ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बटेश्वर एक सौ आठ शिव मन्दिरों की काशी
01-Jun-2019 01:04 AM 609     

आगरा का नाम लेते ही हमारे मस्तिष्क में जो छवि उभरती है, वह ताजमहल, लाल किला या अकबर की बसाई फतेहपुर सीकरी के विशाल दुर्ग और महल की होती है। पर न जाने हमारा दुर्भाग्य है अथवा इन स्मारकों की जरूरत से ज्यादा चर्चाओं का कि कुछ बेहतर स्मारक और प्राचीन ऐतिहासिक स्थल गुमनामी में विस्मृत हो गये हैं। आगरा मात्र ऐसे ही कुछ मकबरों और किलों का स्थल बन कर रह गया है, पर ऐसे में यह तीर्थ, जो आगरा की एक दूरस्थ तहसील का भाग है और मुख्य नगर से लगभग 70 किलोमीटर दूर है, एक अलग ही छटा प्रस्तुत करता है।
यही छोटी काशी कहलाता है-- हिन्दुओं की श्रद्धा का केंद्र यह बटेश्वर तीर्थ है। इसे "भदावर की काशी" के नाम से जाना जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लाखों श्रद्धालु यहाँ स्नान कर भोले के मंदिरों में माथा टेकते हैं। इस स्थल का नाम बटेश्वरनाथजी के नाम पर पड़ा है जो भगवान शिव के अनेक नामों में से एक है। मान्यता यह है कि भगवान शिव इस तीर्थ स्थल के इष्टदेव हैं।
बटेश्वर के प्रसिद्ध घाट भोर के सूरज के प्रकाश में यमुना में पड़ते अपने प्रतिबिंब से एक मोहक चित्रमाला प्रस्तुत करते हैं। पूरा परिदृश्य बेहद सुंदर और मोहक होता है। यमुना नदी के किनारे बने भगवान शिव के इन प्राचीन 108 मंदिरों की छटा यहाँ से अत्यंत निराली दिखती है। एक समय में यहां 101 और फिर 108 मंदिर हुआ करते थे जिसमें से 42 मंदिर अभी भी यहाँ मौजूद हैं। शेष जीर्ण-शीर्ण अवस्था में उजाड़ पड़े हैं। आज भी, यहाँ के कुछ मंदिरों की छतों पर वे सुंदर मूल भित्ति-चित्र मौजूद हैं जो कि पारंपरिक वनस्पति रंगों द्वारा बनाए गए थे। साथ ही यह शहर 8वीं सदी से लेकर 17वीं सदी तक कई महान राजाओं का मुख्य राज्य रहा, जैसे कि गुर्जर, चंदेला एवं भदावर राजा। आज से लगभग चार शताब्दी पूर्व राजा बदन सिंह (भदावर वंश) ने बटेश्वर को अपनी राजधानी के रूप में तब्दील कर दिया था। एक किंवदंती के अनुसार राजा भदावर के और तत्कालीन राजा परमार के यहां जब उनकी रानियों ने गर्भ धारण किया, तो दोनों के बीच समझौता हुआ कि जिसके भी कन्या होगी, वह दूसरे के पुत्र से शादी करेगा। राजा परमार और राजा भदावर दोनों के ही कन्या पैदा हो गई, पर राजा भदावर ने परमार को सूचित कर दिया कि उनके पुत्र पैदा हुआ है। उनकी झूठी बात का परमार राजा को पता नहीं था, वे अपनी कन्या को पालते रहे और राजा भदावर के पुत्र से अपनी कन्या का विवाह करने के लिये बाट जोहते रहे। जब राजा भदावर की कन्या को पता लगा कि उसके पिता ने झूठ बोलकर राजा परमार को उसकी लड़की से शादी का वचन दिया हुआ है, तो वह अपने पिता के वचन को पूरा करने के लिये भगवान शिव की आराधना बटेश्वर नामक स्थान पर करने लगी। उधर राजा परमार की खबरें राजा भदावर के पास आने लगीं कि अब शादी जल्दी की जाये। राजा भदावर की कन्या अपने पिता की लाज रखने के लिये तपस्या करने लगी। उसकी विनती न सुनी जाने के कारण उसने अपने पिता की लाज को बचाने हेतु यमुना नदी में आत्महत्या के लिये छलांग लगा दी।
