्या उसने पिताजी से कहा कि उसे अपनी वैवाहिक ख़रीदारी की लिस्ट में से "बाक़ी लड़कियों" को देखने जाना है? वैश्यावृत्ति-सा महसूस हुआ उसे। बुरी शुरुआत।
उसने चांदी की ट्रे, फाईन-चाईना के कप-प्लेट और गरम दूध के साथ बैठक में सहजता से प्रवेश किया, जहाँ सब बैठे थे, जैसे किसी नाटक की शुरुआत होने की प्रतीक्षा कर रहे हों। प्रस्ताव ने उसे चलते हुए देखा। वह एयर-इंडिया की एक परिचारिका की तरह चल रही थी; साड़ी का पल्लू मज़बूती से उसके कन्धों पर टिका था। उसका मोरपंखी आँचल काफ़ी-मेज पर लहरा गया; जागृति की नज़र सीधे उसके गंजे सिर पर पड़ी।
"चीनी?" उसने विनम्रता से पूछा, वह लगातार उसके सिर को देख रही थी।
"हाँँ" उसने कहा। उसके ऊपरी होंठ पर पसीने की एक मूंछ सी बनी आई थी और काई-भरे जंगल-सी दाढ़ी उसके गाल और ठोड़ी से उभर रही थी।
"कितने चम्मच?" जागृति ने अपने शांत माथे पर भौहें चढ़ाते हुए फिर पूछा।
"अम्म... एक और अम्म...। ठीक है बस दो", प्रस्ताव ने जबाब दिया, उसकी साँसें जल्दी-जल्दी चल रही थीं।
जागृति ने राशन की दुकान से लाई हुई चीनी के दो भरे चम्मच उसके कप में डाल दिए। वह अब भी अपनी नजरें उसके गंजे सिर से नहीं हटा पा रही थी।
लेकिन उस समय जब वह मीठे मैसूर-पाक, चॉकलेट-केक और नमकीन-मुकुर की ट्रे लेकर वापस आई, तो प्रस्ताव ने संकेत दिया कि वह "लड़की से अलग से साक्षात्कार" करना चाहता है। उसे टीवी वाले कमरे में ले जाया गया जहाँ जागृति द्वारा आर्ट-क्लास में बनाई गईं तस्वीरें दीवार पर टंगी हुई थीं।
और फिर वह शुरू हुआ। "जैसा कि आप जानती हैं, मैं हैदराबाद से गोल्ड-मेडलिस्ट हूँ और अब मैं कैलिफ़ोर्निया में सैन्डोज़ के रसायन-प्रभाग का निदेशक हूँ। बस मुझे तीन सवालों के जवाब दो। सबसे पहले..." उसने अपनी उंगलियों पर गिनना शुरू किया, "क्या तुम बहुत धार्मिक हो? दूसरा, क्या तुम्हारा स्वास्थ्य अच्छा है? और तीसरा, क्या तुम कभी किसी आदमी के साथ अकेले शाम को बाहर गई हो?" "हे भ-ग-वा-न," ये अक्षर जागृति के दिमाग़ में तूफ़ान मचाने लगे। क्या यह आदमी असली है? क्या वह समझता है कि जागृति एक मठ में रहती है?
"हाँ," जागृति ने शांति से जवाब दिया, उसका मन तो कर रहा था कि प्रस्ताव को उठा कर, सड़क के किनारे मलेरिया पीड़ित गोबर के ढेर पर फेंक दे।
जागृति अपने माता-पिता से प्यार करती थी, उसने तर्कों के साथ ख़ुद इस मुलाक़ात के बारे में सोचा था। वह यह मानना चाहती थी कि वे जो करेंगे उसके सर्वोत्तम हित में होगा, लेकिन आखिर क्यों वे ऐसे लोगों के बारे में इतने नादान थे, जो सोचते हैं कि उत्तरी-अमेरिका द्वारा स्वीकार किये जाने का मतलब है कि वे भारत वापस आकर एक भारतीय लड़की से शादी करके उसे खूंटे से बाँध सकते हैं, जिससे वह ग्रीन-कार्ड के उस देश में उनके लिए खाना पकाए और उनकी नस्लें पैदा करे? क्या मॉम और डैड के बीच में विभाजन के दौरान एक गहरी समझ नहीं हुई थी? क्या ये मुलाकातें एक गुज़री हुई व्यवस्था का हिस्सा नहीं थीं? क्या वह एक स्वतंत्र भारत के विचार को साझा नहीं करते थे? क्या उन्हें प्रेम नहीं हुआ था? इतने वर्षों की उदार सोच के बाद आख़िर क्यों वे उसे इस अंडमुख के साथ आग पर चलने को कह रहे थे?
