ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सुसंस्कार की कठिन डगर पर...
01-Mar-2019 03:17 PM 907     

भारतीय संस्कृति की चर्चा हम सब आए दिन सुनते रहते हैं। कभी मंचों से, तो कभी चाय-वार्ताओं में या घरों की बैठक में। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि हममें से अधिकांश यह नहीं जानते कि हमारी संस्कृति क्या है। इस अज्ञान के पीछे, हमारी सोच की जड़ों में बैठा वह निर्मम अतीत है, जो आठ शताब्दी लम्बी देश की दासता के रूप में हमें भोगना पड़ा। वास्तव में, विदेशी शासन ने कभी हमें यह जानने का अवसर ही नहीं दिया कि हम क्या हैं और हमारी संस्कृति क्या है, हमारी विचारधारा क्या है!
और फिर, लम्बी दासता के बाद देश को मिला भी तो एक ऐसा शासन, जिसने हम पर एक नितान्त नई जीवन-शैली थोपी - बिना सोचे कि तब हमारी पहली अथवा मूलभूत आवश्यकता यह थी कि पहले विदेशी शासनकाल में मिले हमारे ज़ख़्मों पर मरहम लगाया जाए और हमारा खोया हुआ आत्मविश्वास तथा आत्मसम्मान हमें लौटाया जाए। हमें हमारी वास्तविक पहचान दी जाए। हमारे वैभव और ज्ञान का परिचय देकर हमें बताया जाए कि हम कभी सशक्त तथा समर्थ भी थे, कि हम पुनः कमर कसकर उठें और वह सब प्राप्त करें जो विश्व के अन्य देश हमारी दासता की अवधि में प्राप्त कर चुके थे।
सर्वमान्य वास्तविकता यह है कि कोई भी शासक देश, गु़लाम देश के नागरिकों को तब तक पूरी तरह गुलाम नहीं बना सकता, जब तक वह उनसे उनका आत्म-सम्मान न छीन ले, उनका आत्म-विश्वास न नष्ट कर दे। भारत के विदेशी शासकों ने यही किया। आते ही उन्होंने हमारी संस्कृति को नष्ट किया। हमें दाने-दाने के लिए तरसाकर, कभी इतना अवकाश ही नहीं दिया कि हम अपनी संास्कृतिक विरासत के विषय में सोचें अथवा उसे याद करें। हमारी पुस्तकें और हमारे ज्ञान के केन्द्र नष्ट कर दिए गए थे। पुस्तकालय जला दिए गए और समाज को कर्म-अकर्म तथा सामथ्र्य का ज्ञान देने वाले गुरुकुल, जड़ से उखाड़ फेंके गए। भूखा-नंगा समाज अपने बच्चों को ज्ञान के लिए भेजता भी तो कहाँ? गुरुजन ज्ञान की सम्पदा बचाते भी तो कैसे, जब न तो उन्हें राजश्रय मिल पाता था और न घर-घर भिक्षा माँगकर भी गुरुकुल को चलाने वाले जिज्ञासु विद्यार्थी थे। हमारी मानसिकता में कूट-कूट कर सैकड़ों वर्ष तक यही भरा गया था कि "तुम मूर्ख, भटके हुए कुमार्गी, तथा मानव-रूपी पशु हो।"
फिर नये शासकों के शासन ने हमें सुसंस्कृत करने के नाम पर अपनी भाषा दी - इस परम मंत्र के साथ कि तुम्हारा सब कुछ निम्न कोटि का है। अपनी भाषा के कुछ शब्द - जैसे "कम हियर", "गॅट आउट", "सिट डाउन", "कीप क्वाएट" - सिखाए और कोट पहनाकर, गले में टाई लटका दी और सिर पर रखने को एक टोप दे दिया। इस परिधान के साथ, महीने में तीन-चार रुपये वेतन पाकर अंग्रेज़ों का भारतीय नौकर अपने को किसी बादशाह से कम नहीं समझता था। इसमें वह सपरिवार पेट भर खाना खा सकता था और अपने भूखे नंगे पड़ोसियों के बीच "गुडमार्निंग", "डैम-फ़ूल" और "गॅट आउट" जैसे शब्द बोलकर सम्मान पा जाता था। सभी लोग उसके भाग्य की सराहना करते थे और उसके-जैसी नौकरी पाने के लिए, अंग्रेज़ी सीखने के लिए दौड़ पड़ते थे। जल्दी ही वे "संडे-मंडे" सीखने और बोलने लगे और अपने देवताओं को पूजने लगे कि हमें "साहब" के यहाँ नौकरी दिलवा दो, प्रभु। मैकाले की रणनीति व्यापक प्रभाव डालती जा रही थी। इतना पर्याप्त था इन्सान को पालतू कुत्ता बनाने के लिए।