उसी क्षण भगवान शिव की की गई आराधना का चमत्कार हुआ, और वह कन्या पुरुष रूप में इसी स्थान पर उत्पन्न हुई। राजा भदावर ने उसी कारण से इस स्थान पर एक सौ आठ मन्दिरों का निर्माण करवाया, जो आज बटेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं। यहां पर यमुना नदी चार किलोमीटर तक उल्टी धारा के रूप में बही हैं।
कुछ लोग इस कथा को नहीं मानते। इस सम्बंध में एक ऐतिहासिक कथा भी प्रचलित है। अकबर महान के समय में यहाँ भदौरिया राजपूत राज्य करते थे। एक बार बटेश्वर के राजा बदनसिंह अकबर से मिलने आए। उन्होंने सम्राट को बटेश्वर आने का निमंत्रण देते समय भूल से कह दिया कि आगरा से बटेश्वर पहुँचने में यमुना को पार नहीं करना पड़ता, जो वस्तुस्थिति के विपरीत था। घर लौटने पर उन्हें अपनी भूल मालूम हुई, क्योंकि आगरा से बिना यमुना पार किए बटेश्वर पहुँचा ही नहीं जा सकता था। राजा बदनसिंह बड़ी चिन्ता में पड़ गए। इस भय से, कि कहीं सम्राट के सामने झूठा न बनना पड़े, उन्होंने अपने दिन-रात के प्रयासों से यमुना की धारा को पूर्व से पश्चिम की ओर मुड़वाकर उसे बटेश्वर के दूसरी ओर कर दिया। नगर को यमुना की धारा से हानि न पहुँचे, इसलिए एक मील लम्बे, अत्यन्त सुदृढ़ और पक्के घाटों का भी नदी तट पर निर्माण करवाया गया।
बटेश्वर के घाट इसी कारण प्रसिद्ध हैं कि उनकी लम्बी श्रेणी अविच्छिन्न रूप से दूर तक चली गई है। उनमें बनारस की भाँति बीच-बीच में रिक्तता नहीं दिखलाई पड़ती। इस जगह यमुना की धारा को मोड़ देने के कारण उन्नीस मील का चक्कर पड़ गया है।
वर्तमान शिव श्रृंखला मंदिरों की श्रृंखला का निर्माण सन 1646 में भदावर नरेश बदन सिंह की ही देन था। भदौरिया या भदावर वंश के पतन के पश्चात बटेश्वर में 17वीं शती में मराठों का आधिपत्य स्थापित हुआ। इस काल में यहाँ पर संस्कृत की शिक्षा का अधिक प्रचलन था, जिसके कारण बटेश्वर को छोटी काशी का रूप माना जाता था।
ताज नगरी से सत्तर किलोमीटर दूर लगने वाले प्रसिद्ध बटेश्वर मेले में श्रद्धालु सबसे पहले बटेश्वरनाथ मंदिर जाते हैं। मंदिर में लगे दर्जनों घंटे डकैतों की निशानी के रूप में वहां आज भी मौजूद हैं। चंबल के बीहड़ में घंटे चढ़ाकर डकैत बनने का ऐलान होता था, ऐसी परंपरा चली आ रही थी। बताया जाता है कि डाकू पान सिंह तोमर जब भी बड़ी डकैती में सफल होता था, तो वह बड़ा घंटा चढ़ाता था। खुद को डाकू नहीं, बागी कहलाना पसंद करते थे यह। घुनघुन परिहार डकैत ने भी बटेश्वरनाथ मंदिर में घंटा चढ़ाकर डाकू होने का ऐलान किया था। ऐसे दर्जनों घंटे अभी भी वहां मोटी-मोटी जंजीरों से बंधे हैं। इनमें से कई घंटों पर डकैतों के नाम भी लिखे हैं। बटेश्वर के बुजुर्ग लोग भी डाकू बनने से पहले यहां आकर प्रार्थना करने की पुष्टि करते हैं।
