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देश-विदेश के दरम्यान
01-Feb-2018 10:05 AM 2740     

तरक़्क़ी की सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते हम अपने औ अपनों से कितनी दूर निकल जाते हैं, पता ही नहीं चलता। समय की बेलगाम उड़ान हमें कब, कहाँ से उड़ा के ले जाती है ये समय गुज़र जाने के बाद ही पता चलता है... इसी तरह की बहुत-सी पंक्तियाँ हम सभी ने कभी ना कभी अपने जीवन के किसी न किसी मोड़ पर ज़रूर पढ़ी-सुनी होंगी। और शायद हम में से कुछ एक ने इन्हें जिया भी हो, मगर मेरे अपने अनुभव के अनुसार जो तरक़्क़ी हमको स्वयं अपने से जुदा कर देती हो वो तरक़्क़ी बाहरी और दिखावटी ज़्यादा है, वास्तविक कम। तरक़्क़ी जब सही मायनों में हमारे जीवन में हो रही होती है तो हम न सिर्फ़ अपने आप से बल्कि अपने चारों तरफ़ के वातावरण- पेड़, पौधे, पंछी, जीव-जंतुओं और देश दुनिया से ज़्यादा गहरे जुड़ जाते हैं। उन्हें ज़्यादा महसूस करने लगते हैं। उनसे दूर हो जाने का तो सवाल ही नही उठता। अब ये किस तरह की तरक़्क़ी की बात यहाँ हो रही है? ये सवाल ज़रा गम्भीर है।
हाँ, अगर सिर्फ़ सामाजिक स्तर पर मिलने वाली सफलताओं की बात की जाए तो यह कहना ठीक होगा कि कठिन परिश्रम और कड़ी लगन के ज़रिये हम सभी अपने जीवन में बहुत से बड़े-बड़े मुक़ाम हासिल कर पाते हैं, मगर साथ ही साथ बहुत से दूसरे गंतव्यों को नज़रअंदाज़ भी कर जाते हैं। जिनकी महत्ता शायद उम्र के आख़िरी पड़ावों पर हमें बाक़ी सभी उपलब्धियों से ज़्यादा महसूस होती है। लेकिन इस भौतिक संसार का नियम ही कुछ ऐसा है कि आज कुछ पाना है, तो कल कुछ खोना। कभी थोड़ा हँसना है तो कभी थोड़ा रोना।
अब जब बात उपलब्धियों की हो ही रही है तो मेरा ये भी मानना है कि कुछ उपलब्धियाँ या उपलब्धियों जैसी लगने वाली घटनाएँ आपके जीवन में होनी ही होती हैं फिर चाहे वो इस तरह हों, या उस तरह।
हम भी 21 वर्ष की उम्र में अमेरिका पहुँचे। हांलाकि मेरा अमेरिका आना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी, मगर इस कम उम्र में अपने देश, अपनी भाषा, अपने लोगों से इतनी दूर इस नयी और अंजान दुनिया में आकर, यहाँ के नए परिवेश, नए माहौल, अलग रहन-सहन एवं भिन्न सोच में अपने आपको ढालते हुए अपनी ख़ुद की सांस्कृतिक एवं मौलिक पहचान को बनाए रखना, ज़रूर कामयाब जीवन को जीने की तरफ उठा, एक सशक्त क़दम था। क्योंकि बहुत आसान होता है ये कह देना कि विदेशों में जाकर भारतीय लोग अपनी भारतीय सभ्यता, संस्कृति को भूलकर भोगवाद या व्यक्तिवाद के अनुयायी हो जाते हैं और अपनी भाषा एवं सांस्कृतिक मूल्यों को जानते बूझते नकारने लगते हैं अथवा हीन दृष्टि से देखने लगते हैं। भोगवाद और "खाओ, पियो, ऐश करो" वाली संस्कृति की जो रूपरेखा ज्यादातर भारतीय अमेरिका के लिए अपने दिमाग में लिए घूमते हैं वो यहाँ रहने वाले किसी भी इंसान को शायद ही गले उतरे, क्योंकि जहाँ तक मेरी नज़र जाती है वहाँ तक हर इंसान अपने-अपने घरों की साफ़-सफ़ाई, बर्तन, कपड़े, खाना यहाँ तक की बग़ीचे की घास काटना, क्यारियों में खाद-पानी डालना और छोटी-मोटी घरेलू टूट-फूट की मरम्मत करने तक के सभी काम बड़े-बड़े घरों में रहने वाले तक भी ख़ुद स्वयं ही कर रहे होते हैं। हाँ, ये अलग बात है कि ज़्यादातर काम मशीनों से होते हैं और मेहनत कम लगती है, लेकिन फिर भी रईसियत और नौकर-चाकरों में पले बढ़े हुए बहुत से भारतीयों को यहाँ आकर कामों के बोझ से हैरान परेशान मैंने कई बार देखा है।