ऐसी दयनीय स्थिति में बस धर्म ही उनका आसरा रह गया था - वह धर्म जिसकी महत्ता के विषय में वे अपने पुरखों से सुनते आए थे। उन्हें धर्म पर विश्वास था। बिना यह जाने अथवा समझे कि धर्म का अर्थ क्या है, धर्म का महत्त्व क्या है, वे अपने भगवान को पुकारते रहते थे। किसी न किसी रूप में उसकी पूजा करते रहते थे। नित नई विपत्तियाँ झेलते हुए भी उन्हें विश्वास था कि एक दिन उनका भगवान ही उन्हें बचाएगा। और जो भी, जैसी भी विपत्ति वह झेल रहे हैं, वह उनके किसी पूर्व जन्म के कर्मों का फल है। वह एक दिन अवश्य दूर हो जाएगी। सब पाप उसी भगवान की कृपा से कट जाएंगे, बस भगवान के आगे रोते रहो, गिड़गिडाते रहो। वह एक दिन अवश्य ही सारे दुखों का अंत करेगा।
धर्म के नाम पर बस यहीं तक उनका ज्ञान था। यही उन्हें अपने पूर्वजों से संस्कार में मिला था। हाँ, उस समय यह ज्ञान और यह संस्कार देने वाले ब्राह्मण भी थे जो अन्य सभी की अपेक्षा कुछ अच्छी स्थिति में थे। उन्होंने अन्य सभी को धर्म का एक और अर्थ समझाया - वह यह कि ब्राह्मण पूज्य होता है, उसे दान देते रहने से भी पापों से मुक्ति मिलती है और सुखों का मार्ग खुलता है, यद्यपि वे स्वयं ही नहीं जानते थे ब्राह्मण होने का अर्थ क्या है? वास्तव में ब्राह्मण को स्वयं ही दान माँगने का अधिकार नहीं होता। उसका पहला कर्तव्य यह होता है कि वह बारम्बार वेदों का अध्ययन करता रहे और समाज में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करता रहे। उस समय तो ब्राह्मणों को यह भी ज्ञात नहीं रहा था कि वेद कितने हैं और उनमें ऐसा क्या है जो निरन्तर उन्हें पढ़ते रहने का विधान है।
हमें अज्ञानता एवं अपसंस्कृति देकर तत्कालीन शासन का प्रभाव जड़ें पकड़ता रहा। उन्हीं दिनों, विश्व में औद्योगिक क्रान्ति हुई। देशभर में रेल चली, कहीं मोटर गाड़ियाँ भी आईं, बिजली भी बनने लगी। देश में कभी-कभार सिर उठाने वाली चिनगारियों को दबाते रहने के लिए पुलिस दल भी बनने लगे। युद्ध के लिए सेनाएँ भी आवश्यक होने लगीं। इस प्रकार देश के भूखे नंगों को भी गाहे-बगाहे कुछ रोज़गार मिलने लगे। किन्तु उनकी संख्या देश की भूखी एवं बेकार जनसंख्या से बहुत, बहुत कम थी। इंगलैण्ड के कुछ भागों में मिलों के लिए कच्चा माल जुटाने के लिए भी भारत के किसानों को भी कुछ दायित्व मिला।
किन्तु सब जगह शर्त यह भी थी कि उन कर्मचारियों को पूर्णतया अंग्रेजी शासन के हित में काम करना होगा। अधिकांश किसानों के लिए भी प्रतिबंध यही था कि वे केवल और केवल वही फ़सल उगाएंगे जिसकी माँग इंग्लैण्ड में है। कुछ संदर्भ सर्वविदित हैं कि भारत में उगाया हुआ कपास, मैनचैस्टर की कपड़ा मिलों के लिए ही भेजा जाता था और वह भी सरकार द्वारा तय की हुई क़ीमत पर और अनेकानेक किसान विवश थे केवल नील की खेती करने के लिए, जो गोरे साहबों के कपड़े चमकाने के लिए भेजा जाता था। कुछ किसानों को यह आदेश था कि चीन को निर्यात के लिए अफ़ीम की खेती करें।