बटेश्वर भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का पैतृक गाँव भी है। अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन के समय अटल बिहारी वाजपेयी जी और उनके बड़े भाई प्रेम जी इसी गाँव में गिरफ्तार किये गये थे। इसी घटना से उनका राजनीतिक जीवन आरम्भ हुआ था।
आज बटेश्वर के इन मंदिरों में चार पाँच मंदिर सबसे अच्छी अवस्था में हैं। बटेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित एक शिलालेख के अनुसार 1212 अश्वनी शुक्ला पंचमी दिन रविवार को राजा परीमदिदेव ने यह भव्य मंदिर बनवाया था। राजा बदन सिंह भदौरिया ने आज से लगभग 300 वर्ष पूर्व इस मंदिर का पुनरुद्धार कराया। तमाम भक्तों द्वारा कामना पूर्ति होने पर अर्पित किये गए अनेक छोटे, बड़े और विशाल घंटे इस मंदिर की विशेषता हैं। यहाँ दो किलो से लेकर अस्सी किलो तक के पीतल के घंटे जंजीरों से लटके मिलते हैं। गौरीशंकर मंदिर में भगवान शिव, पार्वती और गणेश की एक दुर्लभ जीवन आकार मूर्ति तो है ही, साथ ही नंदी भी है। सामने दीवार पर मयूर-आसीन भगवन कार्तिकेय और सात घोड़ों पर सवार सूर्य की प्रतिमाएँ हैं। एक शिलालेख के अनुसार 1762 ई. में स्थापित शिव की एक मूर्ति में उन्हें मूछों और डरावनी अंडाकार आँखों के साथ चित्रित किया गया है।
बटेश्वर न जाने कितनी बार बर्बाद हुआ और फिर से पुनरुद्धार होकर पहले से भी बेहतर बन गया। वर्ष 1505 भदावर के इतिहास में महत्त्वपूर्ण था। इस समय राजा करन सिंह (सन् 1480-1509) के कार्यकाल में भयंकर भूकंप आया। इस भूकम्प में आगरा का पुराना किला ध्वस्त हो गया था और इसी समय भदावर सेना ने मुग़ल सल्तनत से बगावत कर दी थी। उन्होंने आसपास के इलाकों को अपने कब्ज़े में ले लिया। सिकंदर लोधी को कड़ा मुकाबला मिला, यद्यपि उसे अपदस्थ करने की योजना संगठित प्रयास और उचित सैन्य शक्ति के अभाव में विफल रही, वरना आज के इतिहास की दिशा ही बदल जाती। इस स्थिति का लाभ उठा कर सिकंदर लोधी ने आगरा किले को सुदृढ़ किया था।
इस विषम राजनीतिक और भौगौलिक परिस्थिति में भी बटेश्वर में हिन्दू मंदिरों की नींव रखी गई। जगह-जगह स्वाभिमान की रक्षा का संकल्प लिया गया। बाद में राजा बदन सिंह के कार्यकाल, यानि सन 1643 से 1654 के मध्य बटेश्वर का पुनरुद्धार किया गया।
बटेश्वर के पातालेश्वर मंदिर का निर्माण पानीपत के तीसरे युद्ध (1761 ई.) में वीरगति को प्राप्त हुए हजारों मराठों की स्मृति में, मराठा सरदार नारू शंकर ने कराया था। शिव को समर्पित इस विशाल मंदिर की दीवारों पर ऊँची गुंबददार छत है तथा इसका गर्भगृह रंगीन चित्रों से सुसज्जित है। गर्भगृह के सामने कलात्मकता से चित्रित एक मंडप है। इस मंदिर में एक हजार मिट्टी के दीपकों का स्तंभ है जिसे सहस्र दीपक स्तंभ कहा जाता है।
