ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
आज़ाद हूँ दुनिया के चमन म
01-Aug-2016 12:00 AM 1487     

आह! यह बेरोकटोक जीने का अहसास मन को मुदित कर देता है। यूँ भी क़ैद में कौन रहना चाहता है हुज़ूर? लोग बाग़ तो धरती की सीमाओं को तोड़कर आकाश में उड़ना चाहते हैं। पर क्या यह सम्भव है? रूसो के अमर शब्दों में "आदमी आज़ाद पैदा होता, मगर हर तरफ हम उसे ज़ंजीरों में बंधा देखते हैं।" जी हाँ नियम-क़ानून, रीति-रिवाज़, धर्म-मर्यादा, दोस्तों का दबाव (peer pressure) और तो और खामखाँ का डर कि "लोग क्या कहेंगे" मकड़ी के जाले की तरह पूरी तरह जकड़े रहता है। इन सबसे बग़ावत करने के लिये बड़े दिल-गुर्दे की ज़रूरत होती है। भई माना कि किसी किसी में दिल-गुर्दा भी होता है, लेकिन क्या वो काफ़ी है? अरे भैया पंछी को भी आज़ादी से सैर करने के बाद धरती पर आना पड़ता है - बसेरे के लिए। आकाश में ना तो शाख-ऐ-गुल मयस्सर है, ना ही मकान की परछत्ती। यही नहीं दाना-पानी भी "हमी अस्तो, हमी अस्तो, हमी अस्त"। अमीर खुसरो ने तो यह हमारे कश्मीर के लिये कहा था, पर यह अपने  planet earth के लिए भी सम्यक है।
सोचने वाली बात यह है कि हमें आज़ादी आखिर चाहिए किस चीज़ से? देखो भैया नंबर एक, भूख-प्यास से आज़ादी मांगना जायज़ है। उसके लिये मेहनत-मशक्कत करो और आज़ाद रहो। दूसरा कोई बन्दा थोड़े ही आपके घर राशन-पानी लाकर देगा या आपके मुँह में निवाला डालेगा। नंबर दो - बीमारी से निजात मांगना भी वाजिब है -- उसके लिये, साहबान, पौष्टिक खाओ, सफाई से रहो और थोड़ी बहुत कसरत करो। ये कोकाकोला, पित्ज़ा, सड़क किनारे खड़े होकर गोल-गप्पों का सेवन करके आप चाहें कि आप बीमार ना पड़ें - क्या यह ज़्यादती नहीं है? ऊपर से लोग-बाग़ "आराम बड़ी चीज़ है मुँह ढंक सोइये" कह कर शारीरिक श्रम को भी तिलांजलि दे देते हैं। ऐसे आलसियों को कीटाणु नहीं पकड़ेंगे तो किसको पकड़ेंगे? आज़ादी कमानी पड़ती है कोई भीख में नहीं मिलती। खैर, आगे चलें।
तीसरे नंबर का सबसे बड़ा बन्धन होता है धर्म का बन्धन। वैसे तो व्यक्ति के नाम की तरह धर्म भी माँई-बाप की ही देन होता है। लेकिन अगर हम नाम बदल सकते हैं तो धर्म क्यों नहीं? आख़िर आज़ादी हमारा हक़ है। बस सोचने वाली बात यह है कि फ़र्क़ क्या पड़ेगा? आपका नाम राम हो या श्याम, सीता हो या गीता -- हुज़ूरेवाला, किसी की सेहत पर कोई असर नहीं होता। नाम बस नाम होता है, इससे लोगों को पहचानना ज़रा आसान होता है। इसी प्रकार मुख़्तलिफ़ महज़ब के लोगों ने मुख़्तलिफ़ नामों से - भगवान, ख़ुदा, गॉड आदि उस महाशक्ति को पुकारना शुरू कर दिया जो दरअसल एक ही है। सहबान! आप नमाज़ पढ़ें - अजान लगायें, मंदिर में जाकर भजन गायें - घंटियां बजायें या गिरजाघर में जाकर "save me Jesus" कहकर आमीन कहें - ऊपर वाले को सब भाषायें आती हैं। नहीं भी आती हों तो उस सर्वशक्तिमान के पास  auto-translation