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अद्र्धनारीश्वर : एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व
01-Sep-2016 12:00 AM 4935     

काहानी, उपन्यास और नाटकों के रचनाकार विष्णु प्रभाकर वैसे तो हिंदी साहित्य के लिए एक प्रतिष्ठित नाम हैं किन्तु उनकी पुस्तक "आवारा मसीहा" ने उन्हें एक उत्कृष्ट जीवनीकार के रूप में भी स्थापित कर दिया जो कि जाने-माने बंगला उपन्यासकार शरतचंद्र के जीवन को लेकर लिखी गई थी। विद्वान् लेखक विष्णु प्रभाकर की साहित्यिक उपलब्धियों में अनेक पुस्तकें शामिल हैं, "कोई तो" जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण कृति के बाद उनकी ऐसी ही एक प्रसिद्ध कृति "अद्र्धनारीश्वर" है जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। पुरातन काल से हिन्दू धर्म के अनुसार माना जाता रहा है कि शक्ति के बिना शिव भी शव के समान हैं, शिव की मान्यता उनके अद्र्धनारीश्वर रूप में ही पूर्णता पाती है। इस उपन्यास कि रचना भी भारत की इन्हीं पौराणिक मान्यताओं को लेकर की गई है। वर्तमान में भी हमारे समाज और विधान में स्त्री को पुरुष के बराबर का दर्जा दिया जाता है किन्तु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। इसके अनेक कारण संभव हैं। सामाजिक जीवन मूल्य, संस्कार और विधान हमारे महापुरुषों और देवताओं के जीवन से अनुसरित हैं। "अद्र्धनारीश्वर" की एक नारी पात्र के अनुसार एक तरफ तो शंकर बेहद भोले हैं किन्तु सत्य और न्याय का प्रहरी तीसरा नेत्र भी उन्हीं के पास है। वर्तिका आगे कहती है कि "और वैसी हैं पार्वती। एक ओर देवताओं के सेनापति  कार्तिकेय की माँ, दूसरी ओर गणेश की भी। वह शिव की जंघा पर बैठने वाली पार्वती हैं तो काली, महाकाली, रणचंडी भी वही हैं। उसे शांत करने के लिए शिव उसके चरणों में लेट जाते हैं। काश! इस प्रतीक के सही अर्थ समझे होते हमने! लेकिन धीरे-धीरे नर नारायण होता गया और स्त्री दासी फिर चरण दासी।"
विष्णु प्रभाकर मानते हैं कि आज भी आधुनिक कहे जाने वाले समाज में नारी के लिए वर्जनाएं कम नहीं हुई हैं। कहानी आधुनिक युग में संबंधों की जटिलता की तह तक पड़ताल करती हुई अनेक सामाजिक कुरीतियों जैसे जात-पात, धर्म-भेद, अमीरी-गरीबी, शोषण और उत्पीडन जैसे मुद्दों के साथ ही बलात्कार जैसे ज्वलंत विषयों को लेकर आगे बढ़ती है जिसमें घुटन, विघटन, अन्तद्र्वंद्व नर-नारी दोनों को सहन करना पड़ता है। भारत के समाज में आदिकाल से आधुनिक काल तक स्त्री-पुरुष कभी भी एक-दूसरे के विरोधी नहीं माने गए। वे सदैव एक दूसरे के पूरक के रूप में ही जाने गए। पुरुष के भीतर जहां भाव, सौन्दर्य और संवेदना का गुण उसके व्यक्तित्व को पूरा करते हैं वहीं स्त्री में संबल और धैर्य उसके सुकोमल तन-मन को पूर्णता प्रदान करते हैं। किन्तु मूल समस्या पौरुषिक अहम से पैदा होती है। उसे आहत होना स्वीकार्य नहीं। उसे ही सहज बनना होगा और साथ देना होगा। स्त्री-पुरुष ने स्वयं ही मकड़जाल बनाकर अपने आपको दासता में जकड़ा है। एक ओर स्त्री की पुरुष बल के प्रति आकर्षण, घर बसाकर सुरक्षा और मातृत्व पाकर पूर्ण होने की लालसा है तो दूसरी तरफ पुरुष भी अधिकार, प्रभुत्व, काम-वासना और छोटे-छोटे दैनिक दैहिक सुखों के मोहवश स्त्री का दास हो जाता है। इसी दासता की जकड़न से मुक्ति के लिए स्त्री और पुरुष दोनों को ही अपने भीतर से प्रयास करना होगा। नैतिकता के परिपेक्ष में अद्र्धनारीश्वर के कुछ स्त्री पात्रों के तार्किक संवादों के द्वारा लेखक ने उस समाज पर प्रहार किया है जिसने स्त्री को भोग्या माना और उसके अबला होने का समर्थन किया, उसे बेचारी बनाकर गर्त में जाने पर विवश किया। समाज को स्त्री विरोधी गतिविधियों से मुक्त होना होगा तभी नारी को पूर्ण गरिमा और सम्मान प्राप्त हो सकेगा, तभी भ्रूण हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों से समाज मुक्त हो सकेगा।
