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असंतोष मुझको है गहरा
01-Sep-2017 03:59 PM 1643     

लौट-लौट आ रहे हैं
भूली भीषण अधूरी कहानी-से
दर्दीले दृश्य दूरस्थ हुई दिशाओं से
उलझे ख़याल...
तुम्हारे, मेरे
मकड़ी के जाल में अटके जैसे
हमारे सारे प्रसंग
जिनका आघात
हम दोनों को लगा।

सोचता हूँ, यह अंत है खेल का
या एक और खेल है अंत में
या तैरते-उतरते
पुण्य और पाप को संकेतित करती
यह अंतिम पलों की लीला है क्या
कि हवा में घुल-घुल कर
प्रकाश-बिम्ब-से
स्पष्ट हो रहे हैं मानो अब अर्थ व्यर्थ
अजनबी हुई अकुलाती आकाक्षाओं के।

आत्मा के आस-पास शायद इसीलिए
साक्षी हैं श्रद्धा के द्वार पर
ध्वनिगुंजित पल
स्वप्निल आत्मीयता की उष्मा के
दर्दभरी संकुचित दूरी में भी
स्नेह के सत्य में मेरे अटूट विश्वास के
जो हुआ, सही था या गलत हुआ
तुम्हारी सोच में नि:संदेह उसमें
कहीं न कहीं मेरे अपराध के।

काल-सर्प-से अंतिम समय में
किस-किस असंग-प्रसंग में
क्या-क्या संवारेंगे हम
कि जिस वेदना में पलती हो तुम
छुपने के लिए उसीसे
कुछ और गहरे
गहरे उतर जाती हो मुझमें
मुझको जाते इन पलों में
उसकी भी वेदना है।

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