ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
यारों का यार, बड़ा दिलदार
01-Mar-2019 03:24 PM 493     

वे दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहते थे, जहाँ मैं रहती थी। उन्होंने बहुत चाहा कि मैं भी
उनकी भीड़ का हिस्सा बनूँ, शायद इसलिए कि उनके इर्द-गिर्द जो भी लोग थे, वे उन्हें
कम लगते थे। उनके चौखटे में हर कोई फ़िट हो सकता था। लेकिन तब तक मैं
अपने एकांतवास में प्रवेश कर चुकी थी और यह मेरे बस का नहीं था।

राजेंद्र यादव जी के बारे में ऐसा क्या है, जो लिखने से रह गया? क्या है ऐसा, जिसे कोई नहीं जानता? राजेंद्र यादव जी को भीड़ में रहने का बहुत शौक था। हर वक़्त उनके चारों तरफ़ भीड़ रहती थी, लेकिन मैं कभी उस भीड़ में शामिल नहीं हुई। मैं बल्कि यह सोचती थी, अभी भी यही सोचती हूँ कि जो व्यक्ति, खासतौर से लेखक हर समय लोगों से घिरा रहता है, वह भीतर से बहुत अकेला होता है। अपने आप से भागने के लिए वह भीड़ का सहारा चुनता है। तो क्या राजेन्द्र यादव जी खुद से भागते थे जो हर समय भीड़ में रहते थे? शायद उनके भीतर कुछ ऐसे प्रश्न रहे हों जिनका उत्तर वे खुद को भी देने से कतराते रहे हों। मैं यह भी सोचती थी/हूँ कि हर वक़्त भीड़ से घिरा रहने वाला लेखक चिन्तन-मनन-लेखन कब करता होगा? ऐसे में क्या इंसान दिमाग़ी तौर पर थक नहीं जाता?
वे दिल्ली में उसी कॉलोनी में रहते थे, जहाँ मैं रहती थी। उन्होंने बहुत चाहा कि मैं भी उनकी भीड़ का हिस्सा बनूँ, शायद इसलिए कि उनके इर्द-गिर्द जो भी लोग थे, वे उन्हें कम लगते थे। उनके चौखटे में हर कोई फ़िट हो सकता था। लेकिन तब तक मैं अपने एकांतवास में प्रवेश कर चुकी थी और यह मेरे बस का नहीं था। मुझे लोगों से एक तरह से एलर्जी हो गई थी। (अब भी है) पर मैं यह बात किसी को बता नहीं पाती थी और लिहाजवश मिलती भी रहती थी, जितना कम हो सके उतना कम।
एक बार उन्होंने मुझे ब्रेकफ़ास्ट के लिए अपने घर बुलाया। अब इतना बड़ा लेखक बुलाए तो जाना तो था ही, लेकिन मुझे कोई बात ही नहीं करनी आती थी। उनके नौकर यानि सहायक, जो उनके परिवार की तरह ही था और हर समय उनके साथ रहता था, उसने कुछ बनाया, मैंने खाया और मैं वापस अपने घर।
यूँ मैं भी उन्हें निमंत्रित कर चुकी थी। मनु के जन्म की ख़ुशी में मैंने डिफ़ेन्स क्लब, धौला कुआँ में कॉकटेल डिनर रखा था। सगे-सम्बन्धी आमंत्रित थे और कतिपय लेखक मित्र। राजेंद्र यादव भी आमंत्रित थे। वे आए थे मैत्रेयी पुष्पा को साथ लेकर। बोले, "मणिका, तुम इन्हें बुलाना चाहती थी ना? इसलिए मैं इन्हें साथ ले आया।" मैंने कहा, "हाँ, अच्छा किया, आप इन्हें ले आए।"
मैंने एक बार और उन्हें अपने घर बुलाया था। उन्होंने कहा था, "मेरे ही मोहल्ले में रह रही हो और मुझे कभी तुमने घर नहीं बुलाया।" तो मैंने उन्हें लंच पर इन्वाइट किया था। अब राजेन्द्र यादव जी तो ठहरे शहंशाह। वे अपने लाव-लश्कर के साथ हर जगह जाते थे। मेरे घर आए तो उनके साथ छह-सात लोग थे, एकाध को मैं व्यक्तिगत रूप से पहले मिल चुकी थी, एकाध का नाम भर सुना था, कई एकदम अपरिचित थे। अब यादव जी तो यादव जी।
उन्हें स्त्री-पुरुष संबंधों में बहुत रुचि थी, पर शायद टूटे हुए सम्बन्धों में। उन्हें शायद यह लगता था कि जो लड़कियाँ अकेली रहती हैं, वे निश्चित रूप से अनेक प्रेम सम्बन्धों के बीच से गुज़रती होंगी। बहुत साल पहले प्रेस क्लब में न जाने कौन-सी गोष्ठी थी, वहाँ मिले तो कहने लगे, "मणिका, तुम अपनी आत्मकथा लिखो। मैं जानता हूँ कि तुम्हारी आत्मकथा बहुत रोचक होगी।" इसके बाद भी बहुत बार यह बात कही। एक बार बोले, "यार, तुमने जीवन में इतने लड़कों से दोस्तियाँ की होंगी। सबके बारे में खुल कर लिखो।" मैंने इसके जवाब में एक बार कह दिया था, "जी, मैं कौन-सी इतनी महान हो गई हूँ कि अपनी आत्मकथा लिखूँ?" मेरे मन में कहीं कचोटता था कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के बनने और टूटने के दर्द के अलावा भी दर्द होते हैं जो वे नहीं समझते थे। समझते तो कभी तो मेरे बच्चे के बारे में भी मुझसे पूछा होता। उन्होंने क्या, किसी भी लेखक ने नहीं पूछा। सबकी आँखों के सामने मेरा बच्चा बच्चे से जवान हुआ, कैसे हुआ, किन मुश्किलों से हुआ, किसी ने कभी नहीं पूछा। परिवार के बारे में बात करना लेखकों के लिए दकियानूसी होने के समान था। खैर।
अगस्त, 1986 में उन्होंने "हंस" पत्रिका का शुभारम्भ किया। उसी माह मैंने भी मुम्बई में अपनी पत्रिका "वैचारिकी संकलन" की शुरुआत की थी। 1996 में वै.सं. के दस वर्ष पूरे होने पर मैंने दिल्ली के गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान में एक आयोजन किया, जिसमें मंच राजेंद्र यादव जी ने ही सम्भाला था।
सच बोलने में कोई बुराई नहीं कि मैं उनकी जीवनशैली को कभी पसंद नहीं कर पाई, हालाँकि उनके लेखन से मेरी पहचान मेरे बचपन में ही हो गई थी, जिससे मैं अत्यन्त प्रभावित भी थी। मन्नू जी मुझे हमेशा महान लगती रहीं। राजेंद्र यादव लेखक ज़रूर महान हैं, इसमें दो राय नहीं।
28 अक्टूबर, 2013 को 84 वर्ष की आयु में हृदय गति रुक जाने से उनका निधन हो गया। जो आदमी किताबों में जीवित रहता है, वह लोगों के दिलों में भी जीवित रहता है, वह कभी नहीं मरता।

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