ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कला और जीवन
01-Jul-2018 05:06 AM 1678     

हम दिनचर्या का बड़ा हिस्सा जिस कार्य को देते हैं उसी को जीवन मान लेते हैं। इन कार्यों में प्रत्यक्ष संलग्नता और उसके बाद भी उसे ढोते रहते हैं। संस्थाओं में बंधी दिनचर्या व्यक्ति को संस्था का बना देती है लेकिन व्यक्ति कौन है? संस्था से परे उसका जीवन क्या है? वह समाज और खुद के संबंध को कैसे देखता है? क्या वह इसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति के लिए सजग है? जैसे सवाल गौण हो जाते हैं। जीवन में "अर्थ" (धन) की प्रधानता और प्रयोजनमूलकता ने भौतिक विकास की गति को तीव्र किया है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में नई ऊँचाइयां हासिल की है। इन उजली विशेषताओं का स्याह पक्ष है कि व्यक्ति के लिए आत्मसंवाद का मूल्य कम हुआ है। जीवन के इन्हीं जड़ों की तलाश संस्कृति के कला पक्ष में की जा सकती है। कला अभिव्यक्ति की नितांत मौलिक विधा है जो प्रत्यक्ष इन्द्रिय अनुभवों के व्यक्तिनिष्ठ अर्थ को स्वान्तःसुखाय के उद्देश्य से प्रकट करती है। कला की प्रतिष्ठा उससे संबंधित किये जाने वाले विशेषणों के माध्यम से जानी जा सकती है। इसे सौंदर्य, सृजन और साधना जैसे गहरे अर्थ और भाव वाले शब्दों से जोड़ा जाता है। कला की "साधना" के दौरान समस्त ऊर्जा सृजन में लग जाती है और यह सृजन सौंदर्य के रूप में पहचाना जाता है। ऐसा सौंदर्य जो ज्ञानेन्द्रियों के रास्ते हृदय में "अहा" भाव जगाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि कला समाज से असंबद्ध है। जब ऐतिहासिक विरासतों में सभ्यता और संस्कृति का संरक्षित अंश उसकी कलाओं में खोजा जाता है तो कला के माध्यम से ही सभ्यता की कहानी की पुनर्रचना की जाती है। कला समाज में ऐसे व्यक्ति को जिंदा रखती है जो समाज से बंधा भी है और मुक्त भी। जो दूसरों के बताए नियम से खुद को अनुशासित करता है और अपनी कला के माध्यम से अनुशासन की परिपाटी को भंग करने का साहस भी रखता है।
भौतिक दुनिया में नियमों की खोज एक ज्ञान की परंपरा है लेकिन इस भौतिक जगत को कला के द्वारा परिकल्पित करना एक भिन्न प्रकार का ज्ञान है। इसे वैज्ञानिक ज्ञान की कोटि में रखना या इसके सापेक्ष कला का आकलन करना न्याय संगत नहीं होगा। कला ज्ञान-विज्ञान और भाषा की सीमा के पार अभिव्यक्ति का तरीका है। यह तरीका किस प्रकार प्रकट होगा? इस संदर्भ में कलाकार पूर्ण स्वतंत्र हैं। आजकल औपचारिक शिक्षा के माध्यम से क्रम, नियम, पैटर्न, कार्य-कारण भाव, सह संबंध आदि खोजने का प्रशिक्षण दिया जाता है। यह प्रशिक्षण खोजे जा चुके की पुनर्खोज या नयी विवेचना तक ही ले जाता है। इससे इतर भी दुनिया है जो इन संज्ञानात्मक क्रियाओं की बाध्यता से मुक्त होकर जीवन को ज्यों का त्यों व्यक्त करना चाहती है। जो भाषा और विज्ञान से पार जाकर अपनी जिज्ञासाओं को लिखित, मुद्रित और टंकित रूप के इतर व्यक्त करना चाहती है। ऐसा करते हुए वह दृश्य जगत में उन गुणों का आरोपण करना चाहती है जो न तो पूर्वकल्पित थे न तो जिनके बारे में भविष्य कथन किया जा सकता था। निहितार्थ है कि किसी दूसरे के बताए सत्य, दृष्टि और मार्ग को अपना लेने, उसका अनुसरण करने के बदले कला नए मार्ग और सत्य के उद्घाटन का आह्वान है। इन्हीं अभिव्यकिं्त को मिलाकर कला संस्कृति का तत्व बन जाती है।