संयोग है कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में होने वाले दो विश्व युद्धों ने भारत में अंग्रेज़ी शासन को कुछ शिथिल किया और उसके साथ ही हमारे स्वतंत्रता आंदोलन ने फिर ज़ोर पकड़ा। अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध हिन्दुओं से कंधे से कंधा मिलाकर लड़ने वाले मुसलमान, कुछ दशक बाद, देश की स्वतंत्रता की भनक पाते ही, इस धरती पर कब्ज़ा करने के लिए बेचैन होने लगे। पहले उनके मन में यह तर्क था कि अंग्रेज़ों ने देश का शासन मुसलमानों से छीना था, अतः लौटते समय उन्हें आज़ाद भारत की बागडोर मुसलमानों को ही सौंपनी चाहिए। उन्हें भय सताने लगा कि हिन्दुओं पर पाँच शताब्दियों तक शासन करने के बाद इस हिन्दू-बहुल भूमि पर अब हिन्दुओं का शासन हो जाएगा। विश्वभर में प्रजातंत्र आ चुका था और कोई सम्भावना नहीं थी कि देश छोड़ते समय अंग्रेज़ भारत का शासन मुसलमानों को सौंप कर जाएँ। अतः उन्होंने भारत के विभाजन और अलग पाकिस्तान का हठ ठान लिया।
तत्कालीन क्रान्तिकाल में गाँधी और नेहरू भारत में नेता के रूप में उभरकर आ चुके थे। उन्होंने विभाजन रोकने के नाम पर मुसलमानों को बहुत छूट दी। इसलाम की "महानता" के गुण गाए। उन्होंने हिन्दुओं को भी बहुत दबाया और समझाया। हिन्दुओं की उदारता और महानता के गुण गाते हुए यहाँ तक कहा कि "अगर मुसलमान हमें मार भी डालें तो हमें शान्त रहना चाहिए। हँसते-हँसते अहिंसापूर्वक जीवन बलिदान कर देना ही हमारा धर्म हमें सिखाता है। यही हमारी संस्कृति है।"
किन्तु मुसलमान नेता जानते थे कि विश्व में पसरते प्रजातंत्र में उनका भारत में सत्ता पाना सम्भव नहीं होगा। अतः विभाजन हुआ और पाकिस्तान बना। किन्तु गाँधी-नेहरू प्रभाव के चलते भारत में करोड़ों मुसलमान बसे रहे। उन्हें यहाँ टिके रहने की ही नहीं, हर प्रकार से अपनी शर्तों पर रहने की पूरी छूट दी गई। जहाँ पाकिस्तान इस्लामी राष्ट्र बना, वहाँ भारत को प्रजा-बहुल हिन्दू राष्ट्र नहीं बनने दिया गया।
यह भी देश का दुर्भाग्य रहा कि जनता में सरदार पटेल का व्यापक प्रभाव होते हुए भी, गाँधी जी के नेहरू-प्रेम के कारण, देश की सत्ता नेहरू के हाथों में चली गई। देश का दुर्भाग्य कि इंग्लैण्ड-पढ़े, अमीरज़ादे नेहरू को भारतीय संस्कृति का कोई ज्ञान नहीं था। जो कुछ था वह मूलरूप से अंग्रेज़ों द्वारा समझी और लिखी पुस्तकों के आधार पर ही था। और यह तो सर्वविदित है कि अंग्रेज़ों के आकलन में भारत "सँपेरों और जादू-टोना करने वालों का" देश था। कश्मीर में जन्में और वहाँ के मुस्लिम-बहुल समाज में पले-बढ़े नेहरू को भारतीय संस्कृति के प्रति कोई लगाव भी नहीं था। वे बड़े गर्व से कहते रहते थे - "मैं शिक्षा से ईसाई, संस्कार से मुसलमान और मात्र संयोग से हिन्दू हूँ।"
देश का एक और दुर्भाग्य, बीसवीं सदी के तीसरे दशक में ही जन्म ले चुका था। रूस और चीन में पनपे और विकसित हुए माक्र्सवाद का बीज भारत में पहुँच चुका था। उसके पास ग़रीबों को लुभाने वाला, मनमोहक, अमीर-विरोधी नारा था। उसे संस्कृति से कोई लेना-देना न कभी था और न आज है। वह यह मूल मंत्र लेकर आया कि संसार में बस अमीर और ग़रीब हैं और देश की सम्पत्ति पर दोनों का समान अधिकार होना चाहिए। अगर ग़रीब एकजुट हो जाएँ तो वेे अमीरों से अपना अधिकार छीन सकते हैं।
