ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
अरमान है
01-Jan-2017 01:10 AM 4231     

सड़क किनारे एक छोटी-सी दुकान की रंग-बिरंगी दीवार से शरीर को टिकाए, बदरंगे, मटमैले से कपड़ों में तेज़ बारिश में भीगने से अपने को बचाता हुआ वह, कान से चिपके पुराने मॉडल के मोबाइल पर ऊँची आवाज़ में न जाने कब से बतियाए जा रहा था। उसके चेहरे के हाव-भाव और तेवर देख आसानी से पहचाना जा सकता था कि बातों में गर्मा-गर्मी है कुछ कहा-सुनी चल रही है। बाहर की बरसात अंदर की तपन को हरने में असहाय थी शायद! उस पर बीच-बीच में हाथ-पैर झटक-पटककर हवा में उछाल देना निसंदेह उसके अंदर उठ रहे उबाल को उजागर कर रहे थे। ऐसे में पैरों तले भरता बरसात का पानी लंबे गमबूटों के ऊपर तक आकर अठखेलियाँ करता उसे खिल्ली उड़ाता-सा लग रहा होगा। तभी तो उसने अपने आक्रोश को जूतों के ज़रिये पानी में सड़ाक से धकेलकर हल्का करने का प्रयास किया। कभी-कभी बेजान या बेज़ुबान अस्तित्व भी जीवनांशों के अनजाने में जाने से संगी बन उनके मनोभावों की घुटन को निज स्निग्धा से सहला जाते हैं। जिसमें अनकही सी संतुष्टि या अहं की तुष्टि समाहित है, इसे नकारा नहीं जा सकता।
मैं पल्ली तरफ बैठी बस की प्रतीक्षा में उसके क्रियाकलापों का अवलोकन कर रही थी। प्रतीक्षा गई पानी में। अब मेरे अंतःकरण में उसके और उसकी मनःस्थिति के बारे में जानने की जिज्ञासा बलवती होने लगी। आखिर जानूँ तो बात क्या थी? मुझे इस तरह अजनबियों से जान-पहचान निकालना और उनके साथ गुफ़्तगू करना बहुत भाता है। वैसे भी कब, कहाँ, कौन, क्यों और कैसे का लेखा-जोखा रखना हमारी बिरादरी को विरासत में मिला है। जो कभी तो हमारी ईष्र्या और जलन को पोषित करता, बड़े-बड़े झगड़ों की जड़ बनता है तो कहीं उपयोगी, अभिन्न सहयोगी बन जीवनरक्षक प्रमाण भी सिद्ध होता है।
बरसात बंद हो गई थी पर उसका असर सड़क पर ठहरे पानी में वाहनों के गुज़रकर जाने से उड़ते छींटों की बौछार के रूप में दिख रहा था। उसकी बात भी बंद हो गई थी पर चेहरे पर उभर आई बेचैनी और बेबसी की मिश्रित लकीरें साफ़-साफ़ दिखाई पड़ रही थीं। जिन्हें वह चाह कर भी नहीं छिपा पा रहा था।
मैंने उसे दूर से ही गौर से देखना ठीक समझा था पर न जाने क्यों कदम उसके समीप ले चले। पास से देखा तो कुछ जाना-पहचाना सा लगा। उसे असहज न लगे इसलिए मैं दुकान में घुस गई और कुछ सामान उठाकर दाम देखने का नाटक करते हुए कनखियों से उसे देखने लगी। देखते-देखते याद आया कि इसने कभी मेरी मदद भी की है। वही स्लेटी कामग़ारी सूट पर पीली कहो या बसंती पारदर्शी जैकेट, जिसकी रुपहली पट्टियों पर मिट्टी, ग्रीस या तेल के छींटे उसकी कर्मशीलता का परिचय दे रहे थे। सर पर अटके फीके पड़ गए पुराने पीले हैलमेट के अंदर से झाँकता लाल-सफ़ेद बूटियों वाला रूमाल उस पर जँच रहा था। सुती सी नाक, गोल चेहरा उस पर मोटी-मोटी रसभरी सी रसीली आँखें, आँखों के लाल रेशों के जाल में उलझे सपने। जो हाल ही में घटित प्रतिकूल प्रसंग से आहत हो कुम्हला से गए थे। हाँ, तो यह वही है मन और मस्तिष्क की मिली-जुली सरकार ने इस पर मुहर लगा दी। सब याद आने लगा।
कोई साल दो साल पहले बुगिस में एमआरटी के स्टेशन का निर्माण कार्य चल रहा था, जो अभी भी जारी है। एक दिन जल्दी में, मैं निर्माणाधीन क्षेत्र से होकर उस पार जाने के लिए निकल पड़ी। तब बीच में ही अपना काम रोककर इसने व अन्य दो श्रमिकों ने मुझे सावधानी से निकल जाने में मदद की थी। मुझे यह भी याद है कि मेरे धन्यवाद के उत्तर में मुझे सरल सहृदय की मुस्कानस्वरूप स्वीकृति दी गई थी।
दो सैंडविच और बोतल बंद संतरे का जूस लेकर आज उसके बारे में जानने के इरादे से बाहर निकली और सीधे उसके सामने सैंडविच बढ़ाते हुए बोली -
"कैसे हो भइया?"
