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अविस्मरणीय कबीर
01-Jun-2016 12:00 AM 2383     

कबीर किसी धर्म के प्रवर्तक नहीं मात्र मानवता और सत्य के पुजारी हैं। वे संसार में रहते हुए सांसारिक मोह से परे, सत्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। फक्कड़ कबीर ने समाज की प्रचलित कुप्रथाओं की खुलकर निंदा की। फलस्वरूप जीवन में बहुत सारी कठिनाइयाँ झेलीं और कहा तो यहाँ तक जाता है कि उन्हें हाथी तले कुचलवा कर मृत्यु की सज़ा दी गई। जीवन त्याग दिया पर सत्य के प्रति अडिग रहकर अमरत्व प्राप्त किया। आज छह सौ साल बाद भी कबीर की वाणी सम्मान और चर्चा का विषय बनी हुई है।
जैसे घोड़े को पानी के पास ले जाया जा सकता है, पर उसे पानी पीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, वैसे ही कबीर अपनी स्पष्ट और सरल भाषा के बावजूद सभी स्वतंत्र प्राणियों को अपनी मान्यताओं की घुट्टी तो नहीं पिला सकते थे।
हीरा तहाँ न खोजिये, जहाँ कूँजड़ा हाट
बाँधो चुप की पोटरी, लगाहु अपनी बाट
कबीर ने अपनी सूझ-बूझ से हर मानसिक स्तर के प्राणियों तक अपनी बात पहुँचाने का प्रयास किया है। कहीं मुसलमानों और हिन्दुओं की कुरीतियों और भ्रष्टाचार पर तीखा वार किया है तो कहीं जीवन में निंदक की महत्ता को उजागर किया है।
ई·ार की अनुकम्पा से धनवान और संपन्न होकर भी जो ज़रूरतमंद की मदद नहीं करते उनके जीवन की निरर्थकता पर फक्कड़ कबीर कटाक्ष करते हैं।
कबीर ने नीति और ¶ाुद्ध भक्ति का मार्ग दिखाया है, जिसमें ह्मदय की पवित्रता और सत्भाव की महत्ता समझाई है। आत्मज्ञान और प्रभु में आस्था हो तो कोई ठग नहीं सकता।
माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरत सब दे¶ा / जा ठग ने ठगनी ठगी, सो ठग को आदे¶ा।
दास कबीर जतन करि ओढ़ी / जस की तस धर दीन चदरिया।
इन पंक्तिओं में उनका आत्मवि·ाास झलकता है। गुरु तो वही सच्चा और अनुकरणीय है, जो निर्भय और स्पष्टवादी हो। अज्ञानी लोग मथुरा और का¶ाी आदि तीर्थ स्थानों में ¶ाांति और ई·ार प्राप्ति के लिए भटकते हैं पर अ¶ाांति और पछतावा ही हाथ लगता है।
अत्यधिक धन का न¶ाा मनुष्य को विक्षिप्त कर देता है। कबीर कहते हैं कि दस द्वार के ¶ारीर में बसने वाली स्वतंत्र आत्मा प्रायः यातना सहते हुए भी ¶ारीर में बास करती है, उसका रहना, उड़ जाने से अधिक अचरज की बात है। जैसे तूफ़ान और आंधी दरख्त को झकझोर देते हैं, कुछ टहनियां टूट भी जाती हैं, पर जब तूफ़ान ¶ाांत हो जाता है तो वृक्ष पुनः अपनी पूर्व स्तिथि में आ जाता है, उसी तरह कुछ लोग कबीर के ¶िाक्षण से प्रभावित हो कर सदैव के लिए बदल जाते हैं और विवेकपूर्ण सजग जीवन जीते हैं पर प्रायः अन्य व्यक्तियों पर प्रभाव अस्थायी रहता है और उन अभागों पर कबीर की छाप नहीं पड़ पाती।
कबीर, जिनके लिए कहा जाता है, मसि छुयो नहीं... ऐसे अपढ़-ज्ञानी और दृष्टा के विचार और कथन पर आज भी ¶ाोध कार्य जारी है। कबीर की कथनी और करनी में भेद नहीं था। उलट्वासियों के माध्यम से कबीर ने परमे·ार के रहस्यमयी संसार की झांकी दी है, जिसे समझने या प्रमाणित करने की कोई आव¶यकता नहीं समझी। इनकी रचना श्रद्धा से अपनाने और नैसर्गिक आनंद की अनुभूति के लिए की गयी है। कबीर की वाणी में वह जादू है कि पाठक उसके अध्ययन में डूबता-उतरता, अचंभित-आनंदित होता रहता है और अथाह ज्ञान सागर में रह कर भी प्यासा ही रहता है और जानने और पाने की चाहना बनी ही रहती है

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