ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अस्मिता के संघर्षशील सिपाही
CATEGORY : आवरण 01-Nov-2016 12:00 AM 2332
अस्मिता के संघर्षशील सिपाही

सन् 1498 में 31 जुलाई की दोपहर समुद्र में अपनी यात्रा के दौरान किसी जमीन की तलाश में हताश कोलंबस को जब उसके एक नाविक ने जहाज की छत से देखकर बताया कि पश्चिम की ओर तीन पहाड़ियां दिखाई दे रही हैं तो कोलंबस को विश्वास हो गया कि सदा की तरह ईश्वर उसके साथ है। उसने उत्तर का मार्ग छोड़ा और पश्चिम की ओर जहाज मुड़वा दिया, जहां वे एक अंतरीप में पहुंचे, जिसे कोलंबस ने "केप गलेरा" का नाम दिया और द्वीप को "ला त्रिनिदाद"। इतिहासकार गेरद बेसन मानते हैं कि इस द्वीप के किनारों को छूने वाले आज से लगभग 720 वर्ष पूर्व आए और उन्होंने दक्षिण-पश्चिम त्रिनिदाद के बनवारी हिल में बसावट आरंभ की। वे मछुआरे और शिकारी प्रवृत्ति के थे। त्रिनिदाद का इतिहास यह भी बताता है कि इस द्वीप को आरंभ में चालीस हजार एम्रेंइंडियंस की विभिन्न जनजातियों ने बसाया था। इसके दक्षिणी तट पर अरावॉक जनजाति की प्रमुखता रही तो दक्षिण पूर्व एवं पूर्वी तटीय प्रदेश में नेपोटो की। हो सकता है कि उस समय एग्रेंइंडियंस अन्य जनजातियां भी रही हों, पर उनका इतिहास नहीं मिलता है। 17वीं शताब्दी के आरंभ में टोबैगों में कैरेबियन बोलने वाली कलीना जनजाति की बसावट हुई। सन् 1783 के आसपास त्रिनिदाद की बसाहट में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए। सन् 1783 में स्पेन के तत्कालीन राजा ने सेडुला ऑफ पापुलेशन नामक एक राजाज्ञा के अंतर्गत कैथोलिक विश्वास के लोगों का आह्वान किया कि वे आएं एवं त्रिनिदाद को अपना आवास बनाएं। त्रिनिदाद के द्वार खुल गए। फ्रांसीसी बागान मालिकों ने अपने गुलामों के द्वारा त्रिनिदाद को समृद्ध किया। फ्रांसीसी क्रांति के दौरान आसपास के ग्रनेडा, गुआडुलूप आदि अनेक द्वीपों से अनेक लोग त्रिनिदाद में बसने आए। त्रिनिदाद की जनसंख्या और समृद्धि में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इंग्लैंड, फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देशों से बसावट हुई। सन् 1797 में त्रिनिदाद पर ब्रिटिश आधिपत्य स्थापित हुआ और वे व्यापार के लिए गुलाम व्यवस्था के चलते अपने साथ अफ्रीकियों को बागानों में काम करने के लिये लाए। ब्रिटिश नहीं चाहते थे कि एप्रेंइंडियंस जैसी जनजातियों तथा फ्रेंच और स्पेन का इतिहास जिंदा रहे। त्रिनिदाद के इतिहास को धूमिल करने में गुलाम व्यवस्था ने उनकी बहुत मदद की।
भारत की तरह ब्रिटेन का उपनिवेश रहा- दो द्वीपों का समूह त्रिनिदाद और टुबैको 31 अगस्त, 1962 को स्वतंत्र हुआ तथा सितंबर 1976 में गणराज्य बना। मात्र तेरह लाख की जनसंख्या वाले इस देश में 40.3 जनसंख्या भारतवंशियों की, 39.6 अफ्रीकी मूल के लोगों की तथा शेष यूरोपियन, सीरियन, चीनी तथा लेबनानी लोगों की है। विभिन्न संस्कृतियों के मिलन के कारण इसे इंद्रधनुषी देश भी कहा जाता है।
