ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बंदूक की संस्कृति
01-Feb-2016 12:00 AM 2043     

अमरीका के राष्ट्रपति ओबामा अमरीका में जब-तब अकारण होने वाले हादसों के सन्दर्भ में बंदूक-संस्कृति को अनुशासित करने के बारे में जब बोल रहे थे तो उनके आँसू छलक पड़े। जिसे प्याज से लाए नकली आँसू भी कहा गया क्योंकि कहीं की भी राजनीति में न नीति है और न ही राज, हाँ बहुत से घिनौने राज़ ज़रूर छिपे हैं। इस समय अमरीका आतंकवाद से सबसे अधिक डरा हुआ है। उसके बजट का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस अनदेखे और अदृश्य भय से बचाव में खर्च हो रहा है। जब तक वह किसी एक प्रकार की आतंकी चाल से निबटता है तब तक कोई और नई चाल सामने आ जाती है। तिस पर घर में भी, पता नहीं, कोई किशोर, कोई सिरफिरा युवा किसी भी मॉल, सिनेमा हाल, गैस स्टेशन पर कब और क्यों गोलीबारी कर देगा और किस निर्दोष व्यक्ति की जान चली जाएगी। ऐसा भय किसी भी आतंक से कम नहीं है। अमरीका में ऐसे हादसे प्रायः होते रहते हैं। ऐसे में कोई भी रो देगा। हो सकता है हमारे पड़ोसी शरीफ भी रोना चाह रहे हों लेकिन वहाँ के आतंकवादी और सेना उन्हें रोने भी न दे रहे हों। योरप एशिया और अफ्रीका के समस्त भूभाग पर कब्ज़ा कर ही चुका था। कोलंबस की तथाकथित खोज के बाद योरप को समृद्धि, शक्ति और प्रभुता का एक नया लोक दिखाई दिया जिसके लिए योरप के समस्त दुस्साहसी लोग निकल पड़े। ऐसे में साथ में बंदूक नहीं होगी तो क्या कमंडल होगा? इन बंदूकों से वहाँ के मूल निवासियों को मारा, डराया और उनकी ज़मीन और सम्पत्ति पर कब्ज़ा किया, जंगली जानवरों से अपनी रक्षा की, बाद में बंदूकों के बल पर ही काले गुलामों से बेगार ली। सैंकड़ों साल बंदूक के साथ रहते हुए अब बंदूक अमरीका के डीएनए में शामिल हो गई है। हर सप्ताहांत शुक्रवार से ही घरों में मुफ्त डाले जाने वाले विज्ञापनों में सब्जियों के भाव, आपके पड़ोस की पिज़्ज़ा दुकानों में पिज़्ज़ा के रेट के साथ-साथ बंदूकों के भाव के चार पेज वाला विज्ञापन भी प्रायः होता है। इसे देखकर लगता है कि बंदूक भी लोगों के लिए सब्ज़ी-फल की तरह रोजाना की एक आवश्यक वस्तु है। बंदूक के लिए किसी लाइसेंस की ज़रूरत नहीं है। कहीं भी, किसी बंदूक की दुकान पर जाइए, अपना नाम लिखवाइए, क्रेडिट कार्ड के भुगतान कीजिए और बंदूक ले आइए। इतनी सरलता से तो एटा-इटावा में कट्टे और रामपुर में चाक़ू भी नहीं बिकते। माता-पिता बच्चों को जन्म दिन पर पेन-पुस्तक की तरह गन भी गिफ्ट में देते हैं। तभी किसी पाँच साल के बच्चे द्वारा अपनी दो साल की बहिन पर गोली चलाने जैसी बाल-क्रीडाएं हो जाती हैं। यहाँ लोग जब ऑफिस में जाते हैं तो अपनी कार संस्था के परिसर में खड़ी करते हैं लेकिन जिस कार में बंदूक हो उसे अन्दर आने की अनुमति नहीं होती। इस बात से बंदूक संस्कृति का अनुमान लगाया जा सकता है कि अधिकांश गाड़ियां संस्था के परिसर से बाहर ही रहती हैं। एक अनुमान के अनुसार अमरीका में अपनी जनसंख्या से 12 प्रतिशत अधिक बंदूकें हैं। एक सर्वे के अनुसार 28 प्रतिशत सामान्य जनता के पास बंदूकें हैं। हमारे यहाँ बंदूक माननीयों के लिए अभिजात्य का प्रतीक हैं, बाहुबली के लिए बल-प्रदर्शन का और छोटे-मोटे अपराधी के लिए जीवकोपार्जन का साधन है। इसलिए राजनैतिक रुतबेदारों से लेकर धारावी के उचक्के तक के पास वैध या अवैध बंदूक मिल जाएगी। हमारे शास्त्रों में जब भी कोई देवता किसी भक्त को कोई दिव्यास्त्र देता है तो पहले उसकी पात्रता जाँचता है और फिर उसके उपयोग की परिस्थितियाँ और नियम तय करता है। इससे यह समझ में आता है कि किसी अस्त्र-शस्त्र और शक्ति के साथ उसके उपयोग का विवेक बहुत आवश्यक है। अपात्र को दिया वरदान, शक्ति, पद, धन या अस्त्र-शस्त्र और यहाँ तक कि शास्त्र भी समाज के कष्ट का कारण बनता है। लोकतंत्र के नाम पर अपात्रों को बहुत कुछ ऐसा पहुँच गया है जो समाज के लिए सुखद नहीं रह गया है। तभी कहा गया है- बन्दर के हाथ में उस्तरा। प्रसाद के नाटक "चन्द्रगुप्त' में अपने भाष्य के सुधार के लिए कारागार में अपने पास पहुंचे कात्यायन से चाणक्य कहता है- कात्यायन, कुत्ते और इंद्र में अंतर करना मैं जानता हूँ। अपात्र के हाथों में अधिकार चले जाने का सुख मैं भोग रहा हूँ। भाषा से पहले मैं मनुष्य को सुधारना चाहता हूँ। इसलिए किसी को कुछ विशेष मिलने से पहले उसकी मनुष्यता और विवेक का विकसित होना आवश्यक है।

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