ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
असाधारण सफलता का सफ़र
01-Jan-2016 12:00 AM 1074     

यह कहानी एक ऐसे अप्रवासी भारतीय उद्यमी की है जिसने अपनी पहली कंपनी (उद्यम) "कोरल नेटवक्र्स' सन 1988 में शुरू की और 1990 में दो वर्ष के बाद मात्र 26.95 डालर में बेच दी थी। इस उद्यमी ने बेचने से मिले उस चेक की प्रति को कांच में जड़वाकर अपने पास रखा है, असफलता की इस याद और सफल होने के जुनून के कारण, उन्हें आगे के व्यवसायों में सफलता पुरस्कार में मिली। सफलता के शिखर पर पहुँच कर एक बार उन्हें वि?ा के सबसे धनवान भारतीय होने का गौरव प्राप्त हुआ। हम बात कर रहे हैं, गुरुराज "देश' देशपांडे की, जिनका जन्म भारत के कर्नाटक के धारवार में 30 नवम्बर 1950 को हुआ। सन् 1972 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मद्रास से इलेक्ट्रिकल अभियांत्रिकी में स्नातक की उपाधि लेने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वह कनाडा चले गये। वहाँ उन्होंने न्यू ब्राुन्सविक वि?ाविद्यालय से इलेक्ट्रिकल अभियांत्रिकी में स्नातकोत्तर उपाधि ली तथा उसके उपरांत क्वींस वि?ाविद्यालय कनाडा से ही आँकड़ा (डाटा) संचार में डॉक्टरेट की उपाधि ली और वहीं प्राध्यापक के रूप में अध्यापन करने लगे। सन 1980 में उन्होंने अध्यापन का कार्य छोड़कर "मोटोरोला' में कार्यरत हो गये। व्यवसाय में स्वर्णिम अवसरों की खोज और अपनी अलग पहचान बनाने की उनकी चाहत, उन्हें सन 1984 में अमेरिका के बोस्टन शहर ले आई। पहली असफलता के बाद देशपांडे ने अपने पुराने कार्य अध्यापन और सोफ्टवेअर अभियांत्रिकी की ओर वापिसी करने के बजाय इस आर्थिक संकट में अपने अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर अगले व्यवसाय की खोज में निकल पड़े। यदि तुम किसी उद्देश्य में विश्वास करते हो तो देशपांडे के अनुसार तुम्हे दूसरों से उसको अनुमोदित कराने की आवश्यकता नहीं हैं, तुम उसे हासिल कर सकते हो। देशपांडे ने यह अपनी पहली असफलता के छः महीने के बाद अपने अगले उद्यम "केसकड कम्युनिकेशनस' को शुरू कर सिद्ध कर दिया। इस उद्यम को सफल बनाकर उन्होंने उसे सन 1997 में इसे 3.7 बिलियन डालर में बेच दिया। वह सफलता के पथ पर आगे चलते गये और संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में "सिस्को सिस्टम्स' जैसे स्थापित अग्रणी उद्यम को चुनौती देने के लिये उन्होंने सन 1998 में "सायकामोर नेटवक्र्स' नाम से एक नये उद्यम की शुरूआत की और उसकी सफलता ने अमेरिका के शेयर बाज़ार में इतिहास बनाकर देशपांडे को एक समय वि?ा के सबसे अमीर भारतीय होने का दर्जा दिला दिया। अमेरिका के शेयर बाज़ार के उतार चढ़ाव के बावजूद उन्होंने अपनी तकनीकी निपुणता और अपने व्यवसाय कौशल के दम पर अपनी स्थिति को मजबूत बनाकर रखा और कई नये-नये उद्यम स्थापित कर सफलता के कीर्तिमान रचते रहे। वर्तमान में वह "तेजस नेटवक्र्स', "ॠ123 सिस्टम्स' व कई अन्य संस्थाओं में शामिल हैं। उनके तकनीकी ज्ञान और उद्यमी कौशल से प्रभावित होकर 2010 में अमेरिका के राट्रपति बराक ओबामा ने देशपांडे को नवाचार (इनोवेशन) और उद्यमिता (ऐन्टरप्रेनेओरशिप) की योजना बनाने के लिये बनी "नेशनल एडवाइजरी काउन्सिल' का सह-अध्यक्ष नियुक्त किया। व्यवसाय और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले देशपांडे व्यक्तिगत स्तर पर स्वभाव से बहुत ही सौम्य, विचारशील और