त्रिनिदाद में भारतीय मूल के इन लोगों द्वारा, जिन्हें जहाजी, गिरमिटिया, ईस्ट इंडियन, इंडेचर लेबर आदि नामों से जाना जाता है, के संघर्ष को तीन कालों में विभाजित किया जा सकता है। सन् 1845 से 1917 का वह काल है, जब ये लोग अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के लिए एक मजदूर के रूप में संघर्षरत थे और इसे संघर्षकाल कहा जा सकता है। 1917 से 1947 तक वह समय है, जब इनकी अस्मिता की लड़ाई आरंभ हुई। यही वह समय है, जब कुली से कुलीन बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। इसे संक्रमण काल कहा जा सकता है। 1947 से आज तक का वह युग है, जब एक ताकत के रूप में ये कुली इस द्वीप में उभरे और अपनी ताकत को बनाए रखने के लिये ये संघर्षशील हैं। इस युग में अपनी जड़ों की ओर लौटने का विचार भी विकसित हुआ। यह युग अस्मिता का युग है। इसी युग में राजनैतिक दृष्टि से त्रिनिदाद और टुबैको के भारतवंशी सशक्त हुए। पहले श्री बासदेव पांडेय और फिर श्रीमती कमला बिसेसर ने प्रधानमंत्री के रूप में त्रिनिदाद एवं टुबैको में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की।
जिस दिन जहाजी पहले दिन इस द्वीप में आए, उनके संघर्ष का बिगुल बज गया। वे चारों ओर से घिरे अभिमन्यु की तरह थे, जिन्हें अपनी भाषा, संस्कृति, धर्म, रीति-रिवाज, अस्मिता, अकेलेपन आदि के अतिरिक्त सबसे महत्वपूर्ण गरीबी के हमले से न केवल संघर्ष करना था अपितु एक सिपाही की तरह सन्नद्ध रहते हुए अपनों की रक्षा भी करनी थी। मैंने "जहाजी चालीसा" में इस भाव को व्यक्त करते हुए लिखा है -
सात समुंदर पार उतारा।
चारों ओर घना अंधियारा।।
देश पराया भाषा अजानी।
इकलेपन का खारा पानी।।
छूट गया सब साथ सहारा।
बंधु-बांधव और देश तिहारा।।
हर विपरीत पर विजय पावा।
स्वतंत्रता का द्वीप जलावा।।
त्रिनिदाद और टुबैकोवासियों की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अपने अध्ययन के दौरान मुझे एक पुस्तक मिली, गेराड बेसेन और ब्रिजेट बेरेंटन द्वारा संपादित, "द बुक ऑफ त्रिनिदाद"। इस पुस्तक में जे.एच. कॉलेंस के एक लेख को पढ़कर मैं हतप्रभ रह गया। भारतीय दर्शन का मजाक बनाते हुए लेखक लिखता है- इस उपनिवेश में रह रहे भारतीय कुलियों के पास वही दर्शन है, जो इनके पूर्वजों ने आज से 2500 साल पहले अपनाया था। पुराण अनेक अंतर्विरोधों से भरे हुए हैं। त्रिनिदादियन कुली अपने को इन दर्शनों से युक्त ज्ञानी-ध्यानी मानते हैं। खेत में काम करने वाला एक मजदूर भी बहुत ज्ञानी होने का दावा करता है। शाम को सब बैठकर, जो कुछ बंध इन्हें याद हैं, उन्हें गाकर दोहराते हैं और सोचते हैं कि वे बहुत ज्ञानी हो गए। लेखक ने भारतीय मूल के निवासियों को कुली कहकर उनके खान-पान, रहन-सहन, भाषा और संस्कृति आदि का भरपूर मजाक बनाया है। वैसे तो यह पूरा आलेख ही उपहास उड़ाने की शैली में लिखा हुआ और इसे पढ़कर रक्त में उबाल आना स्वाभाविक है। कुली का जो ठप्पा इनकी पीठ पर लगाया गया और इन्हें जिस तरह समाज में मजाक का केंद्र बनाया गया, उससे समझ आता है कि किस प्रकार का मानसिक, शारीरिक संघर्ष इन्हें झेलना पड़ा होगा। एक लंबे संघर्ष के पश्चात् जिस तरह से इन्होंने इस बोझ को उतारा, स्वयं को कुलीन मनवाया, वह प्रशंसनीय तथा सराहनीय है।
