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असमान बनने की स्वतंत्रता
01-Aug-2016 12:00 AM 3314     

मैं समाजवाद का समर्थक नहीं हूं क्योंकि स्वतंत्रता ही मेरे लिए परम मूल्य है। उससे ऊपर कुछ नहीं। और समाजवाद बुनियादी तौर पर स्वतंत्रता के खिलाफ है। उसे होना भी चाहिए, यह अपरिहार्य है क्योंकि समाजवाद की कोशिश किसी अप्राकृतिक चीज को अस्तित्व में लाने की है।
मनुष्य समान नहीं है। वे विशिष्ट हैं। वे समान कैसे हो सकते हैं? सभी कवि और सभी पेंटर नहीं होते। हर व्यक्ति के पास विशिष्ट प्रतिभा होती है। कुछ लोग संगीत का सृजन कर सकते हैं और कुछ लोग धन का। मनुष्य को अपने अनुसार बनने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता की जरूरत होती है। समाजवाद राज्य की तानाशाही है। यह जबरन थोपी कई आर्थिक व्यवस्था है। यह उन लोगों को समान बनाने की कोशिश है जो समान नहीं है। जो लोग अलग-अलग आकार के हैं उन्हें वह कांट छांटकर एक ही आकार का बनाता है। स्वाभाविक है कि थोड़े लोग ही उस आकार में फिट बैठते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए यह पंगु कर देने वाला और विनाशकारी घटनाक्रम होता है।
मैं जीवन के हर क्षेत्र में स्वतंत्रता चाहता हूं ताकि हर कोई वैसा बन सके जैसा वह बनना चाहता है। समाज साध्य नहीं है केवल साधन है। साध्य है व्यक्ति। समाजिक संगठनों के बजाय व्यक्ति का ज्यादा महत्व है। समाज व्यक्ति के लिए है नाकि व्यक्ति समाज के लिए। इसलिए मैं मुक्त अर्थव्यवस्था में विश्वास करता हूं। पूंजीवाद सबसे स्वाभाविक आर्थिक संरचना है। वह लादी नहीं गई है वह विकसित हुई है। उसे थोपा नहीं गया है वह अपने आप बनी है है। निश्चित ही मैं दुनिया से गरीबी को खत्म करना चाहता हूं। वह एक भद्दापन है। लेकिन यह काम समाजवाद नहीं कर सकता। वह हर देश में चाहे वह रूस हो या चीन गरीबी का उन्मूलन करने में नाकाम रहा है। हां वह बात में जरूर सफल रहा है। सभी को गरीब बनाने में। उसने गरीबी का वितरण किया है।
और मनुष्य इतना मूर्ख है यदि हर आदमी उतना ही गरीब है जितने की आप तो आप संतुष्ट रहते हैं, आपको ईष्र्या नहीं होती। समाजवाद का सारा विचार ही ईष्र्या से जन्मा है। इसका मनुष्य की समझ और उसके मनोविज्ञान, उसके विकास और पूर्ण प्रस्फुटन से कोई लेना-देना नहीं है। कुछ लोग अमीर बन जाते हैं और वे हर किसी की ईष्र्या का लक्ष्य बन जाते हैं। उन्हें नीचे खींचना है। ऐसा नहीं है कि उन्हें नीचे खींचने से आप अमीर बन जानेवाले हैं। हो सकता है कि आप पहले से ज्यादा गरीब बन जाएं क्योंकि वे थोड़े लोग जानते हैं कि कैसे धन का सृजन किया जाए और उन्हें खत्म कर दिया गया तो आप संपन्नता पैदा करने की क्षमता को खो देंगे।
यही रूस में हुआ। अमीर खत्म हो गए लेकिन उससे सारा समाज अमीर नहीं हो गया। सभी समान रूप से गरीब हो गए। लोग पहले से ज्यादा खुश हो गए होंगे क्योंकि उनसे ज्यादा अमीर कोई नहीं है। हर कोई गरीब है, सभी भिखारी हैं। यह अच्छा लगता है। यदि कोई आप से ऊपर उठता है तो आपके अहंकार को ठेस लगती है।