टॉलस्टाय, कला को खाली समय में संपन्न लोगों की गतिविधि मानने से सावधान करते हैं। इस तर्क के सहारे आगे बढ़ें तो कला किसी विशेषज्ञ या समुदाय के आधिपत्य से मुक्त सिद्ध होती है। इसके लिए कोई पूर्व शर्त की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। यह गली-कूचों, गांव-गिराव, जंगलों, बड़े-बुढ़ों, बच्चों किसी भी माध्यम से कहीं भी प्रकट हो सकती है। तभी तो हमने अपने प्रत्येक उत्सव और रीति-रिवाज को कलाओं से जोड़ रखा है। यह जोड़ कला के संरक्षण का आधार है। अन्यथा आधुनिक मनुष्य किसी नए आविष्कार से जीवन में कला का विकल्प भी खोज देता। कला जीवन की बहुलता के पक्ष में प्रमाण देती है। कला के आलोचक बौद्धिक तर्क के द्वारा इसके उद्देश्य को समझने का प्रयास करते हैं जबकि कलाकार "गूंगे के गुड़" का आनंद ले चुका होता है। आप किसी दूसरे कलाकार की अभिव्यक्ति में जीवन का छांव खोज सकते हैं लेकिन अपने जीवन की ठांव नहीं बना सकते हैं। कला जीवन की शाश्वत अभिव्यक्ति है क्षण भंगुरता का प्रतिकार है। यह कलाकार को उस छटपटाहट से मुक्त करती है जो उसके अंतस और बाह्य जगत में हलचल मचाये रखते हैं। आपने किसी कलाकार को यह बोलते नहीं सुना होगा कि मैंने यह रचना क्यों की? ये बिंब क्या बोलते हैं? इस सुर-ताल का क्या प्रयोजन था? वह इन सारे कार्यों को आलोचकों के लिए छोड़ देता है। जिस क्षण कलाकार ने रचना विशेष को पूरा किया उसका उद्देश्य उसी समय पूर्ण हो गया क्योंकि इससे कलाकार ने अव्यक्त न कर पाने की सीमा का व्यक्त कर जीत लिया। यह विजय भाव उसे "सुकून" देता है। इस सुकून की खोज कला की अपरिहार्यता का प्रमाण है जिसके लिए संस्कृति से प्रतीक और विधा चुनी जाती है और जो प्रकारान्तर से सभ्यता का स्वरूप गढ़ती है। विडंबना देखिए सभ्यता का जो स्वरूप हमारे सम्मुख है उसमें जीवन के लिए जीविका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। हम जीविका की तैयारी और उसके संरक्षण और संवर्धन में व्यस्त रहते हैं। जरा सोचिए कि जब दूसरे कलाकार के प्रदर्शन और प्रस्तुति की आनंदानुभूति से चित्त शांत होता है तब यदि आप स्वयं अपनी प्रतिभा और रुचि की कला को कुछ समय दें तो कैसा रहेगा।
आजकल "टैलेन्ट हंट" का दौर है। इसे कला की खोज मुहावरे से प्रचारित किया जाता है। निसंदेह ऐसी गतिविधियों से प्रतिभाएं सामने आ रही हैं। यह भी विचारणीय है कि इन प्रतिभाओं को खोजने वाले "शिकारी" कला के साधक हैं या कला के व्यापारी। कला को बड़ा-छोटा, चयन, सफल-असफल से जोड़ना कला और जीवन के संबंध को कमजोर करता है और कला केवल एक औजार बना देता है। इस औजार के प्रयोग से व्यक्ति सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से गतिशील हो सकता है लेकिन कला द्वारा नवोन्मेष के लक्ष्य को प्राप्त करने के रास्ते पर उसकी गति धीमी हो जाती है। उसकी कला पर समाज की अपेक्षाओं का दबाव पड़ने लगता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह इस मांग को ध्यान में रखकर प्रदर्शन करे। इसी जरह कला को मनोरंजन से जोड़ने का चलन है। मनोरंजन से कला को जोड़ने का अर्थ दूसरे की अभिव्यक्ति से खुद को संतुष्ट करना है। यह एक प्रक्रिया हो सकती है जिसके प्रभाव में कला भी व्यापार के जैसे बन जाती है। ऐसी स्थिति में लोग मानने लगते हैं कि धन के रहने पर कला को खरीदा जा सकता है, इसलिए धनार्जन की कीमत पर कला के अर्जन या संवर्धन में समय क्यों बर्बाद करें? विद्यालय जैसे अधिगम-समुदाय मस्तिष्क को कला का प्रशिक्षण देना चाहते हैं। इस तरह के संस्थानों के प्रभाव में हमारा मस्तिष्क इतना अधिक प्रशिक्षित हो चुका है जैसे ही हम सीखना शब्द सुनते हैं वैसे सीखने वाले, सिखाने वाले और सीखने की सामग्री की कल्पना स्कूली ढंग से करने लगते हैं। जबकि कला को सीखना एक व्यवस्थागत आजादी की मांग करता है। इस व्यवस्थागत आजादी को रवीन्द्रनाथ टैगोर शिक्षा का मूल मानते हैं। यह आजादी चेतना को स्वतंत्र करती है, इन्द्रियों को नैसर्गिक गति देती है। आजादी के इस रास्ते पर चलने से रोकने वाले बंधनों को तोड़ने का साहस ही मनुष्य को अन्य जैविक प्राणियों से भिन्न सिद्ध करता है।

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