ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आज़ादी के विरोधाभाष
01-Aug-2016 12:00 AM 1807     

आज़ादी एक बहुआयामी शब्द है। मूलतः यह राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैचारिक, धार्मिक हो सकती है। किसी भी देश और सभ्यता की दीर्घकालिक उन्नति एवं सम्पन्नता के लिए यह आवश्यक है कि उसका पूर्णतः आज़ाद अस्तित्व हो। भारत सदियों से हर प्रकार से एक अत्यन्त संपन्न एवं उन्नत देश रहा था किन्तु बाद में इसे परतंत्रता का कड़वा घूँट पीना पड़ा। लेकिन जैसे हर काली रात के बाद सुखद सुबह आती है वैसे ही गुलामी की एक लम्बी अंधियारी रात के बाद, अनगिनत वीर शहीदों के अथक प्रयास से जब फिर से आज़ाद हुए तो एक नयी सुबह ने हमारा स्वागत किया। राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के साथ ही धीरे-धीरे अन्य क्षेत्रों में भी परिवर्तनों का दौर चला और सभी के सम्मिलित प्रयासों से हमने आज़ादी के अन्य सोपानों को भी हासिल किया। परिवर्तनों और प्रयासों का यह क्रम अनवरत जारी है।
शिक्षा के अभूतपूर्व प्रचार एवं प्रसार से न केवल भारत में बल्कि हमने दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी बुद्धिमत्ता का लोहा मनवाया और एक बेहतर भविष्य एवं सफलता की नयी ऊंचाइयों को छूने की चाह में हममें से कुछ विदेशों में अपने भाग्य आजमाने चले आये और उनमें से भी कुछ वहीं बस गए। आम भारतीयों की एक बहुत सहज एवं सरल प्रवृत्ति है कि हम दुनिया के किसी भी हिस्से में कहीं भी जाएं या रहें वहां की सभ्यता, संस्कृति के साथ शीघ्र ही समरस हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों के साथ है।
भारत में रहने के दौरान हर वर्ष किसी न किसी रूप में आजादी-दिवस मनाने का अवसर मिलता रहा। चाहे वो स्कूल हो या कॉलेज या फिर कार्यस्थल।  प्रवासी भारतीय चूंकि भारत में ही जन्मे, पले-बढ़े और वहीं आधारभूत शिक्षा भी ग्रहण की है तो भारत की आज़ादी के बाद चाहे विश्व के किसी भी हिस्से में बस गए हों, वे आज भी भारत के मूलभूत सामजिक मूल्यों, उसकी सांस्कृतिक विरासत एवं आज़ादी के इतिहास को आत्मसात किये हुए हैं।
किन्तु चिंतन का विषय ये है कि इन प्रवासी भारतीयों की अब जो अगली पीढ़ी है, जिसका जन्म कहीं भी हुआ हो चाहे देश में या विदेश में, लेकिन उनकी शिक्षा-दीक्षा यदि विदेशों में हो रही है, वे कैसे भारतीय संस्कृति, सभ्यता और हमारे आज़ादी के इतिहास के संवाहक बनेंगे। क्या हम उन्हें ये सब बताना जरूरी नहीं समझते, यदि हाँ तो कैसे और क्या करें और यदि नहीं तो यह और भी भयावह है। क्योंकि वे मूल रूप से भारत के ही रहेंगे पर उसके बारे में अनजान। यह स्थिति न तो उनके लिए सर्वथा अनूकूल है न ही हमारे देश के लिए। यदि हम उन्हें आज अपने देश की इन महान विरासत से अवगत नहीं कराते हैं तो इस देश से कभी वैचारिक एवं आत्मिक रूप से जुड़ नहीं पाएंगे।
केवल शिक्षा और एक अर्थपूर्ण शिक्षा देने और पाने में अंतर है। अर्थपूर्ण शिक्षा न केवल विभिन्न विषयों का ज्ञान देती है बल्कि अन्य मानवीय मूल्यों को भी आपसे परिचित कराती और पोषित करती है जो एक मनुष्य के चारित्रिक उत्थान एवं सुदृढ़ व्यक्तित्व के लिए बहुत आवश्यक है।
भारत की शिक्षा प्रणाली बहुमुखी शिक्षा प्रणाली है जो केवल ज्ञान-विज्ञान से ही नहीं बल्कि ये हमारे महान इतिहास और आज़ादी की गौरवपूर्ण गाथा से जुड़ी है जिसको पढ़कर और समझकर हममें अनेक चारित्रिक गुणों - साहस, धैर्य, दृढ़ता आदि का विकास होता है और जीवन में अपने व्यक्तिगत उद्देश्यों की पूर्ति के अलावा समाज तथा देश के लिए भी निःस्वार्थ कुछ कार्य करने के लिए प्रेरणा मिलती है।