लोग समानता की बात करते हैं लेकिन एक बुनियादी बात समझ लेनी चाहिए। मनुष्य मानसिक तौर पर समान नहीं होते। इसके लिए क्या किया जा सकता है? अल्बर्ट आइंस्टीन किसी चंगू-मंगू के समान नहीं है। नहीं हैं वह समान। आप अभी या बाद में प्रतिभा के मामले में बराबर करने की कोशिश कर सकते हैं मगर शेक्सपियर, मिल्टन, शैली दूसरों के समान नहीं है। उनके अपने आयाम हैं।
एक बात पर मैं सहमत हो सकता हूं- हरेक को स्वतंत्रता हो, स्वयं होने की। बिल्कुल ठीक-ठीक कहूं तो स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि हर कोई असमान बनने को स्वतंत्र है! समानता और स्वतंत्रता साथ-साथ नहीं चल सकते। यदि आप समानता का चुनाव करते हैं तो स्वतंत्रता की बलि चढ़ानी होगी। और स्वतंत्रता के साथ हर चीज की बलि चढ़ जाती है। धर्म की बलि चढ़ जाती है। प्रतिभा, प्रतिभा पैदा होने की सारी संभावनाओं की बलि चढ़ जाती है। हरेक को लघुतम समापवर्तक में फिट होना पड़ता है तभी आप समान हो सकते हैं। और मेरा मानना है कि हर व्यक्ति अपनी विशिष्ट प्रतिभा और कुछ खास जीनियस लेकर पैदा होता है। वह रवींद्रनाथ और शैली की तरह का कवि नहीं होगा, वह पिकासो या नंदलाल जैसा पेंटर नहीं होगा, वह बीथोवन या रविशंकर जैसा संगीतकार नहीं होगा लेकिन वह कुछ होगा। इस कुछ को खोजा जाना चाहिए। उसकी इस काम में मदद की जानी चाहिए कि वह खोजे की वह ईश्वर से क्या उपहार लाया है।
कोई उपहार लिए बगैर नहीं आता। हरेक कुछ क्षमता लेकर आता है। लेकिन समानता का विचार खतरनाक है। क्योंकि गुलाब को गुलाब ही होना है और गेंदे को गेंदे का फूल और कमल के कमल का फूल। यदि आप सबको समान बनाने लगे तो आप गुलाब, गेंदा और कमल सभी को नष्ट कर देंगे। आप केवल प्लास्टिक के फूलों को ही इस तरह बना सकते हैं जो एक-दूसरे के समान हो लेकिन वे निर्जीव होंगे।
यदि समाजवाद हमारी जीवन पद्धति बन गया तो इस दुनिया में क्या होगा- मनुष्य उत्पाद बनकर रह जाएगा। वह मशीन में तब्दील हो जाएगा। मशीनें समान होती हैं। आपके पास लाखों फोर्ड कारें हो सकती हैं जो एक-दूसरे के समान हों। वे असेंबली लाइन से बिल्कुल एक दूसरे के समान बन कर आती हैं। लेकिन मनुष्य मशीन नहीं है और मनुष्य की गरिमा को घटाकर उसे मशीन में बदल देना इस धरती से मनुष्यता को खत्म कर देना है।
समानता का विचार पूरी तरह से अमनोवैज्ञानिक है। मैं उसे केवल एक अर्थ में स्वीकार कर सकता हूं कि हरेक को स्वयं बनने का जिसका मतलब है असमान बनने का पूरा अवसर दिया जाए। आपको इस विरोधाभास को समझना पड़ेगा। हरेक को अपनी इच्छा के मुताबिक बनने का समान अवसर और स्वतंत्रता दी जाए और इसका सीधे-सीधे मतलब यह है कि हरेक को असमान होने के लिए समान अवसर दिया जाए।

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