मणिदेव मंदिर में आल्हा-उदल के देव मणीखे की मनहर प्रतिमाएँ हैं। यह प्रतिमाएँ कसौटी पत्थर की है जो पास से साधारण लगती हैं पर जैसे-जैसे दूर हटते जाते हैं तो इसमें शिवलिंग व मणि दमकती जाती है। शौरीपुर के सिद्धि क्षेत्र की खुदाई में अनेक वैष्णव और जैन मन्दिरों के ध्वंसावशेष तथा मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। दंतकथा के अनुसार बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमीनाथजी का जन्म यहीं हुआ था। यहीं एक मन्दिर में स्वर्णाभूषणों से अलंकृत पार्वती की छह फुट ऊँची मूर्ति है, जिसकी गणना भारत की सुन्दरतम मूर्तियों में की जाती है। मुख्य आबादी से दूर होने के कारण बटेश्वर के घाटों का जल प्रवाह नैसर्गिक है, उसकी गुणवत्ता निर्मल और बहाव तेज है। चाँदनी रात में, विशेषकर वर्षा ऋतु में यमुना की तीव्र धारा का चमकीला, बिलकुल चाँदी-जैसा दृश्य देखने अन्य स्थानों के लोग भी आते हैं। ऐसा लगता है मानो चाँदी का जल बह रहा है। रात में जल-प्रवाह की ध्वनि एक विचित्र भाव उत्पन्न करती है। बटेश्वर के मंदिर सुबह के सूरज की रौशनी में यमुना में पड़ते अपने प्रतिबिंब से एक मोहक चित्रमाला प्रस्तुत करते हैं।
बटेश्वर में किसी समय गोसाइयों, बैरागियों और ब्राह्मणों की बहुत सुंदर हवेलियाँ हुआ करती थीं। आज वह हवेलियाँ नष्ट हो गयी हैं। बड़े-बड़े टीलों पर बसा यह ऐतिहासिक गाँव धीरे-धीरे उजड़ता चला जा रहा है। यहाँ दो-दो मंजिल के अनेक भव्य मकान खाली पड़े हैं, जिनमें कबूतर और चमगादड़ रह रहे हैं। बस्ती के उजड़ने का कारण है रोजी-रोटी की समस्या। एक तो बटेश्वर नगर की मुख्य धारा से बहुत दूर है, दूसरे व्यापार, शिक्षा तथा उन्नति के पर्याप्त अवसर भी नहीं हैं। यहाँ के अधिकांश कुओं का पानी भी खारा है। यमुना तट पर एक प्रसिद्ध प्राचीन कुआँ है, जिसे भूड़ा-कुआँ कहते हैं। मात्र इस कुएँ का पानी अन्य की अपेक्षाकृत शीतल और मीठा है।
बटेश्वर के भदौरिया राजाओं का महल यद्यपि अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़ा है, पर आज भी अपनी भव्यता की कहानी कहता है। इस महल से एक सुरंग नीचे-ही-नीचे यमुना तट के जनानाघाट को गयी थी, जहाँ रानियाँ स्नान करने जाया करती थीं। छोटी लखौरी ईंटों से बना यह किला किसी समय बटेश्वर की शान था। अब तो यह किला झाड़-झंखाड़ और घास-पात से पटा है। बताते हैं कि वर्षा के दिनों में यहाँ अभी भी अकसर चाँदी के सिक्के मिल जाया करते हैं।
बटेश्वर में प्रत्येक वर्ष कार्तिक शुक्ल पक्ष दूज में बहुत बड़ा मेला लगता है। उन दिनों पशुओं-- घोड़ों, ऊंटों, हाथियों और बैलों तथा अन्य जानवरों की खरीद-फरोख्त का यह बड़ा केंद्र रहता है। यहाँ लगने वाले वार्षिक पशु मेले के लिए भी बटेश्वर मशहूर है जो विगत चार शतक से निर्बाध आयोजित किया जा रहा है। यह मेला आज भी अपने विस्तारित रूप में उसी स्थान पर आयोजित किया जाता है जहाँ राजा बदन सिंह के समय में होता था।