की सुविधा है। आखिर वह सर्वज्ञानी भी तो है। अब आप पूछेंगे कि "तो फिर इसका इलाज क्या है?" शांत गदाधारी भीम शांत। इसका इलाज एकदम सीधा सादा है। हिम्मत से काम लो और किसी भी धर्म को मत मानो। हा हा है ना सीधा-सरल उपाय! डरो मत भाईजान। हम आपको अधर्मी होने को नहीं कह रहे हैं। हम तो बस एक सच्चाई बता रहे हैं। धर्म, आस्था, विश्वास व्यक्ति के अपने होने चाहिये, उस पर थोपे नहीं जाने चाहिये। हम तो अपनी बात जानते हैं। हमारा परिवार बड़ा धार्मिक था (अभी भी है)। हम भी कोई नास्तिक नहीं हैं। लेकिन ज़्यादातर मसलों को तर्क की कसौटी पर ज़रूर परखते हैं। आस्था, विश्वास अपनी जगह हैं परन्तु अंध-विश्वास में हम ज़रा भी यकीन नहीं करते। अंध-भक्त ही आसाराम जैसे पाखंडियों के चक्कर में पड़ जाते हैं। हम तो अवतारों को भी नहीं छोड़ते। महज़ एक धोबी के अनर्गल जुमले पर राम ने सीता को घर से निकाल दिया, वह भी धोखे से (हिम्मत जो नहीं थी मुंह दिखाने की)। हमने अपने न्यायाधीश पिताश्री से पूछा कि यह कैसा न्याय था मर्यादा पुरषोत्तम का? वो एक धोबी से डर गये - कैसे राजा थे! निहायत धार्मिक अब्बाजान ने इस सवाल को हमारा कुतर्क कह कर हमें फटकार दिया। बस साहबान तभी से हमने जय श्री राम कहना छोड़ दिया।
संयुक्त परिवार था अतः घर में पंडित, महंत, ज्योतिषी आदि का आवागमन होता रहता था। हम उन्हें भक्ति नहीं बल्कि निरपेक्ष भाव से देखते थे। देखते क्या ताड़ते थे। उनकी असलियत, जो बाकी लोग नहीं देख पाते थे, हम परख लेते थे। सुना है ना- "देखा है ज़िंदगी को कुछ इतना क़रीब से, चेहरे नज़र आने लगे हैं अजीब से।" गड़बड़ तब हुई जब अम्मी-अब्बा ने पूछा कि हम बाबा लोगों को साष्टांग प्रणाम क्यों नहीं करते। (नमस्ते काफी नहीं थी)। हमने बेबाक उत्तर दिया-- हम भी सर में दिमाग़ रखते हैं, काश पूछो कि असलियत क्या है।
चचा ग़ालिब भले ही हमें माफ़ कर दें, हमारे अब्बाजान ने नहीं किया। ख़ैर, हम भी उन्हीं की बेटी हैं - नतीज़ा - वो दिन और आज का दिन, हमने सब मंदिर, मस्जिद और गिरजाघरों की सैर करनी बंद कर दी। कर लो क्या करो। भाई मेरे यह भी एक तरीक़ा है धार्मिक आज़ादी का।
एक पते की बात बतायें? लोग बाग़ धर्म को आस्था और भक्ति के लिए नहीं स्वार्थ के लिये भी इस्तेमाल करते हैं। राजनेता तो ख़ैर हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई वाली राजनीति करते ही हैं ; आम आदमी भी इश्क़-मुहब्बत की ख़ातिर कुछ भी कर गुज़रने पर आमादा हो जाते हैं -- मसलन दूसरी या तीसरी शादी के लिये झट इस्लाम क़ुबूल कर लेते हैं। कुछ वक़्त के बाद गंगा नहा कर घर वापसी कर लेते हैं यानि फिर हिन्दू बन जाते हैं। इसे कहते हैं नियम क़ानून में थ्दृदृद्र ण्दृथ्ड्ढ का प्रयोग करना।
