ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अरे यायावर रहेगा याद
CATEGORY : सम्पादकीय 01-Feb-2017 12:00 AM 3139
अरे यायावर रहेगा याद

आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस सृष्टि का गर्भनाल शब्द से जुड़ा है। पूंजी से नहीं।

आखिर किसी यायावर को क्या याद रहता होगा। और वह क्या भूल जाता होगा। भूलना भी याद रखने के बराबर है। क्योंकि अक्सर भूलना याद आ जाता है।
गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर जब जापान गये तो जाते हुए उन्हें लगा कि विदा लेने में एक पीड़ा है और उस पीड़ा का कारण यह है कि जीवन में जो कुछ सबसे ज्यादा जान समझ कर पाया गया है उसे अनजान के हाथों समर्पित करके जाना, उसके बदले में दूसरा कुछ न मिलने पर यही शून्यता मन के लिये बोझ बनती जाती है। यह लाभ है अनिर्दिष्ट को निर्दिष्ट के भंडार में पाते चलना, अनिर्दिष्ट के निर्दिष्ट को, अपरिचय को धीरे-धीरे परिचय के कोठे के भीतर समेटते चलना, इसीलिये यात्रा में जो दुख है चलना ही उसकी दवा है।
हिंदी के आधुनिक कवि अज्ञेय अपनी यायावरी के लिये प्रसिद्ध रहे हैं। ऊपर जो शीर्षक दिया गया है वह उन्हीं की पुस्तक से साभार है। वे अपने यात्रा वृत्तांतों के सिलसिले में लिखते हैं कि जानना ही सब कुछ नहीं है, देखना और जो देखा उसके बारे में सोचना भी बड़ी बात है। आज के युग में जब कुछ खोजने चलने से कुछ मानकर चलने को कुछ अधिक महत्व दिया जाता है और जब यात्री प्रायः कुछ देखने नहीं, जो मानकर चले हैं उसकी पुष्टि पाने निकलते हैं, तब उसका महत्व कुछ और भी अधिक है। यात्री अधिक पूंजी न लेकर लौटे तो फालतू असबाब से छुट्टी पाकर सहज यात्रा करना सीख आये, यही बहुत है।
मैं उन लोगों की बात नहीं कहता जो यहां से कई एक खाली झोले लेकर चलते हैं और लौटते समय जिनके कपड़ों के हर एक सलवट से कलाई घड़ियों की लड़ियां, जूतों के भीतर से छह-छह जोड़े नाईलोन के मोजे या कोट के अस्तर से गजों जार्जेट निकला करती है।
भारत कलाविद् आनंद कुमार स्वामी ने बहुत दुखी होकर कहा था कि - आप जब विदेश में आयें तो वहां के लोगों को यह भी अनुभव करने का कारण दीजिये कि आप अपने साथ खर्च करने के लिये पैसों के अलावा भी कुछ लेकर आये हैं।
हिंदी के ही विश्व विख्यात लेखक निर्मल वर्मा अपने यात्रा वृत्तांतों को चीड़ों पर चांदनी की तरह महसूस करते हुए कहते हैं कि - महज सांस ले पाना, जीवित रहते धरती के चेहरे को पहचान पाना, यह भी अपने में एक सुख है - इसे मैंने अपनी यात्राओं से ही सीखा है।
यूं तो भारत में तीर्थाटन की परम्परा बहुत पुरानी है। लोग प्रकृति के बीच तीर्थ में जाते थे यह मानकर कि देवता उनसे कहीं दूर रहते हैं। वे वहां जाकर देवताओं को घनीभूत प्रकृति के रूप में पाते थे और अपने आधे-अधूरे जीवन में फिर लौट आते थे। दरअसल पूरी दुनिया में जीवन में कहीं भी पूरा नहीं है वह आधा-अधूरा ही है लेकिन लोग हर भौगोलिक परिस्थिति में अपना देवलोक रच लेते हैं और उसी के यात्री होना चाहते हैं। क्योंकि वह जानते हैं कि जीवन उसी से चलता है।
आज हम अनुभव करते हैं कि देश तो है लेकिन उनका देवलोक खो गया है। नदियां, नदियों की गहराईयां, पर्वतों की ऊचाईयां और मैदानों की समतल शांति कहीं खोती जा रही है। लोग मौज करने तो जाते हैं पर मोक्ष की आशा व्यर्थ होती जाती है। हम अपने पूर्वजनों के अनुभवों से सदा यह अनुभव करते आते हैं कि मनुष्य की मुक्ति की यह आकांक्षा प्रकृति के हरे-भरे आंगन में ही फलीभूत हो सकती है। और जन्म-मृत्यु के बीच में बीतता हमारा जीवन बिना उसके किसी यात्रा का अनुभव ही नहीं कर सकता।
आज यात्राएं होती हैं पर वे पूंजी निवेश के लिये जितनी हैं उतनी शब्द निवेश के लिये नहीं। शब्द निवेश के बिना पूंजी की अर्थहीनता विश्व को ही डुबो देगी। क्योंकि विश्व पूंजी में नहीं शब्द में बसता है। इस सृष्टि का गर्भनाल शब्द से जुड़ा है। पूंजी से नहीं।

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