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लेखक के निर्माण की प्रक्रिया पर दृष्टि
01-May-2019 04:31 PM 1019     

रावसाहेब कसबे मराठी के बहुत बड़े विचारक-लेखक हैं, उनका समग्र साहित्य हिंदी अनुवाद में संवाद से प्रकाशित हो रहा है। दो पुस्तकें पहले छप चुकी हैं -- आंबेडकर और माक्र्स, मनुष्य और धर्मचिंतन। चार किताबें जनवरी, 2019 में प्रकाशित हो गई हैं। भारत में सामाजिक परिवर्तन को दिशा देने वाली ये पुस्तकें हैं। उनकी पुस्तक "देशीवाद" में देश के बौद्धिक जीवन और बुद्धिजीवी-निर्माण की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं, जो हिंदी के बौद्धिक वातावरण के लिए सर्वाधिक प्रासंगिक विषय है।
भारत इतिहास के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें एक बुद्धिजीवी, लेखक, रचनाकार का कत्र्तव्य क्या है? एक लेखक की प्रेरणाओं का उत्स क्या होता है? कैसे कोई लेखक बनता है, किन इच्छाओं-कामनाओं से संचालित होकर? और फिर लेखक बनने के बाद उसकी अपने आप से क्या मांग होती है और उस समाज और भाषा से भी वह क्या चाहता है, जिसका वह लेखक है? ये सवाल इस पुस्तक के केंद्र में हैं। ये वे सवाल हैं, जिनसे किसी भी बुद्धिजीवी को अवश्य टकराना चाहिए, पर इस दौर की हकीकत यह है कि इन सवालों से कतराकर निकल जाना बौद्धिक वर्ग के लिए बहुत सहज हो गया है, लेखन जैसे आत्मप्रस्थापना का कोई जरिया हो भाषा, जैसे अपने आप को विचार और साहित्य के संसार में स्थापित कर देने का कोई माध्यम हो।
यह पुस्तक जीवन, साहित्य, विचार से जुड़े गहनतम सवालों से वाबस्ता है। मानव सभ्यता का विकास, व्यक्तित्व-निर्माण की प्रक्रिया और विचारों के बनने के पीछे इतिहास की जटिलतम शक्तियां काम कर रही होती हैं। एक लेखक, एक बुद्धिजीवी इसी इतिहास की उपज होता है, किसी ईश्वरीय देन "प्रतिभा" को धारण करने वाली इकाई नहीं। यह पुस्तक "प्रतिभा" के मिथ्या सिद्धांत का प्रबल खंडन करती है। सिलसिलेवार ढंग से किसी समाज और भाषा में लेखक के स्थान और उसके प्रभाव के बारे में यह एक लंबा विमर्श है।
"देशीवाद" या "नेटिविज्म" साहित्य की एक धारा है, जिसका आधुनिक मराठी साहित्य पर असर पड़ा। भारत की अन्य भाषाओं के साहित्य में भी इस धारा को देखा जा सकता है। यह "देशीवाद" क्या है? विचार की यह पद्धति समाज को कहां ले जाने वाली है? वे लेखक जो अपने लेखन और विचारों से इस वाद को पुष्ट करते हैं, वे अपने समय को दे क्या रहे हैं? यह सब कुछ इस पुस्तक का विवेच्य विषय है।
राव साहेब कसबे मराठी में लिखते हैं, परंतु उनकी सोच न सिर्फ अखिल भारतीय, अपितु वैश्विक है। विचार, आंदोलन, राजनीति के अंतर्संबंधों को उजागर करते हुए किसी विषय की गिरहें खोलने की अपनी एक शैली उन्होंने विकसित की है। भारत जैसे पुरातन और रुढ़िवादी समाज में यह शैली स्वस्थ बौद्धिकता के निर्माण के लिए एक ऊर्जा-स्रोत है। अतः यह पुस्तक भी मराठी के एक बड़े रचनाकार भालचंद्र नेमाड़े से शुरू जरूर होती है और विस्तार से उनके विचारों, रचनाओं और जीवन-दिशाओं का विश्लेषण करती हुई, उसके वास्तविक गंतव्यों की ओर इशारा करती है और देशीवाद के भीतर छिपे उन संकटों को उजागर करती है, जो भले ही साहित्य में अपना प्रभाव पैदा कर रहे हों, पर समाज को उनसे कुछ सार्थक मिलने वाला नहीं है। वे इस बात को भी भली-भांति और सुचिंतित ढंग से उजागर करने में सफल हुए हैं, कि देशीवाद ऊपर से भले ही आंदोलन जैसा कुछ लगता हो, पर इसके सूत्र उन मनोवैज्ञानिक गुत्थियों और व्यक्तित्व की उन जटिलताओं से जुड़ते हैं, जो एक व्यक्ति के सहज विकास में बाधा उत्पन्न करती हैं, उसे अहंबोध और महत्त्वाकांक्षा से संचालित एक "प्रतिभा" में बदल देती हैं, बजाय जीवनबोध से प्रेरित समाजचेता सर्जक के, साहित्य और विचार वैयक्तिक सफलताओं के गहन अंधकारों में खो जाता हैं। फिर यश और निजी सफलताओं के चक्करदार, गोल घुमावदार घेरे शुरु होते हैं, जिनका मुक्तिबोध ने अपनी एक लंबी कविता में बहुत प्रभावपूर्ण चित्रण किया है और अपनी प्रेरणाओं को आत्मलिप्त प्रेरणाओं से भिन्न बताया है।