आगे बढ़ते हैं। साहबान आज़ादी बरिबंडता का नाम नहीं है। आज़ादी एक सोचने का तरीक़ा है - ठ्ठ द्मद्यठ्ठद्यड्ढ दृढ थ्र्त्दड्ड. हमें आज़ादी चाहिये विकृत मानसिकता से। चोर-डाकुओं की बात छोड़ें। वे लोग तो कई बार परिस्थितियों का शिकार होते हैं। हम बात कर रहे हैं थ्र्त्द्मदृढ़न्र्दन्र् की, बलात्कारियों की, स्त्री-विरोधी मानसिकता की। क्यों लोग अपने काम से काम ना रख कर औरतों के कपड़ों पर नज़र रखते हैं - उन्हें घर में बन्द रखना चाहते हैं। औरतों के साथ दुव्र्यवहार करके औरतों को ही दोषी क़रार दे देते हैं। इस घृणित एवं रूढ़िवादी सोच से आज़ादी परम आवश्यक है। जैसा कि हर नियम-क़ानून के साथ होता है, वो चाहें दहेज़-विरोधी क़ानून हो या वैवाहिक-बलात्कार क़ानून। स्त्रियों के सम्मान की रक्षा के लिये बनाये गये क़ानून का भी दुरुपयोग किया जा सकता है। अरे भैया "सकता नहीं हैं" हो रहा है।
देखो ना मायावती ने दयाशंकर द्वारा प्रयोग किये गये अपशब्दों का विरोध किया। एकदम सही किया। मामले की नज़ाक़त भाँपते ही दयाशंकर जी ने माफ़ी मांग ली। (मुलायम ने आजतक अपने "लड़के आखिर लड़के हैं" वाले जुमले पर माफ़ी नहीं मांगी, लेकिन वो और बात है) यूँ तो मामला वहीं रफ़ा-दफ़ा हो जाना चाहिये था, लेकिन माया ठहरीं माया (खुदा ख़ैर करे) वो हाथ आया मौक़ा कैसे छोड़ देतीं। बोलीं कि माफ़ीनामा काफ़ी नहीं। भाजपा ने अक़्लमंदी से काम लिया और दोषी को पार्टी से बर्खास्त कर दिया। देखा जाये तो पूरी घटना में अब कुछ दम नहीं बचा था, मगर राजनेताओं को क्या पता कि अक़ल बड़ी या भैंस (आज़म खान से पूछ लिया होता) माया ने अपना "हल्ला बोल" आंदोलन जारी रखा। केजरीवाल की तरह माया का द्रद्वडथ्त्ड़त्द्यन्र् द्मद्यद्वदद्य भी कुछ हद तक सफल रहा, लेकिन जब वो अपनी ही प्रचारित लक्ष्मन रेखा पार कर गयीं और दयाशंकर की बीबी तथा नाबालिग बेटी के लिये अभद्र शब्दों का प्रयोग किया तो बाज़ी पलट गयी। देखा! बहनजी भी बरिबंड हो गयीं। औरतों के सम्मान की दुहाई देते-देते खुद औरतों की इज्जत-हतक कर बैठीं। जितनी भी सहानुभूति अर्जित की थी वो सब व्यर्थ हो गयी। गयी भैंस पानी में (माया की आज़म खान की नहीं)।
अब भगवन्त सिंह मान को ही ले लो। च्ड्ढथ्ढ ढ़थ्दृद्धत्ढत्ड़ठ्ठ-द्यत्दृद के चक्कर में देश की सुरक्षा को ही दांव पर लगा किया। शर्मिंदा होने की जगह लोकतन्त्र और व्यक्तिगत आज़ादी की बात करते हैं। धन्य हो महाराज। सच तो यह है भैया कि आज़ादी के भी कुछ दायरे होते हैं। डार से बिछड़ा पत्ता आज़ाद नहीं अनाथ हो जाता है। आवश्यकता से अधिक स्वतंत्रता मांगने वाले लोग अंत में वही गाना गाते दिखाई देते हैं जो एक मज़लूम गा सकता है -- ना कोई उमंग है, ना कोई तरंग है, मेरी जिंदगी है क्या, एक कटी पतंग है"।
चलते चलते : हुज़ूर-माई बाप! जो देश-द्रोही तथा अलगाववादी बशर हमारे वतन में पनप रहे हैं; जिन्हें इस देश से आज़ादी चाहिये -- उन्हें आज़ाद कर दो - देश से (जलावतन) या फिर इस दुनिया से (जन्नत नशीन कर के)। अल्ला अल्ला खैरसल्ला। शब्बाख़ैर।

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