"ठीक, कम से कम आप ईमानदार हैं", प्रस्ताव जागृति को हिला-डुला कर आत्म-अवशोषण से बाहर लाया, "मैं आपके पिताजी से पूछूँगा यदि हम कल रात का खाना साथ खा सकते हैं तो। लेकिन अब मुझे जाना होगा, अगले अपॉइंटमेंट के लिए देरी हो रही है", कहता हुआ वह उछला, अपने आकार से अनजान और लगभग फिसलता हुआ वह दूसरे कमरे में गया जहां सब बातचीत कर रहे थे और ख़ुश लग रहे थे। "भ-ग-वा-न", ये अक्षर जागृति के दिमाग में तूफ़ान मचाने लगे। क्या यह आदमी असली है? क्या वह एक मठ में रहने वाली है?
"हाँ," उसने शांति से जवाब दिया, भले ही उसका मन उसे अपने बगल से उठा कर, सड़क के किनारे मलेरिया पीड़ित गोबर के ढेर पर फेंक देने का कर रहा था।
जागृति अभी भी टीवी वाले कमरे में आरामकुर्सी को पकड़े बैठी हुई थी। उसकी ऊँगलियाँ ठंडी थीं। यह आदमी मैसकिस्ट है क्या? उसने सोचा भी है कि वह क्या कर रहा है? उसने अपने दांत भींचते हुए सोचा।
"हाँ," वह मुस्कुराते हुए वापस आया। "चाचा जी सहमत हो गए हैं। मैं यहाँ कल शाम ठीक 7.30 पर आऊंगा। तैयार रहना, ठीक है?"
"मेरे पिताजी तुम्हारे चाचा नहीं हैं," जागृति लगभग उससे झगड़ने ही वाली थी लेकिन उसने फ़ैसला किया कि मौन क्रोध का सबसे अच्छा तरीक़ा है।
दूसरे दिन शाम के 7 बजे जब उसके भाग्य का फैसला होना था, उसने बादामी शिफ़ौन की साड़ी पहनी। वह आया और उसे गोल्डन-ड्रेगन रेस्टौरेंट लेकर गया। उसने जैसे ही मिर्च वाला कुंग-पाओ टाइगर-झींगे का एक कौर लिया, वह बोला, "तुम अमरीकन टीवी के बारे में क्या सोचती हो?"
इससे पहले कि वह जबाब देती, वह आगे बोला, "यह चुम्बन, नग्नता जो देर रात दिखाते हैं मुझे बिलकुल पसंद नहीं है।"
"मुझे यक़ीन है कि अमेरिका में पचास अन्य चैनलों का भी विकल्प है," जागृति ने अपने लाल होंठों को सिकोड़ते हुए थोड़ा दबाते हुए कहा जिससे कि रुमाल पर दाग नहीं लगे। उसने अपनी काजल लगी सुलगती भूरी आँखों से प्रस्ताव को देखा, उसकी भौहें काँप रहीं थीं और उसकी नाक का हीरा चमक रहा था, वह धीरे से बोली, "मुझे लगा कल आपने कहा कि आप मेरे अति धार्मिक होने से परेशान होंगे।"
उसने उसे देखा, पानी का गिलास जो प्रस्ताव ने उठाया था बीच हवा में ही रुक गया और उसके माथे पर बनी पसीने की एक लाइन ठन्डे पसीने में बदल गई।
"न न नहीं, नहीं, मेरे कहने का मतलब है कि अति किसी भी चीज़ की बुरी होती है। यदि कोई बहुत धार्मिक है, तो बच्चे पैदा करना मुश्किल होगा", उसने मज़ाक करने की कोशिश की।
"ओह अच्छा", दोनों के बीच जलती मोमबत्तियों को दूर-दूर रखते हुए जागृति ने कहा।
"क्या आप तैरने जाती हैं", प्रस्ताव ने हिम्मत करके पूछा, वह बेताबी से विषय को बदलना चाहता था, तब जबकि मंहगे चीनी खाने का मज़ा किरकिरा हो चुका था।