उनका यह मंत्र अनेक ग़रीब-बहुल देशों में सफल होता रहा था। उन्हें यह देखकर आश्चर्य भी हुआ और आघात भी लगा कि भारत में उनकी विचारधारा आशा के अनुकूल नहीं फैल रही थी। बहुत विचार-विमर्श और माथा-पच्ची के बाद उन्हें ज्ञात हुआ कि यहाँ का ग़रीब अपने संस्कार से भाग्यवादी है। वह मानता है कि "होइए वही जो राम रचि रखा।" उन्हें सोचना पड़ा कि यह राम कौन है? यहाँ अपनी पकड़ बनाने के लिए उन्हें ग़रीबों का यह विश्वास तोड़ना पड़ेगा। इस निश्चय से उन्होंने रामकथा का अध्ययन किया और अपने विद्वानों से कहा - "जैसे भी हो, राम की छवि बदलो... घटनाओं की नयी व्याख्या करो, नयी रामायण लिखो... जैसे भी हो राम को खलनायक सिद्ध करो... रावण को महान दिखाओ। वेद पढ़ो, मनुस्मृति पढ़ो और सिद्ध करो कि यहाँ कुछ लोगों के साथ हमेशा अन्याय हुए। बस इसी कारण वे ग़रीब हैं, अपमानित हैं, और उपेक्षित हैं।"
उन्होंने जातिवाद को तूल दिया। ग़ुलामी की शताब्दियों में उपजी अपसंस्कृति को ही भारत की मूल संस्कृति के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने पाया कि मुलसमान भी, अल्पसंख्यक होने के कारण और अपनी साम्प्रदायिक सोच के कारण, हिन्दुओं से घृणा करते हैं। उन्हें पता लगा कि हिन्दू नारी पर, गुलामी के काल में, बड़े अत्याचार हुए और स्वयं अत्याचार का शिकार हिन्दू उनकी रक्षा नहीं कर पाता था। इस कारण महिला समाज बड़ा दुखी एवं असंतुष्ट है। यह देखकर माक्र्सवाद ने नारी समाज और मुसलमानों को भी "दलित" कहकर, बहुसंख्यक हिन्दू के विरुद्ध भड़काया।
नयी-नयी रामकथाएँ जन्म लेने लगीं - एक का तो शीर्षक ही था "रामायण विष वृक्षम्।" सभी के नये निष्कर्ष... कि राम खलनायक थे, उन्होंने सीता की अग्नि परीक्षा ली... किन्तु स्वयं कोई परीक्षा नहीं दी। उन्होंने निर्दोष सीता को वनवास दे दिया। राम के अनेक पत्नियाँ थीं। राम, सोना पाने के लालच में स्वर्णमृग को पकड़ने के लिए दौड़े थे।
और यह भी कि रावण बहुत अच्छा आदमी था। सीता, वन के कष्टमय जीवन से ऊबकर रावण के साथ अपनी मर्ज़ी से भाग गई थीं। रावण के राज में सीता एक वर्ष तक सुरक्षित रहीं। रावण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिए सीता को ले गया था... आदि। उन्होंने इस प्रकार की मान्यताएँ फैलाने में सहयोग देने वाले लेखकों, नाटककारों, लोकप्रिय कलाकारों को विदेश में बुलाकर धन एवं अलंकरणों से सम्मानित किया। बच्चों के लिए चिकने कागज़ पर रूसी साहित्य सस्ते दामों पर वितरित किया गया और इस प्रकार नयी पीढ़ी के मन में विष बीज बोने का काम बड़े धैर्य के साथ होता रहा। इसमें तत्कालीन प्रशासन का मौन सहयोग उनके साथ रहा। हाँ, इस दुष्प्रचार से उन्होंने मुसलमानों को दूर ही रखा, क्योंकि वे जानते थे कि मुसलमान को उसकी विचारधारा घुट्टी में पिलाई जाती है। उसके सोच को किसी भी प्रकार बदला नहीं जा सकता। उन्होंने मुसलमानों को यही समझाया कि हिन्दू उससे घृणा करते हैं और उनके राज में उन्हें न कभी सम्मान मिलेगा और न सुख।