एक सच्चाई यह भी है कि पिछले बीस वर्षों में जितना पाश्चात्यकरण ऊपरी तौर पर मुझे भारत के बड़े शहरों में रहने वाले भारतीयों में दिखाई दिया है उसका आधा भी अमेरिका में रहने वाले भारतीयों में नहीं है। ये प्रवासी भारतीय, अमेरिका में रहकर भी अभी तक भारत से जुड़ी उन्हीं बीस साल पुरानी यादों को दिल में सँजोए जी रहे हैं जिनकी पुष्टि अब ख़ुद भारत में भी होनी मुश्किल है। मगर समस्या ये है कि भारतीय खान-पान, बोल-चाल, पहराव-उढान सबका पाश्चात्यकरण हो जाने के बावजूद जब अमेरिका में रहने वाला कोई भारतीय किसी अमेरिकन सोच, सिद्धांत या स्वतंत्र एवं खुली विचारधारा की भारत में जाकर प्रशंसा करे तो वो बात अधिकांश भारतीयों को हज़म नहीं होती। क्योंकि भारत तो गुरुओं की श्रेणी में आने वाला देश है! समस्त विश्व को उसी के नैतिक, पारिवारिक एवं सामाजिक मूल्यों का अनुसरण करना चाहिए! उसके अतीत में छिपी हुई विशालता और विराटता को पूज्यनीय मानते हुए ख़बरदार किसी प्रवासी भारतीय ने किसी दूसरे देश की बड़ाई की। हमारे देश से पढ़-लिख कर कुछ वर्ष विदेश में क्या रह लिए कि अब अपने ही घर परिवार की कमियाँ निकालने लगे! ज़रा देखो तो सही, हमारी बिल्ली आज हमीं को म्याऊँ! कितने संस्कारहीन और अमेरिकनाइज्ड हो गये ये बच्चे विदेश जाकर! आदि तोहमतें सुनना पड़ती हैं।
अब अगर उपरोक्त आधे स्वदेशी-आधे विदेशी भारतीयों के हिसाब से एक युवा बच्चे का अपने माँ-बाप के दोहरे आचरण पर आपत्ति जताना, देश के नागरिकों का अपने देश की ग़लत व्यवस्थाओं के ख़िलाफ खड़े होना, विवाहित स्त्री का अपने बदचलन और पीड़ादायी (ठ्ठडद्वद्मत्ध्ड्ढ) पति के खिलाफ आवाज़ उठाना, घटिया धर्मगुरुओं एवं भोगी कर्म काण्डियों की अवहेलना करना, स्त्रियों का पुरुषों की भाँति अपने जीने के तरीक़े चुनने की स्वतंत्रता की माँग करना पश्चिमीकरण है तो इस पश्चिमीकरण में खोने जैसा बहुत ही कम है। सिवाय उन रूढ़िवादी, अलगाववादी और अनैतिक ढर्रो के जिन्हें हम और आप चाह कर भी अब ज़्यादा समय तक बचा नहीं सकते। और अगर यदा-कदा, साम-दाम-दंड-भेद करके बचा भी लिया तो शायद पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर हम अपने आपको नैतिकता की अग्रणी श्रेणी में मानकर ख़ुश हो भी लें, मगर विश्व स्तर पर भारत को गुरुओं की श्रेणी में ला खड़ा करना लगभग नामुमकिन है। क्योंकि एक कुंठित और दबा हुआ व्यक्तित्व और समाज कभी किसी दूसरे का पथ प्रदर्शित नहीं कर सकता।
एक और बात जो ग़ौर तलब है वो ये कि पिछले पंद्रह-बीस सालों में भारत में हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेज़ी बोलने एवं इस्तेमाल करने वालों की संख्या में इतनी तेज़ी से बढ़ोतरी होने के बावजूद विदेशों में पल-बढ़ रहे भारतीय बच्चों को हिन्दी एवं दूसरी प्रांतीय भाषाएँ बोलने-सीखने की कोशिशों में कोई ज़्यादा परिवर्तन नही आया। हाँ, कुछ भारतीय जो वहाँ पर रहकर भी अपने बच्चों को अंग्रेज़ी और सिर्फ़ अंग्रेज़ी की महत्ता महसूस कराते वो यहाँ पर भी वही करा रहे हैं। लेकिन ज़्यादातर पहली प्रवासी पीढ़ी अपने बच्चों को अपनी भाषा, गीत-संगीत एवं खान-पान से जोड़े रखने में सफल नजर आती है। यहाँ तक की कुछ काउंटियों/प्रांतों में जहाँ भारतीयों की संख्या नज़रअंदाज़ करने जैसी नहीं है वहाँ के सरकारी विद्यालयों तक में हिन्दी भाषा को अन्य विदेशी भाषाओं की भाँति द्वितीय भाषा के समानांतर स्थान दिया गया है। और उसके क्रेडिट्स एवं सर्टिफ़िकेट्स विद्यार्थियों को अच्छे कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी में प्रवेश हेतु सहायक होते हैं। लेकिन एक सत्य यह भी है कि एक अंग्रेज़ी भाषा में लिखी गई किताब को पढ़ने वालों की संख्या एक हिंदी पुस्तक को पढ़ने वालों से कई गुना ज़्यादा होती है। इसलिए अंग्रेज़ी की अंतरराष्ट्रीय महत्ता को नकारते हुए हिन्दी को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। अपितु हिन्दी एवं अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का ज्ञान आने वाली पीढ़ियों को वृहद स्तर पर उपलब्ध हो, यह आवश्यक है। ताकि इन भाषाओं के ज़रिये आने वाली पीढ़ियाँ देश एवं दुनिया, दोनों से समानांतर रूप से जुड़ पाएँ और समाज एवं विश्व के हर कोने से कुछ न कुछ नया एवं अच्छा सीखकर अपने जीवन में धारण करें और एक बेहतर नागरिक, एक बेहतर इंसान बनने को अपने जीवन का परम ध्येय और तरक़्क़ी की अंतिम सीढ़ी बनाएँ।

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