इन जहाजियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पेट की आग बुझाने की थी। यह उनकी गरीबी ही थी, जिसने इनके भविष्य को अनजाने हाथों में सौंप दिया था। अपने देश और अपनों से दूर जो विवशता लेकर आई थी, उससे संघर्ष ही तो पहली प्राथमिकता थी। औपनिवेशिक राज्य में, जहां शोषण प्रमुख था, ऐसी व्यवस्था में आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाने की सोचना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती थी। यही पेट की आग थी, जिसने उन्हें अनेक विरोधों के बावजूद यहां रहने को विवश किया। इन लोगों को भी यह कहकर लाया गया था कि बहुत जल्दी इन्हें इनके देश भेज दिया जायेगा, परंतु जब देश जाने का विकल्प इन्हें दिया गया, तो चाहे अपनी मातृभूमि के प्रति अथाह प्रेम इनके मन में था, फिर भी अधिकांश ने देश नहीं छोड़ा। इसके विपरीत यहां आने वालों का सिलसिला जारी रहा। जिस मिट्टी को सोना बनाया हो, उसे छोड़कर जाना कठिन ही होता है। सन् 1870 के बाद ये छोटे किसान धीरे-धीरे विभिन्न क्षेत्रों में बसने लगे। सन् 1917 में जब अनुबंधित मजदूरी की प्रथा समाप्त हुई तब तक भारतीय मूल के यो लोग त्रिनिदाद के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन में गहरे धँस चुके थे। कृषि के क्षेत्र में ये अपना अमूल्य योगदान दे रहे थे।
आर्थिक रूप से समृद्ध होने के बावजूद इनका सामाजिक सम्मान नहीं था। कुली का ठप्पा इन्हें हीन भावना से ग्रस्त कर रहा था। इन्होंने पाया कि आर्थिक रूप से समृद्ध होने की प्रक्रिया में अपनी अस्मिता, अपनी संस्कृति, अपनी परंपराएं तो बहुत पीछे छूट रही हैं। नई पीढ़ी नये और सामाजिक स्तर के मोह में पाश्चात्य झुकाव में आ रही है। इस चुनौती का मुकाबला करने के लिये अपनी शिक्षा ही सहायक सिद्ध हो सकती थी। इस चुनौती से निपटने के लिये सन् 1928 में "ऑल इंडिया हिंदू महासभा" नामक संगठन बना। भारतीय परंपराओं को जीवित रखने, धर्म के बचाव तथा सांस्कृतिक उत्थान के लिए शिक्षा को आवश्यक समझा गया और इसके लिए रात्रि स्कूलों की व्यवस्था की गई। संस्था के अध्यक्ष सहदेव पंडित ने एक स्कूल की आवश्यकता पर बल दिया, जहां हिंदी और उर्दू, दोनों की पढ़ाई हो। श्री छोटकन लाल ने "चौताल लाल मणि" की रचना की, जिसमें सवैया, दोहा, चौताल आदि के आधार पर काव्य रचना की। इसमें त्रिनिदाद में घटित घटनाओं का इतिहास भी मिलता है और गांधीजी, डॉ. विलियम्स आदि के कार्यों का वर्णन है।
त्रिनिदाद में प्रत्येक हिंदुस्तानी त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। नई परंपराओं से भारतवंशियों ने इस देश को समृद्ध किया है। आज भारतवंशी मुख्यधारा का महत्वपूर्ण अंग हैं। त्रिनिदाद और टुबैको उनके लिए परदेस नहीं, स्वदेश की माटी की गंध उन्हें निरंतर अपनी माटी से जोड़े हुए हैं। अपनी जड़ों को जानने के लिये वे अत्यधिक उत्सुक हैं। आज कंधे-से-कंधा मिलाकर भारतीय मूल के लोग हर क्षेत्र में साथ-साथ चल रहे हैं। त्रिनिदाद की रोटी, दाल और डबल्स जग प्रसिद्ध हैं। यहां के लोग संगीत प्रेमी हैं और इनसे मिलकर मन को अच्छा ही लगता है।

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