एक पल को तो अप्रत्याशित व्यवहार से वह सकपका सा गया लेकिन दूसरे ही पल सँभलकर, सैंडविच एवं जूस स्वीकारते हुए बोला-
"ठीक हूँ, दीदी।"
"पहचाना मुझे? वो बुगिस में निर्माण कार्य चल रहा था और मैं... बीच में ही बोल पड़ा वह, "जी! थोड़ा-थोड़ा याद..." सिर तो इतने ज़ोर से हिलाया कि लगा कहीं इसका हैलमेट न गिर पड़े क्योंकि वो ठीक से पहना नहीं केवल अटका ही था।
"तुम कहाँ से हो?"
"बांगलादेश से।"
"मुझे तो लगा था कि तुम इंडिया से हो। हिंदी तो अच्छी-खासी बोल लेते हो।"
खुश हुआ फिर बोला, "भारत के दोस्तों से सीखा दीदी। यहाँ सब मिलकर एक-दूसरे की भाषा बोलना और खाना बनाना सीखते हैं।"
"वाह! वाह! ये तो बहुत बढ़िया बात है।"
"यहाँ, सिंगापुर में कब से हो?"
"यही कोई सोलह वर्ष हुआ दीदी।"
"ओह! बहुत साल हो गए यहाँ पर।"
"अपने देश नहीं जाते?" क्या बेतुका सा सवाल पूछ बैठी थी मैं। कौन भला अपने देश नहीं जाता। बहुत से लोग रोज़ी-रोटी की तलाश और बेहतर ज़िंदगी की चाह में परदेस जाकर काम करते हैं। फिर साल दो साल या जब समय मिले तब अपने देश आकर अपने घर-परिवार एवं रिश्तेदारों से मिलते हैं। अपना देश तो अपना ही होता है।
उसने भारी आवाज़ में कहा, "जाया करता था, अब नहीं जाता।" इस बार लगता है उसकी दुखती रग पर हाथ रख गया था। बुरा तो लगा फिर सोचा मुझे उसके दुख का कारण ही तो जानना है। पूछ बैठी, "मतलब?"
"यही कि अब जाने का मन नहीं करता।" थोड़ा रुका फिर बोल पड़ा -
"क्या करूँगा जाकर अब! माँ के लिए बनवाए झोंपड़े को भी वही दोस्त मंज़ीदा जो मुझ पर जान छिड़कता था, हथियाना चाहता है। कुछ सालों से मैं उसे मुफ़्त अनाथ बच्चों की देखभाल के लिए पैसे भेजता था। उस झोंपड़े में बेघरों के रहने, खाने-पीने की व्यवस्था करवाने की, कब से मिन्नतें कर रहा था। वो तो कहता है कि करता हूँ। मेरे भेजे पैसे भी उन्हीं पर खर्च होते हैं। मगर और लोगों से खबर लगी कि उसे अपनी मौज-मस्ती में उड़ा देता है। अभी-अभी मेरी उसी से कहा-सुनी हो रही थी। फ़ोन पर उससे कहा कि अगर वह इस नेक काम का ज़िम्मा नहीं ले सकता तो मैं दूसरे को दे दूँगा। बस! इसी बात पर बिदक गया।"
"और माँ?"
"माँ, सिंगापुर की धरती के कण-कण में है।" आवाज़ में दर्द तैर गया।
"अब तो इसे छोड़कर कहीं नहीं जाना। क्यों जाना? किसके लिए जाना?"
"अफ़सोस कि मैंने तुम्हारा दिल दुखाया। अगर बुरा न मानो तो जानना चाहूँगी माँ और सिंगापुर का रिश्ता!"