यह मेला हिन्दू कैलेंडर की तिथियों पर, सामान्यतः नवम्बर के प्रथम पक्ष में आयोजित होता है। क्योंकि इसका आयोजन बटेश्वर में पूजा करने के सबसे महत्त्वपूर्ण तिथियों के अनुरूप होता है, इसलिए हर वर्ष इसकी तिथियाँ बदल सकती हैं। आमतौर पर इस मेले का आयोजन दीपावली के कुछ दिन पहले शुरू होता है और लगभग तीन सप्ताह तक चलता है। पहले सप्ताह में यहाँ पशुओं और मवेशियों का मेला लगता है। इसके बाद ऊँट और घोड़े लाये जाते हैं। अंत में गधे, खच्चर और बकरियां लाये जाते हैं। मेले के अंतिम सप्ताह में ग्रामीण मेला शुरू होता है जिसमे तमाम तरह की दुकानें, बच्चों के खेलने के झूले आदि लगते हैं। इस विशिष्ट पशु मेले के अवसर पर मंदिरों में विशेष पूजा और आयोजन भी होते हैं।
यह साधु-संतों, व्यापारियों, ग्रामीणों और ऐसे आयोजनों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए एक महत्त्वपूर्ण पर्व है। यहाँ बड़ी संख्या में ऊँट, घोड़े, बैल, हाथी, बकरियां और अन्य मवेशी बेचने और खरीदने के लिए लाये जाते हैं। साथ ही व्यापारी यहाँ बर्तन, मसाले, लकड़ी के सामान, स्थानीय निर्मित फर्नीचर, हस्तशिल्प और घरेलू उपयोग का सामान बेचने के लिए दुकानें लगाते हैं।
यह मेला स्थानीय ग्रामीण जीवन का एक बहुरंगी और जीवंत दृश्य प्रस्तुत करता है जिसमें कोई कृत्रिमता नहीं होती। बटेश्वर का पशु मेला उत्तर भारत के ऐसे सबसे विशाल मेलों में से एक है। भव्यता में इसकी तुलना राजस्थान में लगने वाले पुष्कर मेले से की जाती है।
उत्तर प्रदेश पर्यटन ने कुछ वर्षों पूर्व ही यहाँ यात्रियों के लिए राही पर्यटक बंगला का निर्माण कराया था। इसमें रुकने के लिए पर्यटन निगम की वेबसाईट से बुकिंग कराई जा सकती है। साथ ही तमाम धर्मशालाएं भी हैं, जो नि:शुल्क अथवा नाम मात्र की दरों पर रुकने और भोजन की व्यवस्था कराती हैं। अधिक आरामदेह और सितारा किस्म की रुकने की व्यवस्था के लिए 12 किलोमीटर या बीस मिनट दूर, जरार ग्राम में चम्बल संरक्षण फाउंडेशन की ओर से संचालित चंबल सफारी लॉज एक बेहतर विकल्प हो सकता है।
कुल 12 कॉटेज वाली यह प्रॉपर्टी पर्यावर्णीय दृष्टि से एक उत्कृष्ट स्थान है जहाँ सारी सुविधाएं होते हुए भी एयरकंडीशनरों के इस्तेमाल से परहेज़ किया जाता है। हर मौसम में यहाँ की हरियाली अभूतपूर्व दिखती है। वह बटेश्वर दर्शन के अलावा चम्बल सफारी घुमाने की व्यवस्थाएं और अन्य पर्यावरण-समर्थित गतिविधियाँ भी आयोजित करते हैं। तो आईये, अगर आगरा में आकर आपको एक प्रेम की निशानी ताजमहल, लोदी तथा मुगल वंशजों के अन्य मकबरों, लाल किला और कुछ ऐसे ही स्मारकों को देखने के बाद समय मिले तो देश के इस गौरवशाली हिदू-जैन-मराठा तीर्थ ऐतिहासिक स्थल को भी नमन कर आइये!

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