प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। उनके जीवन की इस अभूतपूर्व सफलता में उनकी पत्नी श्रीमती जयश्री देशपांडे का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। जीवन में सफलता के साथ-साथ, धन का सदुपयोग करना भी इनसे सीखने की आवश्यकता है। वह अपनी सफलता के मन्त्र दूसरों को बताने के लिये हमेशा तत्पर रहते हैं और वह अनेक सफल उद्योगपतियों व नये उद्यमियों के मार्गदर्शक भी हैं। साधनहीन बच्चों के लिये शिक्षा के साधन और नये उद्यमियों को अवसर देने में उनकी विशेष रुचि है। सन् 1995 में उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर 20 मिलियन डॉलर दान देकर बोस्टन शहर के प्रतिष्ठित "मेसाचुसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान' (ग्क्ष्च्र्) में तकनीकी में नये नये नवाचार (इनोवेशंस) को प्रोत्साहित करने के लिये "देशपांडे प्रौद्योगिक नवाचार केंद्र' (क़्क्क्ष्च्र्) की स्थापना की। अपने शिक्षा के ऋण को चुकाते हुये सन 2011 में न्यू ब्राुन्सविक वि?ाविद्यालय कनाडा में 2.5 मिलियन डॉलर दान देकर उन्होंने नवाचार के लिये अनुसन्धान केंद्र खोला, बता दें कि इसी संस्थान से देशपांडे ने अपनी स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण की थी। समाज सेवा और नये उद्यमियों को अवसर देने के लिये देशपांडे दम्पत्ति ने सन् 1996 में "देशपांडे फाउंडेशन' की स्थापना की जो आज हजारों लोगों के जीवन को सुधारने की दिशा में कार्य कर रही है। समाज सेवा के क्षेत्र में भी उन्होंने अमेरिका, कनाडा और भारत में एक विशेष जगह बनाई है और वह विभिन्न समाज सेवी संस्थाओं से जुड़े हुये हैं। सन् 2010 में उन्होंने 5 मिलियन डॉलर दान देकर बोस्टन शहर के पास बेरोजगारी और गरीबी से प्रभावित क्षेत्र "लोवेल और लोरेन्स' में "मेरीमेक वैली सैंडबॉक्स' नामक काय्र्रक्रम की शुरुआत स्थानीय बच्चों की शिक्षा का स्तर सुधारने और नये उद्यमियों को सहयोग करने के लिये की। सैंडबॉक्स कार्यक्रम के जरिये साधनों से वंचित लोगों के लिये उद्यमिता और इनोवेशंस से संबन्धित कई योजनायें चलाई जा रही हैं जिसके तहत बेरोजगार युवाओं को तकनीकी प्रशिक्षण और व्यवसाय शुरूआत करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है, जिससे बेरोजगारों के नई जिन्दगी की शुरूआत करने के सपने साकार हो रहे हैं। इस कार्यक्रम से गरीबी और जुर्म प्रभावित इस क्षेत्र में अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं। भारत में भी सैंडबॉक्स कार्यक्रम के अतर्गत विभिन्न योजनायें कर्नाटक के हुबली क्षेत्र में देशपांडे फाउंडेशन के द्वारा चालू की गर्इं हैं। देशपांडे अमेरिका में "अक्षय पात्र' संस्था के अध्यक्ष हैं जो हर वर्ष कई मिलियन डॉलर भारत भेजती है, जिसका का उपयोग सरकारी विद्यालयों में पौष्टिक मध्याह्न भोजन उपलब्ध करने के लिए किया जाता है। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसनीय है। तकनीकी में कुशल नये उद्यमियों के लिये देशपांडे का यह विचार बहुत प्रेरणादायक है "आप तकनीकी समझते हो, इसलिये आप यह भी जानते हो कि तकनीकी क्या कर सकती है, परन्तु आपको यह भी पता करना होगा कि लोगों को क्या चाहिये? यदि आप ऐसा कुछ कर सकते हैं जो आसन हो और फायदेमंद हो, परन्तु किसी के लिये बहुत कीमती हो, समझ लो, आपको एक नया व्यवसाय मिल गया।'

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