जीवन का अनुभव हर लेखक के पास होता है, भाषा का अभ्यास और लेखन-कला की साधना उसे निश्चित रूप से इस बात में सक्षम बनाती है कि वह सराही जा सकने लायक रचनाओं का सृजन कर सके, परंतु आज 21वीं सदी में, जब भारतीय समाज भीतर से खलबला रहा है और वैश्विक परिस्थितियां भी यह सोचने के लिए बाध्य करने वाली हैं, कि सोच-विचार-जीवन-रचना के उन तरीकों से काम नहीं चलेगा। जीवन को कुछ और चाहिए। भावी मानवता की पुकार कुछ और है। वे मूल्य जो 19वीं-20वीं सदी की क्रांतियों से पैदा हुए, पश्चिमी पुनर्जागरण और विभिन्न देशों के मुक्ति-संग्रामों में जिन्हें बल मिला, वे इस धरती पर और आम जन-जीवन में प्रतिफलित होने चाहिए। जाहिर है कि यह कोई मांग नहीं है किसी लेखक से। हो भी नहीं सकती, क्योंकि कोई भी लेखक वही लिखता है, जो उसके व्यक्तित्व और अस्तित्व की निर्मिति में निहित होता है, वह वही लिख भी सकता है। यह पुस्तक यथार्थवाद के युग की तरह किसी लेखक से किसी खांचे में ढले समाज-सापेक्ष लेखन की मांग नहीं कर रही, बल्कि यह तो एक लेखक के निर्मित होने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठा रही है। यह पुस्तक विचार और अनुभव की उन गलियों में जा रही है, जो किसी भी व्यक्ति को एक खास तरह के व्यक्ति में गढ़ते हैं, यह पुस्तक इस बात पर बल दे रही है, कि एक लेखक का सर्वोपरि कर्तव्य अपनी "गढ़न" की जांच करना है, उसे समाज के आगे लेखक-बुद्धिजीवी बनने का दावा करने से पहले अपने को यह भरोसा दिलाना है कि वह वर्ण, वर्ग, क्षेत्र, लिंग आदि विभेदों से निर्मित निहित स्वार्थों और काल-विगत मूल्यों का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और समता के सर्वोच्च मूल्यों से संचालित अस्तित्व है। उसे अपने लेखक बनने की प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में लेना होगा, यही उसके लेखक होने के प्राधिकार की एकमात्र गारंटी हो सकता है, कोई यश, कोई साहित्यिक सत्ता में मिला स्थान नहीं।
कुल मिलाकर यह पुस्तक बौद्धिक कर्म की उस बड़ी जवाबदेही को रेखांकित करती है, जो वर्तमान और भविष्य के लेखन की सर्वोच्च कसौटी होना चाहिए। यहां यह कह देना आवश्यक है कि लगभग 500 पृष्ठों में फैली साहित्यिक आलोचना की यह पुस्तक किसी मशीनी ढंग से कोई प्रतिपादन नहीं करती, न ही कोई कसौटी रखती है, बल्कि अत्यधिक सर्जनात्मक और सुललित ढंग से तह-दर-तह सृजन और विचार की गांठों को खोलती है। यही कारण है कि यह एक गंभीर आलोचना पुस्तक होने के बावजूद बेहद पठनीय, विचारोत्तेजक और दिल-दिमाग में गहरे तक उतर जाने वाले तर्कों से बनी है। मराठी एक प्रांत की भाषा है। उसका साहित्य-समाज कितना भी प्रखर और जीवंत क्यों न हो, उसकी भूगोलगत सीमा है। हिंदी आधे हिंदुस्तान की भाषा है, जिसका साहित्य-समाज कितना भी बिखरा हुआ, आधा-अधूरा सा, अपने में सिमटा हुआ और अवसाद-ग्रस्त ही क्यों न हो, एक बहुत बड़ी जगह इस देश के सांस्कृतिक नक्शे में घेरता है। हिंदी के इस वृहत साहित्य-समुदाय के लिए यह पुस्तक एक आईने का काम कर सकती है कि वह इसमें अपनी छवि देखे और यह सोचे कि कैसे स्वतंत्रता-आंदोलन और नए भारत के निर्माण की प्रेरणाओं से चलकर वह वैयक्तिक यश के घेरों का बंदी हो गया है और उसने बड़ी दक्षता से इसके लिए विचारधाराओं के इस्तेमाल की एक पूरी प्रणाली अपने लिए विकसित कर ली है। यही कारण है कि यह साहित्य अपनी आंच खो बैठा है। यह पुस्तक सिर्फ इस कारण ही प्रकाशित की जा रही है कि हिंदी के भावी रचनाकार अपने निर्माण-काल में अपना अन्वेषण कर सकें, अपने लेखन को वैयक्तिक यश की सीमाओं और आत्मस्थापना की बाड़ों से बाहर बड़े संदर्भों में जांच-परख सकें।

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