इस प्रसिद्ध उपन्यास में स्त्री-पुरुष के बीच विभिन्न वजहों से उपजी अनेक विसंगतियों का कारण और उससे उबरने का मार्ग भी सुझाया गया है किन्तु किसी बाहरी प्रयास द्वारा नही बल्कि बार-बार स्वयं से उबर आने का मार्ग।
टूटने बिखरने के अनगिनत पड़ावों के बीच ही एक-दूसरे की दुर्बलताओं और सबलताओं को स्वीकार कर एक दूसरे के साथ आगे बढ़ना ही अद्र्धनारीश्वर की परिकल्पना है। कहानी में जगह-जगह विभिन्न काल परिस्थितियों में बार-बार एक बात उभर कर आती है कि स्त्री पुरुष एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। आज के परिवेश में जहां समाज और नारी की शिक्षा व सशक्तिकरण से ज्यादा कभी-कभी नारी मुक्ति का मुद्दा मुखर हो उठता है वहाँ इस उपन्यास की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।
स्त्री के लिए लेखक दोहरे मूल्यों को तजने के साथ ही उसकी स्वतंत्रता की बात करता है, वे कहते हैं कि एक ओर तो नारियों से अभद्रता करने वाले असामाजिक तत्वों के विरुद्ध कानून बनाए जाते हैं दूसरी ओर दूषित साहित्य और फूहड़ कार्यक्रम व फिल्म निर्माण करके अपराधिक मनोवृत्तियों को भड़काया जाता है। अलग-अलग तबकों से आने वाली सभी स्त्रियों की सामाजिक वर्जनाएं एक सी ही होती हैं कहीं कोई अंतर नहीं होता, एक तरफ सुमिता अपनी क्वारी ननद विभा को बचाने के लिए पति के साथ होते हुए भी बलात्कार का शिकार होती है, एक प्रौढ़ा अपने विवाह के तुरंत बाद अपने ही नौकर की कुत्सित नजर का शिकार होती है तो दूसरी ओर गरीब राजकली पुलिस के हवस की भेंट चढ़ती है। ऐसे ही वर्तिका, शालिनी अहमदाबाद की मजदूर और न जाने कितनी स्त्रियाँ..., सभी के भीतर भय, छटपटाहट, अंतद्र्वंद्व, लाचारी और विवशता का शूल ऐसा धंसा है जैसे सृष्टि में दूसरा कुछ भी नहीं बचा। युगों-युगों से जिन संस्कारों और जीवन मूल्यों को वे आत्मसात करती चलती है उन्हीं से भय! तन-मन की उलझनों के बीच ही टूटती-जुड़ती, गिरती-संभलती, बिखरती फिर सहेजती स्त्री। स्त्री को दासता से मुक्ति पाने के लिए अपने को सशक्त बनाना होगा, उसे समझना होगा कि दोनों एक दूसरे के परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। पात्रों के बीच वाद प्रतिवाद के साथ कहानी आगे बढ़ती रहती है। दैनिक जीवन में जो कुछ भी हम पढ़ते सुनते और अपने इर्द-गिर्द घटते देखतें हैं उन सभी घटनाओं व उनसे उपजी घर-परिवार और समाजिक दुविधाओं को उपन्यास में बड़े ही करीने से पिरोया गया है।
विष्णु प्रभाकर ने इस उपन्यास के माध्यम से बताना चाहा है कि हमारे सामाजिक संस्कार और मूल्य पुरातनकाल से चले आ रहे हैं, सुगठित समाज के लिए अब उनमें परिवर्तन करने की आवश्यकता है। दोनों को ही अपने स्व और स्वामित्व से बाहर आकर स्वतंत्रता पाना होगी, एक-दूसरे को बिना आरोपित किए। "अद्र्धनारीश्वर" ने सामाजिक विसंगतियों से उबरकर शिव-शक्ति के प्राचीनतम स्वरूप को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया है।

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