इस प्रकार वामपंथ ने अपने प्रभाव क्षेत्र में ग़रीब के साथ ही मुसलमानों और नारी समाज को और नव साक्षरों को भी जोड़कर अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया।
ऐसे प्रभावों-दुष्प्रभावों के चलते देश का जनमानस कभी सार्थक दिशा नहीं पा सका। देश के नागरिकों को कर्म-अकर्म और सत्कर्म-दुष्कर्म का ज्ञान देने वालों का सर्वथा अकाल रहा। स्वतंत्रता के बाद प्रशासन ने देश को आर्थिक विकास की योजनाएँ तो दीं किन्तु व्यापक दुष्प्रभावों को रोककर सत्कर्म की ओर प्रेरित करने वाली कोई पहल नहीं की। इसके विपरीत ऐसा सद्ज्ञान देने वाली सभी संस्थाओं को पोंगापंथी और पुरातनपंथी कहकर उनका विरोध ही किया, उन्हें हतोत्साहित ही किया। परिणाम यह है कि आज का युवा, देश की यÏत्कचित समृद्धि में अपना हिस्सा माँगना सीख गया है। उसके लिए लड़ना सीख गया है। अधिक से अधिक पा लेने के लिए छीनना और लूटना सीख गया है। किन्तु श्रम और ईमानदारी का महत्त्व नहीं सीख पाया। धैर्य और उदारमन से देना नहीं सीख पाया। वह चिल्लाकर कहता था कि देश में इतने सारे धनकुबेर हैं, वे कौन-सी मेहनत करते हैं? उन्होंने और उनके पुरखों ने हमें निरन्तर लूट कर ही अपनी सारी सम्पत्ति पाई है।
देश में प्रजातंत्र के बहाने भी, सुसंस्कारों के अभाव में, बड़ा अनाचार हुआ है। सुसंस्कारों के अभाव में प्रजातंत्र स्वयं ही लूट का एक बहुत बड़ा साधन बन गया है, जिसके सामने संविधान और न्यायप्रणाली का प्रभाव भी दम तोड़ देता है। जो भी जनता को धैर्य और परिश्रम का मार्ग दिखाए बिना, तुरन्त धन एवं सुविधाएँ देने का सपना दिखा दे - वही उनका नेता बनता चला जाता है। और एक बार राजनीति में सफल होने का मतलब है - धन, मान-सम्मान और बाहुबल... सब एक साथ प्राप्त हो जाना। आज कोई महिलाओं के लिए आवाज़ उठाकर, कोई ग़रीबों के लिए आँसू बहाकर, कोई मुसलमानों की पीड़ा सुनाकर तो कोई मज़दूर के लिए चीख़-चिल्लाकर नेता बनने का जुगाड़ बैठा रहा है। इसके साथ ही सरकारी नौकरी एक बहुत बड़ा आकर्षण बन गई है, जहाँ पैसा है, सुरक्षा है और पेंशन के साथ मौज ही मौज है। लोग उसके लिए लूटकर या खून करके भी पैसा लगाने को तैयार हैं। लड़की वाले सरकारी नौकरी वाले के लिए बड़ा दहेज़ लिए घूमते रहते हंै। समाज में हर किसी को शार्टकट चाहिए।
यह वातावरण सुसंस्कारों के अभाव में बद से बदतर होता चला गया और आज बहुत तेज़ी से, बहुत-बहुत तेज़ी से बिगड़ता चला जा रहा है। इससे बचने के लिए योजनाबद्ध काम, आज से सत्तर वर्ष पहले ही प्रारम्भ होना था। परिस्थितियों ने हमें निरन्तर बोझ बनी रहने वाली समस्याएँ ही दीं। उनके प्रभाव स्वरूप ही देश को एक विदेशी नाम मिला - इंडिया। देश को एक अपनी भाषा नहीं मिल पाई।
आज स्थिति में सुधार के लिए आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है, जो कि समय की धारा एवं दिशा को मोड़कर पीछे ले जाने जैसा दुष्कर कार्य है। किन्तु आशा की किरणें अभी शेष हैं। हमारे पास पर्याप्त साधन न सही, दृष्टि है, धैर्य है और मनोबल है।

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