"क्यों नहीं !" कहकर वह धाराप्रवाह बोलता चल गया।
वह अनाथ था। माँ जैसी मिली। चली गई। अब फिर अनाथ का अनाथ रह गया। एक औरत रद्दी कागज़ बटोरते हुए उसे कूड़े के ढेर से कुछ बीनकर कहते हुए देख उठा लाई थी। बगुआ गाँव का वरदान समझ उसे पालने-पोसने लगी। अब वही उसकी "माँ" थी, माँ का बेटा "वही" था। रोज़ रद्दी कागज़ की थैलियाँ बनाती, औने-पौने में बेच जो मिलता उसमें दो वक़्त का न सही, एक वक़्त का चूल्हा तो जल ही जाता।
कभी-कभी घरों में बर्तन-भांडे माँजकर बासी-तिबासी माछ-भात पा ही जाती जिसे नियामत समझ बड़े जतन से बेटे को खिलाती। बेटा बढ़ने लगा। इतने पैसे न होते कि उसे मदरसे भेज पाए, सो मौलवी के घर साफ़-सफाई और छुटपुट काम करती वो बदले में उसके बेटे को पढ़ा देते।
बड़े होने पर बेटा संगी-साथियों के साथ मेहनत-मज़दूरी कर कुछ कमाने लगा। उसे माँ का काम करना अखरता था। उस पर जब माँ को कोई काम के लिए झिड़का जाता तो उसे सहन न होता। उसका बस चलता तो वह माँ को नई बान के खटोले पर बिठाकर पाँव दबाता। उसे कतई काम न करने देता। एक दिन पास के गाँव से मज़दूरी करके लौटते समय उसके अच्छे दोस्त मज़ीदा के ताऊ ने परदेस मज़दूर भेजने वाले एजेंट से मिलवाकर सिंगापुर की एक कंस्ट्रक्शन कम्पनी में मज़दूरी का काम दिल दिया। ताऊ और एजेंट ने इसके एवज में बड़ी रक़म लेने का वादा भी उससे करवा लिया था। उसने सोचा एक बार काम चल पड़ा तो पैसा आएगा, जो माँगेंगे दे देंगे। ख़ूब मेहनत करेगा। माँ के सपने साकार करेगा। बगुआ गाँव का बेटा परदेस जा रहा है - पूरे गाँव में माँ-बेटे के रिश्ते में "नाथ" अनाथन के नाथ दीनानाथ प्रकट हो गए।
माँ तो खुशी से बौरा गई थी। अपने फटे-पुराने पैबंद लगे कपड़ों में भी मातारानी बनी सीना फुलाकर कहती न थकती कि - "मेरा बेटा है!" उसे बिछड़ने का गम तो था, लेकिन मन को समझा लिया कि बेटा ग़रीबी से उबरेगा और उसे क्या चाहिए। बेटे ने माँ से दूर होने का गम छिपाए रखा। कैसे दिखाता, मर्द जति को कड़ा दिल रखना पड़ता है।
सिंगापुर की धरती पर अजनबी सा आया था। दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो लोगों को अपनाता चला गया। अपनी दिलदारी से सबके दिल जीतता चला गया। कुछ ही दिनों में उसे सिंगापुर रास आने लगा। यहाँ के लोग, यहाँ का भाईचारा मोहने लगा। काम से तो वह डरता नहीं था। कम्पनी के मालिक, सुपरवाइज़र क्या कॉन्ट्रेक्टर सभी की कृपा उस पर बरसती। उसे कभी आधी कमाई या वर्क परमिट का रदद करना जैसी अड़चनों से जूझने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उसकी कर्मठता रंग लाती। उसकी शिष्टता सबको भा जाती। वह काम करता रहता। एक के बाद एक इमारत खड़ी करने में अपना ख़ून-पसीना एक करता रहा। लोहखंड, पाइप, सरिया, गारा, सीमेंट, बजरी-रेत, ट्रक, क्रेन, टैम्पो, लॉरी सब उसके चहेते बन गए। उसे लगता कि ईंट-ईंट अस्थि, सरिया-छड़ें नसें, गारा-पानी रक्त और ढाँचा, अस्थिपंजर तथा सीमेंट माँस-मज्जा, तैयार भवन वह खुद है। इस धरती ने उसे दी धड़कन इसकी माटी सर माथे ज्यों चंदन।
पाँच बरस पहले माँ को भी यहाँ लेकर आया था। माँ तो सब फटी-फटी आँखों से देखती रही।
बोल उठी अब न जाऊँगी, यहीं रहूँगी। इतनी खुशी उससे सही न गई। एक दिन जब वह काम से लौटा, दरवाज़ा खोल अंदर आया, देखा कि माँ खाना लिए बैठी, जो कभी न उठी।
उसके चेहरे पर शांत और संतुष्टि के भाव स्थिर थे, बेटा अधीर अस्थिर! वह टूट गया।
उसका - अब यहाँ इस भूमि पर दूसरा जन्म हुआ। ये धरती उसकी वह इसका पूत हो गया।
माँ तो दोनों - एक ने पाला, एक ने दिया निवाला। अब तो उसका यही मुल्क, मुकाम, मकान और अपनी माँ का -अरमान है।

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