btn_subscribeCC_LG.gif
अशोक का उद्धार
01-Oct-2018 08:22 PM 1059     


समीक्षक का प्रश्न :

हे अशोक के वृक्ष सुघन
कह दो मुझसे कुछ सजल नयन
वैदेही जब तेरी छाँव रही
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

रावण सीता हर लाया था
सारी सृष्टि थी उबल पड़ी
हुआ प्रलय का नाच प्रचंड
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

रवि का क्रोध महान हुआ
और चार पहर अंगार बहे
झुलसे थे सारे जीवित जन
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

मेघ श्याम जलधि गंभीर
विद्युत ने खींची वक्र लकीर
अश्वगति से सौ दूनी
धरती की और क्रुद्ध गामन
क्या तू कांपा था साथ विपन
हो जाता ठूंठ विफल जीवन
कैसे बीते तुझ पर वो क्षण

 

अशोक का उत्तर :

मैं जल जाता था निश्चय ही
पर अद्भुत ऐसा खेल हुआ
मुझ पुष्प विहीन तरु से ही
सीता को इतना स्नेह हुआ
पहली पल्लवी का आगमन
सीता के कोमल अरुण चरण
तन हरित हुआ और द्रवित था मन
ऐसे बीते मुझ पर वो क्षण

जो चंद्रप्रिया माधुर्य भरी
सीता के निर्मल अंग पड़ी
मेरे अहोभाग्य कितने
मेरे पल्लव से चिटकी थी
मैंने पायी रघुवीर शरण
ऐसे बीते मुझ पर वो क्षण

जब प्रेमाकुल हो वैदेही
विराह गीत दुहराती थी
उसके करूं काव्य से
भीगी मेरी ही छाती थी
प्रिया मिलन की धुन जब
सीता सुध हर लेती थी
मैं भी हो जाता प्रेम मगन
ऐसे बीते मुझ पर वो क्षण

जो मूक न होता तो कहता
सीता मैं तेरा जाया हूँ
हे मात, मैं निपट अभागा था
अब आँगन प्रिया कहलाया हूँ
नाम अशोक मैं धारा हूँ
पर दुःख हरती थी तुम मेरे
हर क्षण में मेरे तुम्हें नमन
ऐसे बीते मेरे वो क्षण
ऐसे बीते मेरे वो क्षण।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^