ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बाबाओं के कुम्भ में एक जिज्ञासु
01-Apr-2016 12:00 AM 2708     

सब कुछ अविस्मरणीय... अकल्पनीय... सपना सच होने जैसा। धर्मप्राण जनता-जनार्दन के अंत:करण में हिलोरे मारती आस्था और व्यवस्था के बीच अव्यवस्था का आनंद। संगम स्नान के तदंतर हर चेहरे पर खिली अजब सी मुस्कान मानो बताती है कि अमृतपान हो गया है। ठाठ बाबाजी लोगों के हैं। देश की अलग-अलग सभ्यता संस्कृति खेमों में नजर आती है। कहीं दक्षिण से आए बाबाजी अपनी चेला कंपनी के साथ धूनी रमाए हैं तो कहीं गोरे चिलम से सुट्टा मारते अपनी ही धुन में रमे हैं। ध्वनि विस्तारक से आवाज गूंज उठी है- "मेला क्षेत्र में कोई भी आदमी अगर साइकिल से घूमता पाया जाएगा तो छुच्छी खोल दी जाएगी।' नागा बाबाजी लोग फुल मौज में हैं। धीमी आंच वाले अलाव उन्हें ज्यादा मुफीद लगते हैं ऊपर से गांजे की गर्मी उन्हें तरोताजा रखती है।
कुम्भ का अजब संसार है। कल्पवासी भक्तिभाव की दुनिया में मगन हैं। एक जगह बुंदेली गाना बज रहा है। मालूम चला चाट विक्रेताजी ने कैसेट चला रखा है। धर्म के बीच स्वाद की परवाह भी करता है कुम्भ। लोक गायिका उर्मिला त्रिपाठी की सुरीली आवाज बुलंद होती जा रही है- "आंगने में कुइयां राजा डूब के मरूंगी।' कुम्भ की दुनिया जितनी रहस्यमय है उतनी ही फटाफट भी। जितनी जल्दी यह संसार बसता है उतनी ही जल्दी उजड़ता भी है लेकिन बसना और उजड़ना दोनों ही दृश्य आंखों में बस जाते हैं।
जैसे ललिता की आंखों में बसे हैं। यह संयोग ही है कि वे कभी कुम्भ स्नान को नहीं गर्इं। न ही कभी इस बारे में सोचा था। उनकी मां भी कभी नहीं गई इस अमृत पर्व में, लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब ललिता ने कुम्भ की यात्रा ही नहीं की बल्कि कुम्भ को भरपूर जिया। उनकी स्मृतियों और अलबम में कुम्भ हर समय जीवंत है। कहती हैं, कुम्भ के रहस्य जानने और समझने के लिए साधना जरूरी है। ललिता पांडेय उत्तर प्रदेश शिक्षा विभाग में बड़ी अफसर हैं। मूलत: गोंडा जिले की निवासी हैं। गोंडा, अयोध्या से सटा हुआ जिला है। धर्म वहां के लोगों की रग-रग में बसता है। देश-विदेश में घूमते रहना उनका प्रिय शगल है। ललिता मानसरोवर की यात्रा भी कर चुकी हैं। जल्द ही यात्रा संस्मरणों को पुस्तकाकार देने की भी तैयारी में हैं। उनकी स्मृतियों में कुम्भ के दृश्य आज भी चलचित्र की भांति चलते हैं :
कैसे मूड बना कुम्भ यात्रा का?
न कभी गए थे, न कभी सोचा था। परिवार का भी कभी कोई कुम्भ स्नान को नहीं गया था। मन में यह विचार जरूर उमड़ता रहता था कि हर १२ बरस बाद कुम्भ पड़ता है। आखिर लोग क्यों जाते हैं कुम्भ? इतनी आस्था? बिना किसी निमंत्रण के बिन बुलाए मेहमान सरीखी भीड़ क्यों उमड़ पड़ती है? क्या ऐसा है जो अंबानी से लेकर अडानी तक को यहां खीच लाता है? बरस २०१३ में विचारों की इसी उधेड़बुन में कुम्भ यात्रा की ठान ली और निकल पड़ी प्रयागराज।
क्या तैयारी की यात्रा की?