ये सोचनीय है कि विदेशों में पल-बढ़ रही हमारी पीढ़ी इस समग्र शिक्षा प्रणाली से वंचित रह रही है। हम प्रवासी भारतीयों के लिए ये चुनौतीपूर्ण है कि हम ऐसा कौन-सा कदम उठाएं जिससे अपने बच्चों को केवल एक सफल नहीं बल्कि एक सार्थक जीवन जीने की दिशा दिखा सकें।
आज के भौतिकतावादी, दिखावे एवं एक दूसरे से येन-केन-प्रकरण बस आगे निकलने की धुन में हम यह भूल रहे हैं कि हमारे इस बेहतर भविष्य के लिए कितनी जानी-अंजानी महान विभूतियों ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया। उनके इस अमूल्य बलिदान को सिर्फ उनका व्यक्तिगत कत्र्तव्य न समझकर देश और समाज के प्रति उनके दूरगामी और विस्तृत उद्देश्य को समझें। यदि वे सिर्फ अपने और अपने परिवार के बारे में ही सोचते और हमारी आज़ादी की लड़ाई की दुर्गम राह न चुनते तो हमें ये आज़ादी की उन्मुक्त हवा में सांस लेने का अवसर कैसे मिलता।
आज हम वैश्वीकरण के बहाव में बहकर और एक भेड़ चाल का अनुसरण कर दिशाहीन होते जा रहे हैं। सोचते हैं कि क्या हो जायेगा यदि हमारे बच्चों को ये सब नहीं मालूम, ये आज़ादी, ये इतिहास की बार-बार दुहाई महत्वहीन है आज के तीव्रगामी दौर में। इससे उनके आगे बढ़कर जीवन के अपने लक्ष्य को साधने में कोई कठिनाई नहीं होगी। अनेकों और ऐसे ही कितने तर्क-कुतर्क हमारे मष्तिष्क में आते हैं लेकिन हम अभी ये नहीं सोच पा रहे हैं कि हमारी इस संकुचित सोच का दूरगामी परिणाम कितना आत्मघाती होगा हमारी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए। एक समय ऐसा आएगा कि हमारी आगे आने वाली पीढ़ी का अपना कोई इतिहास नहीं रह जायेगा। वो यद्यपि विदेश कि नागरिता हासिल कर चुके होंगे पर उनकी मूल जड़ें वहां से न जुड़ी होने के कारण वे न तो पूरी तरह विदेश के हो पाएंगे और न ही भारत के, क्योंकि हमने समय रहते उन्हें भारत से जोड़ने का ऐसा कोई प्रयास ही नहीं किया। वो आगे चलकर किस पर गर्व कर पाएंगे और अपनी अगली पीढ़ी को कैसे एक अर्थपूर्ण शिक्षा दे पाएंगे जब उन्हें ही इन तथ्यों के बारे में कुछ पता नहीं होगा। एक व्यक्ति, देश, समाज और सभ्यता के दीर्घकालीन अस्तित्व के लिए ये अत्यंत आवश्यक है कि वो अपने इतिहास का मंथन करता रहे, उससे जुड़ा रहे, उसे आत्मसात करता रहे और इस तरह अपनी विश्व में एक पहचान कायम रखने में सक्षम रहे। विश्व में आदिकाल से समय-समय पर अनेकों सभ्यताएं पनपीं और मिट गयीं क्योंकि वे उनका पीढ़ी-दर-पीढ़ी सही संरक्षण एवं संवहन नहीं कर पायीं। तो क्या हम भी वही चाहते हैं, ये एक ज्वलंत प्रश्न हम सबके सामने मुंह बाए खड़ा है।
ये अत्यंत खेदपूर्ण है कि कुछ प्रवासी भारतीय प्रतिवर्ष आज़ादी का उत्सव मनाने और अमर शहीदों की याद करने का आडम्बरपूर्ण दिखावा करते हैं और किसी फ़िल्मी हस्ती को बुलाकर, बड़े आयोजन कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। इससे क्या उद्देश्य सिद्ध होता है, ये समझ से परे है।
आज जरूरत इस बात की है कि हम नकारात्मक तथ्यों के बारे में ज्यादा ना बोलकर, कुछ सकारात्मक सोचने और उसके अनुकरण में अपनी ऊर्जा लगाएं और अपने देश एवं समग्र समाज के उज्जवल भविष्य को सुनिश्चित करें।
यहाँ अमेरिका में भी कुछ एक संस्थाएं हैं जो भारत की संस्कृति एवं भाषा को संवरण और संवहन के कार्य में उल्लेखनीय योगदान दे रहीं हैं , जिनका निश्चित ही दूरगामी सुखद परिणाम होगा। लेकिन हमारी अगली पीढ़ियों को उनकी संपन्न विरासत से जोड़े रखने के लिए केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। हमें मिलकर, देश-विदेश की सीमा से परे हटकर समय रहते कुछ ठोस और सशक्त कदम उठाने होंगे जिसमें न केवल प्रवासी भारतीयों का बल्कि भारत के लोगों का भी सहयोग अनिवार्य है।

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