"क्या आपने एम.के. गाँधी की "माय एक्सपेरिमेंट विद टØथ" पढ़ी है?" जागृति ने पूछा।
"मुझे अपने बुक-क्लब में इसे देखना पड़ेगा," प्रस्ताव ने घबराते हुए कहा। वह कुछ भी स्वीकार करने के लिए तैयार था, यहाँ तक कि कामुक-साहित्य भी, अगर वह उसे कहती।
"यह तीस से भी अधिक वर्षों से भारत में है," जागृति ने कहा। "यह स्वतंत्र भारत का एक आधार है। अफ़सोस की बात है कि आपने इसके बारे में नहीं सुना है।"
जब वे घर पहुंचे, जागृति के पिताजी इंतज़ार कर रहे थे। वह "प्रस्ताव" को शुभकामनाएं देकर अंदर चली गई। जब वह घर के अंदर थी, उसने उसे पिताजी से कहते हुए सुना, "वह बहुत अलग है। आपकी बेटी ठंडी है। वह शायद बहुत ज़्यादा पढ़ती है। यह उसे एक अच्छी पत्नी या मां नहीं बनने देगा," कुछ दिनों बाद उसके पिताजी के पास "प्रस्ताव" के सबसे बड़े भाई का एक पत्र आया।
आपके परिवार से मिलना हमारी खुशकिस्मती है। मनमोहन को लगता है कि उसे 3 जनवरी 1981 तक एक दुल्हन का चयन करने की ज़रूरत है। इसका मतलब है कि मुश्किल से पंद्रह दिन बचे हैं। हम तत्काल इसको हल करना चाहते हैं, जिससे वह अगले वित्त वर्ष से पहले शादी-भत्ता के योग्य हो।
हमें लगता है कि लड़की को बहुत अच्छी तरह से पाला गया है और वह एक अच्छे परिवार से है किन्तु मनमोहन को लगता है कि उचित मैच होने के लिए वह बहुत लंबी है और वह राज़ी भी नहीं प्रतीत होती।
हमारी आप सभी को समस्त शुभकामनाएं।
सादर, डोरई
जागृति के पिताजी ने इस पर बस इतना ही कहा, "बहुत लंबी? कोई आश्चर्य नहीं कि वह एकदम कीड़ा है! वह शादी को समझता क्या है एक मवेशी बाजार?"
जागृति को राहत मिली, वह अपने पिताजी के गले लगना चाहती थी जैसे उन्होंने उसे लगाया भी। एक चमकते पल के लिए वे दोनों भूल गए कि उन्होंने मध्य-वर्ग के जोड़-तोड़ के इस विषय पर एक युद्ध की घोषणा कर दी थी, जैसा कि जागृति सोचती थी कि शादी के लिए मजबूर करना उसके मानवीय अधकिारों के ख़िलाफ़ है। जागृति के पिताजी हिंदू आश्रम या जीवन चरण में बंधे रहना चाहते थे, वह उस अवस्था में थे, जहाँ वह अपने पिता होने की ज़िम्मेदारी को पूरा करना चाहते थे और अपनी बेटी को शादीशुदा और "अच्छी तरह से बसा हुआ" देखना चाहते थे और इससे होने वाले उसके दुःख से पूरी तरह अनजान थे।
जागृति, ज़ाहिर है, अपने जीवन की उस अवस्था में थी जहाँ शिक्षा का मतलब आज़ादी से था और उसके मामले में विद्रोह की एक और ख़ुराक।
पैनी ठोढ़ी, दंतहीन मुस्कान, चौड़े माथे वाली जागृति की पहली झलक से ही उसके माता पिता समझ गए थे कि जागृति के साथ उनका रास्ता सपाट नहीं होगा। इसलिए उन्होंने उसका नाम जागृति रखा था - एक उग्र, प्रखर स्वभाव। तो जागृति को उसके नाम के साथ यह शक्ति विरासत में मिली थी। उसके पास कोई विकल्प नहीं था।

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