ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बंधन में स्पंदन
01-Dec-2016 12:00 AM 2243     

तुझे क्या हुआ?
तू तो ठीक है, मस्त है
पका पेड़ है, फिर भी स्वस्थ है
मेरा क्या?
माँ मेरा क्या....

कर्तव्यों की सूली पर चढ़ा हूँ
अधिकारों की बाढ़ में फंसा हूँ
जरूरतें द्रौपदी का चीर हैं
मन में पीर ही पीर है...

बच्चों की परवरिश में
सुबह से रात तक
दफ्तर की चक्की में पिसता हूँ
बीवी की एक मुस्कान के लिए
तरसता हूँ
देर रात को आता हूँ
खुद खाना लेकर खाता हूँ
सबको खुश करने के फेर में
अकेले आंसू बहाता हूँ
माँ अवाक रह गई...

अभावों में कभी
इतना दुखी न था मेरा अंश
सुखों ने दे दिए उसे
अनगिनत दंश
माँ सब उम्मीदें भूल गई
अपने जाये के
दुःख में डूब गई
बेशर्तों का यह बंधन
स्पन्दन और सिर्फ स्पंदन।

जब माँ फोन पर कहती है
बेटा, मेरी चिंता मत कर
उस समय वह सोचती है
बेटा कहेगा
माँ तेरी चिंता रहती है
अकेली जीवन जीती है
बीमारी-हारी
सब अकेली झेलती है
सुनाई देता है
माँ चिंताएं बहुत हैं...

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