अकेले थी। टेंट में रहना था सो कुछ खास तैयारी नहीं करनी पड़ी। बस एक अदद बेहतरीन कैमरा खरीदना नहीं भूली, लोभ था कि नजारे कैद हो जाएंगे तो यादें ताजा बनी रहेंगी। हो सकता है शायद कहीं कुछ अनूठा देखने को मिल जाए।
कैसा अनुभव रहा?
जिंदगी में सर्वथा पहली बार संगम में स्नान किया। विलक्षण अनुभव था। शब्दों में उसे नहीं बांधा जा सकता। मंत्रमुग्ध और चमत्कृत सी थी मैं। स्नान के बाद खुद को निहाल पा रही थी। लग रहा था मानो सारा पुण्य अपनी गठरी में सिमट आया है। एक अजब सी सुखानुभति हो रही थी। स्नान के बाद समझ में आने लगा था कि क्यों कुम्भ स्नान को आते हैं लोग। सब कुछ आश्चर्यजनक। अब तो तय कर लिया है कि हर बार आएंगे, बार-बार आएंगे।
कैसा रहा शाही स्नान देखने का अनुभव?
कोशिश थी कि यह विलक्षण मौका हाथ से न जाने पाए। इसी बिना पर तड़के साढ़े तीन बजे उठ गई थी। कैमरा टांगा और अखाड़े के सामने जा पहुंची। गले में फूलों की माला डाल ली ताकि कोई रोके या टोके न। शाही स्नान के बारे में पढ़ा और सुना तो बहुत कुछ था लेकिन पहली बार रूबरू होने की खुशी में खासी रोमांचित भी थी। तय समय पर बाबाजी लोग निकल पड़े। बाल सुलभ तरीका था सभी का। एक अजीब से उत्साह में सराबोर सारे बाबाजी संगम की ओर कूच करने लगे। होड़ सी थी कि कौन आगे निकले। इस होड़ पर कंट्रोल के लिए एक बड़े भीमकाय बाबाजी हाथ में दंड लेकर सबको टाइट भी करते जा रहे थे। दिन-रात का यहां भेद मिट गया था। फिर तो हिम्मत आ गई। अग्नि अखाड़े से लेकर जूना अखाड़े तक के सारे शाही स्नान देखे। जब अपने डेरे पर पर लौटी तो थकान से चूर थी। पैदल चलते शरीर जवाब दे चुका था लेकिन संगम स्नान के लोभ में हिम्मत बटोरी और फिर सांझ ढले संगम स्नान किया।
कुम्भ मेला क्षेत्र के अनुभव क्या रहे?
बगल में कैमरा लटका था सो सारे बाबाजी लोग प्रेम से मिलते। चिलम भी ऑफर करते। एक बाबाजी से जब यह कहा कि चिलम पी तो सकती हूं लेकिन पीना नहीं आता। आप सिखा देंगे तो मजा ले सकूंगी। बाबाजी ने कहा- "इतना टाइम नहीं है कि तुम्हें चिलम पीना सिखाऊं।' शाही स्नान के दौरान जरूर कुछ बाबाजी कभी क्रुद्ध और कभी व्यग्र दिखे वरना प्रत्येक बाबाजी ज्ञानी, शांत और सामान्य ही दिखे। कुछ बाबाजी तो सामने आकर मिलना भी पसंद नहीं करते। बस, शांति के साथ साधना में लीन रहना ही उन्हें गंवारा था। विद्युत, साउंड दोनों के ही व्यापक और मुकम्मल इंतजाम थे। विचार भी कौंधा कि जब यहां इतना सुंदर इंतजाम हो सकता है तो फिर सामान्य तौर पर क्यों नहीं किया जा सकता?

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